Khamoshi (1969): तुम्हारा इंतजार है तुम पुकार लो

Khamoshi (1969): तुम्हारा इंतजार है तुम पुकार लो

जरुरी नहीं कि एक सलीके से फैला हुआ निबंध वह असर छोड़ जाये जो एक कविता, जो कि पूरी तरह से अतार्किक लगती है, छोड़ जाती है। यूँ ही नहीं कहा जाता कि भावना दिल का मामला है दिमाग का नहीं।

क्वालिटी के मामले में खामोशी विषमता से ग्रसित है पर फिर भी यह एक भावनाप्रधान क्लासिक फिल्म है।

ऐसा क्यों है?

फिल्म की दर्जनों कमियाँ कभी भी कहीं भी बतायी जा सकती हैं पर ऐसा करने वाला विश्लेषक इसकी सारी कमियों के बावजूद अगर वह इसे पच्चीस्वीं बार भी देख रहा है तो इसकी खूबियों के कारण इसका लुत्फ उठायेगा और सम्भव है कि फिल्म की भावनाप्रधान खूबियाँ इस बार भी उसकी आँखें नम कर दें। चलिये पहले फिल्म की कमियों पर विचार कर लेते हैं और जिन्होने भी फिल्म देख रखी है उनके दिल दिमाग से विरोध के भाव उठने शुरु हो जायेंगे कि नहीं फिल्म तो बहुत असरकारी है।

सिनेमा का कोई भी शोधार्थी, जो कि हद दर्जे का तार्किक हो और सिनेमा को एक विषय के तौर पर उससे अलग रह कर उससे अछूता रह कर उसका विशलेषण कर सकता हो, असित सेन की खामोशी फिल्म के दर्शक पर भावनात्मक असर को नहीं नकार सकता। ये सच है कि 1969 में बनी इस फिल्म में तर्क के आधार पर कई कमियाँ साफ साफ दिखायी देती हैं परन्तु साथ ही साथ फिल्म में इतनी खूबियाँ हैं जो उन कमियों का असर न केवल कम करती हैं बल्कि फिल्म को एक ऐसी फिल्म बना देती हैं जो दर्शक के दिल को छू जाती है।

शायद बाजार का दबाव इतना रहता है व्यवसायिक फार्मेट में फिल्म बनाने वालों के ऊपर कि उन्हे किसी तरह बाजार में चल सकने वाले सभी संभावित टोटके रखने पड़ते हैं। उनके पास एक 80-90 मिनटों की एक बेहतरीन फिल्म बनाने के लिये सामग्री होती है पर बाजार में चलने वाले ढ़ाँचे में फिट होने के लिये उन्हे एक संवेदनशील विषय पर बनी फिल्म में भी कामेडी उत्पन्न करने के लिये फालतू के दृष्य़ और बेअसर दिखने वाले पात्र घुसाने पड़ते हैं। और ये बोगस प्रक्षिप्त सामग्री सिर्फ और सिर्फ फिल्म की लम्बाई बढ़ाने में ही सहयोग करती है वरना फिल्म की क्वालिटी नीचे लाने में इनका ज्यादा योगदान रहता है।

कॉन्सेप्ट के स्तर पर भी तार्किक रुप से खामोशी का विषय खरा नहीं उतरता। फिल्म इस विचार पर बुनी गयी है कि टूटे दिल वाले नवयुवकों को प्रेम से बिना दवा या भयानक बिजली के झटकों के ठीक किया जा सकता है। फिल्म में डाक्टर बने नाजिर हुसैन अपने इस सिद्धान्त को वास्तव में मरीजों पर आजमाना चाहते हैं और वे ऐसा करते भी हैं और उनकी सबसे काबिल नर्स राधा (वहीदा रहमान) उनकी थ्योरी को अपनी लगन, निष्ठा और नारी सुलभ गुणों के कारण असलियत का जामा पहनाने में कामयाब होती है और एक अमीर परिवार के इकलौते पुत्र देव (धर्मेन्द्र) को, जो प्रेम में नाकाम रहने पर अपना दिमागी संतुलन खो बैठता है, फिर से सामान्य रुप से जीवन जीने के लायक बना देती है, पर इस सारी प्रक्रिया के दौरान वह खुद भूल जाती है कि उसका प्रोफेशन और व्यक्तिगत जिन्दगी दो अलग अलग बाते हैं और वह यह सीमा रेखा पार कर जाती है और देव से प्रेम करने लगती है जो कि उस पर बहुत निर्भर हो गया है। सारा जमाना राधा को देव का इलाज कर रही एक प्रोफेशनल नर्स के रुप में ही देखता है और देव खुद उसे अपना बेहद करीबी तो मानने लगता है पर वह उसके अन्दर पनप रही प्रेम की कोमल भावनाओं से अपरिचित रहता है। ठीक होने के बाद भी उसका ध्यान अपने पुराने प्रेम की और ही रहता है और वह उसे पुनः पा भी जाता है। डाक्टर को उनके इलाज की नयी विधा की कामयाबी पर चारों तरफ से प्रशंसा मिल रही है और खुशी से फूले नहीं समा रहे हैं और राधा की तारीफ में कसीदे कढ़ रहे हैं और इस बात से पूरी तरह से अन्जान हैं कि राधा पर क्या बीत रही है जिसका प्रेम ढ़ंसे फूलने से पहले ही कुचला गया है और इसमें किसी की कोई गलती भी नहीं है सब अपनी अपनी जिन्दगी के स्वप्नों को पूरा करने में व्यस्त हैं।

अब एक प्रश्न तो यह उठता है कि क्यों सिर्फ नवयुवक प्रेमियों की अस्वस्थता पर इतना जोर दिया गया है? टूटे दिल वाली नवयुवतियों का क्या?

अगर डाक्टर साहब का नुस्खा इतना असरदार है तो घर वालों के प्रेम से भी नवयुवक ठीक हो जाने चाहियें आखिर घर में भी तो माँ या बहन का प्रेम उन्हे संभाल सकता है। अगर एक नवयुवती के ही प्रेम की जरुरत है तो क्या इन प्रेमियों की शादी करने से मसला हल हो जायेगा? जाहिर है कि फिल्म विषय में गहरायी से नहीं उतरती।

विषय की गहरायी के हिसाब से मानसिक चिकित्सालय पर आधारित हॉलीवुड से 1975 में आयी Miloš Forman की फिल्म Flew Over the Cuckoo’s Nest को उच्च कोटि की फिल्म माना जा सकता है।

देवेन वर्मा और मानसिक चिकित्सालय में रहने वाले अन्य रोगियों के कामेडी सीन ऐसी संवेदनशील फिल्म में खीज उत्पन्न करते हैं। ललिता पवार का कठोर हेड नर्स का रोल जहाँ आनन्द में मजबूती से जमा दिखता है यहाँ वह जादू गायब है। इफ़्तिखार और अनवर हुसैन भी अपनी अपनी तरफ से फिल्म को स्तर न प्रदान करने की पूरी कोशिश करते हैं। अपनी दर्जन भर अन्य हिन्दी फिल्मों की तरह स्नेहलता ने यहाँ भी साधारण अभिनय करके अपना काम चला लिया है।

राजेश खन्ना नये अभिनेता के लिहाज से अच्छा काम कर गये हैं पर जहाँ कुछ समय बाद रिलीज होने वाली नारी चरित्र प्रधान फिल्म आराधना में वे फिल्म शर्मीला टैगोर के हाथों से निकाल कर ले गये थे यहाँ वे ऐसा नहीं कर पाते क्योंकि यहाँ उनका पाला वहीदा रहमान से पड़ा था। यहाँ ये जरुर कहा जा सकता है कि गीत वो शाम कुछ अजीब थी के दौरान उन्होने आने वाले समय में रोमांस में वे क्या करने वाले थे इसकी झलक दिखा दी थी। पूरी फिल्म से ज्यादा इस गाने में वे अभिनय क्षमता का प्रदर्शन पूरी तरह कर पाये हैं।

यह कहा जा सकता है कि खामोशी को एक असरदार फिल्म बनाने में वहीदा जी के उच्च कोटि के अभिनय का बहुत बड़ा हाथ है। उन्होने अपने चरित्र की उलझनों, परेशानियों और दुखों को इतनी शिद्दत के साथ जिआ है कि दर्शक उनके चरित्र के दर्द से सामंजस्य बैठा लेता है।

वहीदा जी ने इस फिल्म में क्या जादुई अभिनय किया है इसे जानने के लिये फिल्म के विलक्षण गीत ” हमने देखी हैं उन आँखों की महकती खुशबू ...” के दौरान किये अभिनय को देखकर जाना सकता है। इस गाने का असर जरा वहीदा जी पर देखिये- दोनो बार, पहली बार जब वे रिकार्ड प्लेयर पर इसे सुनती हैं और बाद में जब वे गायिका से मिलने कार में जा रही हैं। कमाल तरीके से उन्होने केवल आँखों और चेहरे के भावों से गीत के बोलों के अर्थ को जिन्दा कर दिया है और गाने में एक उदासी आ जाती है। बहुत तल्लीन होकर सुना जाये तो लता जी ने इसे उस गायिका से ज्यादा वहीदा जी के लिये ज्यादा गाया है। अदभुत गीत है हर लिहाज से। यह गीत अलग से तवज्जो माँगता है।

परदे पर स्नेहलता इस गाने को दूसरे भावों के साथ गा रही है क्योंकि उसके जीवन जीने की शैली दूसरी है अतः उसके लिये इस गीत का मर्म कुछ अलग हो सकता है जबकि कवि अरुण (राजेश खन्ना) ने इसे शायद दूसरे तौर पर दूसरे भावों के साथ लिखा था।

हेमन्त कुमार और गुलजार का योगदान भी बहुत महत्वपूर्ण है इस फिल्म को एक असरदार फिल्म बनाने में। देवेन वर्मा वाले कामेडी वाले गाने को छोड़ कर गुलजार ने बेहद अच्छी पंक्तिया इस फिल्म के गानों के लिये रचित की हैं।
कमल बोस की सिनेमेटोग्राफी बहुत प्रभावी है। श्वेत श्याम फार्मेट में उन्होने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया है। फ्रेमिंग, कैमरा प्लेसमेंट और लाइट आदि में उनके अच्छे प्रदर्शन की झलक तुम्हारा इंतजार है” गाने के प्रस्तुतीकरण में देखी जा सकती है।

फिल्म की अन्य खूबी है धर्मेन्द्र की उपस्थिति का बहुत ही प्रभावी ढ़ंग से उपयोग किया गया है। देव (धर्मेन्द्र) राधा (वहीदा रहमान) की जिन्दगी में कुछ समय पहले आये थे। उनके दृष्य फ़्लैशबैक तकनीक के द्वारा दिखाये गये हैं और एक या हद से हद दो बार कैमरा धर्मेन्द्र का चेहरा दिखाता है वरना उनकी उपस्थिति का आभास तो दर्शक को राधा की स्मृतियों के द्वारा होता रहता है परन्तु वे एक चरित्र की तरह दर्शकों के सामने नहीं आते और धर्मेन्द्र के चरित्र के इर्द गिर्द रचे गये इस रहस्यमयी, धूंधले और अस्पष्ट वातावरण से फिल्म में एक उत्सुकता का वातावरण बनता है और कहना चाहिये कि वे तड़प उठते हैं देव को और ज्यादा देखने के लिये और उनके बारे में जानने के लिये। निर्देशक ने बेहद प्रभावी ढ़ंग से इस भाग को फिल्माया है। तकनीकी तौर पर भी राधा के जीवन में घट रही घट्नाओं के दौरान उनका देव की यादों में खो जाने के दृष्य बहुत अच्छे हैं।

फिल्म खत्म होते होते और खत्म होने के बाद दर्शक हो या विश्लेषक वह फिल्म से प्रभावित हो ही जाता है क्योंकि फिल्म के जो अच्छे भाग हैं वे बेहद अच्छे हैं।

फिल्म कहीं अन्दर तक घुस जाती है। कोमल भावनायें जाग्रत हो जाती हैं और यही इस फिल्म की सफलता है, यही इसकी योग्यता है।

दर्शक किसी से कुछ बात नहीं करना चाहता क्योंकि बात करने से फिल्म का प्रभाव कम हो सकता है। एक सन्नाटा उसके चारों तरफ उत्पन्न हो जाता है जो कि कभी तो राधा की आवाज से टूटता है कभी हेमन्त कुमार की आवाज से जो कहीं दूर से आती प्रतीत होती है

तुम्हारा इंतजार है तुम पुकार लो

…[राकेश]

11 Responsesto “Khamoshi (1969): तुम्हारा इंतजार है तुम पुकार लो”

  1. [...] This post was mentioned on Twitter by Cinemanthan. Cinemanthan said: Khamoshi (1969): तुम्हारा इंतजार है तुम पुकार लो http://www.cinemanthan.info/index.php/2010/05/khamoshi-1969/ [...]

  2. Nishant says:

    आपने साईट बहुत अच्छी बनाई है. कुछ सुझाव: पोस्ट में फॉण्ट साइज़ बहुत छोटा है. इसे मीडियम रखें. और पोस्ट में इतने सारे रंगों में रंगे शब्द बहुत खटक रहे हैं.
    अभी इतना ही.

  3. cinemanthan says:

    निशांत जी,

    मूल्यवान टिप्पणी के लिये आपका बहुत बहुत धन्यवाद। कमियों को सुधारने पर हम काम कर रहे हैं। कृपया सरोकार बनाये रखें।

  4. Rakesh says:

    सुमन जी,
    धन्यवाद!

  5. V. Manohar says:

    Super Star Rajesh Khanna’s classic movie Khamoshi – 1970

    Release Date: 1970
    Genre: Family, Musical, Romance
    Starring: Super Star Rajesh Khanna, Waheeda Rehman, Sneh Lata, Nazir Hasain … See all
    Director: Asit Sen.

    SUMMARY : 1

    Colonel Saab is also a doctor in a psychiatric hospital in India. His particular interest is in treating patients with a acute mania, which he describes is caused by the male child’s longing for the unconditional love he gets from his mother, and after he separates from her, he searches for this love in other women, until he meets the one who he feels is capable of offering the same. But when that does not happen, the male child becomes cynical, full of hatred, and distrust and develops acute mania. His hospital nurse, Radha, had successfully treated one such patient by the name of Dev, and now they have another one by the name of Arun Choudhury. A reluctant Radha is asked to act as his caring mother-like nurse, to gain his trust, love him, and then make him ready to face everyday life. What Colonel Saab, Dev, and Arun do not realize what this is doing to Radha herself when she feels that she cannot act anymore and becomes more and more involved in her patients’ lives, knowing fully well that she has to keep up a professional attitude, and that the patient is going to be discharged soon, and may not even remember the care, love and treatment he received from Radha. Radha has now to decide to carry on being a nurse, without being a woman, who is quite capable in falling in love with Dev, and again with Arun.

    SUMMARY : 2
    Khamoshi (Hindi: ख़ामोशी, Urdu: خاموشی, translation: “Silence”) is a 1969 black-and-white Hindi film directed by Asit Sen, starring Super Star Rajesh Khanna and Waheeda Rehman. It especially remembered for its songs with music by Hemant Kumar and some haunting lyrics by Gulzar, who also wrote films equally effective dialogues. Though what really made this film stand out was the B &W cinematography by Kamal Bose, who won the Filmfare Award for its work. The film is considered Waheeda Rehman’s finest acting feat, as she carries the entire film through her powerful yet understated acting, she received a Filmfare nomination for it .

    Rajesh Khanna – The Greatest Living Legend and the real & only Super Star of Indian Cinema.

  6. Jahanpanah says:

    एक अच्छी फिल्म पर उत्कृष्ट लेख लिखा आपने राकेश (?) जी| फिल्म की जो कमियां आपने गिनाई हैं वो एक प्रकार से कुछ हद तक अविश्वास उत्पन्न करती हैं| यदि हम एक बार उससे उबर जाएँ तो फिल्म काफी सशक्त तरीके से उभर के आती है| हालांकि प्रेम के आधार पर रोगी को ठीक करना, अतार्किक दिखाई और सुनाई पड़ता है और कुछ लोग शायद इस बात को पचा न पाएं फिर भी अगर हम इससे आगे बढ़कर फिल्म के अन्य पहलुओं पर बात करें तो निश्चित ही वहीदा जी का किरदार इस फिल्म की जान है| दूसरा प्रभावी पक्ष इसका गीत-संगीत है| फिल्म में मानवीय भावनाओं और संवेदनाओं को संजीदगी से दिखाया गया है जिससे शायद ही कोई दर्शक अछूता रहे| मैंने शायद इतने ध्यान से फिल्म देखी नहीं क्यूंकि आपने लिखा है की दो बार धर्मेन्द्र जी का चेहरा दीखता है लेकिन जहाँ तक मुझे याद आ रहा है हमेशा उन्हें पीछे से या किनारे से ही दिखाया गया है|
    चलते चलते एक प्रश्न, जब वहीदा जी सीढ़ियों से उतरती हैं तो उनके हाथ में कौन सी पुस्तक होती है? :)

  7. Rakesh says:

    सामने से धरम जी की चेहरा वहीदा जी की यादों के सहारे दिखाया गया है। धरम जी की ही एक अन्य फिल्म दिल्लगी (बासु चैटर्जी) में भी कालिदास की पुस्तक का उपयोग किया गया है, जब भी प्रेम के बादल छाते हैं कालिदास के मेघदूत आ ही जाते हैं सामने :)

  8. rafat alam says:

    तुम्हारा इंतजार है तुम पुकार लो(वाह वाह हेमंत दा).इस गीत को जितनी बार सुनिए एक जादुई असर दिल दिमाग पर होता है.जेसे बर्फ सी जम जाती हो इंतज़ार में अथक आँखों पर और फैज़ साब की नज़्म-फिर कोई आया दिले जार नहीं कोई नहीं /राह रो होगा कहीं और चला जायेगा ….सो गयी रास्ता तक-तक के हर एक राहगुजार …अपने बेख्वाब किवाडों को मुक्फ्फ्ल कर लो /अब यहाँ कोई नहीं कोई नहीं आयेगा
    (माफ़ कीजे पूरी नज़्म नहीं लिखी है).ONE Flew Over the Cuckoo’s Nest जिक्र से एक उदासी दिल पे छा गयी है .सार यह फिल्म ख़ामोशी की संजीदगी एक ख़ामोशी और सूनापन (वहीदा जी की पुरअसर सूनी आंखों का जादू) आपके अहसास पर छोड़ती है.

  9. Rakesh says:

    अब यहाँ कोई नहीं… कोई नहीं आयेगा…
    फैज़ साब की नज़्म तो खत्म होकर भी सन्नाटा बिखेर जाती है।
    यह खामोशी के सबब सटीक बैठती है। खामोशी भी तो ऐसा ही प्रभाव छोड़ जाती है

  10. narindar naswa says:

    jitne acchi yeh film thi, utna he shandaar manthan kiya gaya hai.

  11. Rakesh says:

    Thanks Narindar Ji

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