निकट भविष्य में दुनिया के बहुत सारे शहरों का सामना पानी की भयानक समस्या से होने वाला है। आज के भारत के सामने भी जल का संकट और सारे संकटों से बड़ा है। अगर देश और इसकी विशाल आबादी अभी भी नहीं चेते तो पेय जल की तो बात ही छोड़ दीजिये आने वाले समय में नहाने के लिये स्वच्छ पानी मिलने के लाले भी पड़ सकते हैं। सुबह सवेरे उठकर अगर मनुष्य का सामना पानी की किल्लत से पड़ता है तो उसके अन्दर गुस्से और हिंसा का समावेश होना कोई बहुत अचरज की बात नहीं है। ऐश्वर्य के साधन न भी हों पर समाज में जी रहे साधारण मनुष्य के मस्तिष्क को संतुलन में रखने के लिये उसके पास मूलभूत सुविधाओं का होना बहुत जरुरी है और आज के भारत का पाला इन मूलभूत सुविधाओं की कमियों से पड़ रहा है। इतने प्राकृतिक साधन नहीं हैं जितने कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले देश को संतुष्ट करने के लिये चाहियें और ऊपर से भारतवासियों की संसाधनों को व्यर्थ करने की मूर्खतापूर्ण आदतें करेले पर नीम चढ़ा वाली कहावत को चिरतार्थ कर रही हैं। भारतवासी इस मामले में एकदम अंधे और असंवेदनशील हैं। वे जल्दी से किसी बात की गम्भीरता को महसूस नहीं कर पाते।
बिल्कुल गरीब और अनपढ़ और कम पढ़े लिखे तबके से लेकर पढ़े लिखे मध्य और उच्च वर्ग के तबके तक सभी देश के प्राकृतिक संसाधनों का जरुरत से ज्यादा दोहन करने में लगे हुये हैं। प्रकृति के साथ भद्दे मजाक किये गये हैं और वातावरण इतना ज्यादा बिगड़ गया है कि मौसम की चारों कलाओं के भरपूर सहयोग पर इतराने वाला देश अब हर मौसम में परेशान रहता है। सर्दी में ठंड से लोग मर जाते हैं तो गर्मी में ताप के ज्यादा होने से, बरसात अपने साथ बाढ़ और तबाही लेकर आती है और बसंत ऋतु तो एक से दो हफ्तों की ही रह गयी है।
साइंटिस्ट वर्ग की तरफ भी देश को ऊँगली उठानी है कि पिछले 60 सालों से वे पानी साफ करने की तकनीक भी नहीं खोज पाये हैं और देश का बहुत सारा पैसा, समय और ऊर्जा ऐसे शोध कार्य में खर्च होता रहा है और हो रहा है जिसकी भारत को तो कम से कम जरुरत है ही नहीं। बहुत सारे शोधकार्य तो विदेशों में छपने वाले जर्नल्स में पेपर्स छपवाने के लिये किये जाते हैं। तीन तरफ से समुद्र से घिरे रहने वाले देश में खारे पानी को साफ करने की कोई अच्छी तकनीक आज तक विकसित नहीं हो पायी है। वरदान की तरह देश की चौथी दिशा और देश में जीवन की जल की दशा को सहारा देने वाले हिमालय की भी दुर्गति होती जा रही है।
और सब बातों की तरह भारत पानी के मामले में भी दो हिस्सों में बँट गया है। एक वर्ग है जिसके पास पूरा दिन गुजारने और सब जरुरी काम करने के लिये भी एक बाल्टी से ज्यादा पानी नहीं है और दूसरा वर्ग घंटो पानी के फव्वारे के नीचे खड़े रह कर नहाने की आनन्द उठा सकता है या स्वीमिंग पूल में तैरने का आनन्द उठा सकता है और उठा रहा है।
अगर हालात नहीं सुधारे गये तो इन दोनों वर्गों में ही नहीं वरन देश के हर वर्ग का आदमी सड़क पर दूसरे वर्ग के आदमी से लड़ रहा होगा। यह संघर्ष किसी भी जाति धर्म के कारण हुये संघर्ष से ज्यादा भयानक होगा क्योंकि कैसे कोई किसी को पानी जैसी सबसे मूलभूत सुविधा से वंचित रख सकता है। अगर मानव को जीना है तो उसे पानी चाहिये ही चाहिये।
चेतन आनन्द ने अपनी पहली फिल्म नीचा नगर (1946) में ऐसे ही संघर्ष को दिखाया था। फिल्म सामाजिक विषमता जैसे अच्छे विषय के चयन और उच्च क्वालिटी के कारण भारत की पहली ऐसी फिल्म बनी जिसने Cannes Film Festival में Grand Prix Award जीता। हयातउल्ला अंसारी ने गोर्की की कहानी Lowly City से प्रेरित होकर इस कहानी को लिखा था और ख्वाजा अहमद अब्बास ने स्क्रीनप्ले लिखा था। प. रवि शंकर ने संगीत निर्देशन का मोर्चा संभाला था। चेतन आनद समेत फिल्म से जुड़े हुये ज्यादातर लोग इप्टा से जुड़े हुये थे।
अब चेतन आनन्द के भांजे शेखर कपूर जल संकट और उच्च और निम्न वर्गों के संघर्ष पर पानी फिल्म बनाने की और अग्रसर हैं। शेखर कपूर एक बड़े निर्देशक हैं जिनके पास ऐसे महत्वपूर्ण और व्यापक विषय पर एक अच्छी और संवेदनशील और गहरे सरोकार रखने वाली फिल्म बनाने की दूरदृष्टि और क्षमता है। उनके पास एक ग्लोबल विजन है। Masoom, The Bandit Queen, Elizabeth, The Four Feathers, Passage जैसी फिल्में बनाने वाले शेखर, और मानवता को प्रभावित करने वाले ऐसे विषयों के प्रति बेहद संवेदनशील शेखर और निजी जीवन में अध्यात्म की अपने स्तर पर खोजबीन करने वाले शेखर द्वारा एक बेहतरीन फिल्म बनाये जाने की अपेक्षा की जा सकती है।
सोये रहने वाला भारत देश और इसके वासी चेतन आनन्द की फिल्म से तो कोई शिक्षा नहीं ले पाये क्योंकि शायद उन्होने सोचा होगा कि जिस देश में दर्जनों नदियां बहती हों वहाँ पानी का संकट कैसे जन्म ले सकता है परन्तु समय ने ऐसा कर दिखाया है। आशा है अब तो देशवासी जागेंगे और पानी के महत्व और संकट को समझ कर जल प्रबंधन की ओर गम्भीर प्रयास करेंगे और शेखर कपूर की फिल्म लोगों को बड़े स्तर पर जाग्रत करने में एक बड़ी भूमिका निभायेगी। हो सकता है कि यह शेखर कपूर की सबसे महत्वपूर्ण फिल्म बन जाये।
…[राकेश]
4 Responsesto “Paani : चेतन आनन्द से शेखर कपूर तक”
[...] This post was mentioned on Twitter by Cinemanthan. Cinemanthan said: Paani : चेतन आनन्द से शेखर कपूर तक http://www.cinemanthan.info/index.php/2010/05/paani/ [...]
achi post gambhir mudda uthaya hai apne
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धन्यवाद विकास जी
bahut badhiya, Chetan Ananad se lekar Shehar tak samasya aur bhi vikral hoti gayi hai.
शुक्रिया विमल जी,
जल-समस्या तो विकराल होती जा रही है।