शीर्षक में शशि कपूर जैसे खूबसूरत कलाकार, जिनकी परदे पर छवि, कम से कम हिन्दी सिनेमा के संदर्भ में, एक रोमांटिक नायक की रही है, के साथ रॉबिनहुड जैसे नाम का जुड़ना थोड़ा अजीब सा तो लगता ही है परन्तु जरा सा रॉबिनहुड के चरित्र के साथ जुड़े मिथकों पर ध्यान दिया जाये तो दो व्यक्तित्वों के मध्य ऐसी तुलना उतनी अजीब नहीं लगेगी। मजे की बात है शशि कपूर ने कई फिल्मों के अपने सहकलाकार अमिताभ बच्चन को निर्देशन के क्षेत्र में अपने इकलौते प्रयास, “अजूबा” में रॉबिनहुड जैसा चरित्र ही दिया था।
बहरहाल शशि कपूर का रॉबिनहुड से क्या संबंध हो सकता है इसे जानने के लिये उनकी फिल्मोग्राफी पर एक नजर डालनी पड़ेगी। उन्होने 150 से कुछ ज्यादा फिल्मों में बतौर नायक या सहनायक के रुप में काम किया होगा और व्यवसायिक तौर पर सत्तर के दशक को उनका सबसे अच्छा काल माना जा सकता है जब उन्होने बॉक्स ऑफिस पर बड़ी सफलता पाने वाली कई फिल्मों में काम किया और इस काल में उन्होने 80 के आसपास फिल्मों में काम किया होगा।
सफल तो हिन्दी सिनेमा में बहुत से कलाकार हुये हैं परन्तु हिन्दी सिनेमा को आगे बढ़ाने का जैसा काम शशि कपूर ने किया वैसा किसी और अभिनेता ने नहीं किया। उन्होने विशुद्ध व्यवसायिक साँचे में ढ़ली फिल्मों में काम किया परन्तु इस तरीके से कमाये गये पैसे को उन्होने ऐश्वर्यपूर्ण जीवन जीने में खर्च नहीं किया बल्कि इस पैसे को उन्होने सुरुचिपूर्ण और कला से भरपूर फिल्में बनाने में लगाया। पैसा लगाते समय भी उन्हे पता ही होगा कि शायद जूनून, कलयुग, विजेता, 36 चौरंगी लेन और उत्सव जैसी फिल्में लागत भी नहीं निकाल पायेंगीं पर उन्होने साहस किया और निर्माता के तौर पर बेहद अच्छी फिल्में हिन्दी सिनेमा को उपहार में दी और हिन्दी सिनेमा के विकास में अविस्मरणीय योगदान दिया जिसकी बराबरी कम ही निर्माता कर सकते हैं।
उन्होने अपने समय, ऊर्जा, पैसे और संसाधनों का एक बड़ा हिस्सा अपने पिता स्वर्गीय पृथ्वी राज कपूर के सपने पृथ्वी थियेटर को निरंतर जिंदा बनाये रखने में भी लगाया।
उपरोक्त्त दो अन्य योगदानों के अतिरिक्त्त उनका एक अन्य योगदान भी है जो हिन्दी सिनेमा के किसी और अभिनेता के हिस्से में अभी तक तो नहीं ही आया है। मर्चेंट आइवरी की फिल्मों के माध्यम से उन्होने वैश्विक सिनेमा में भी अपनी पहचान बनायी। यह कहना एकदम वाजिब होगा कि एक अभिनेता के रुप में शशि कपूर का बेहतरीन और पूरी तरह पर निखरा रुप मर्चेंट आइवरी की हाउसहोल्डर, बाम्बे टाकिज, शेक्सपीयरवाला और हीट एंड डस्ट में देखने को मिलता है। इन फिल्मों में शशि कपूर के व्यक्तित्व का आकर्षण और अभिनेता के तौर पर विकास पूरी तरह से देखने को मिलता है।
मर्चेंट आइवरी के साथ अपने आखिरी गठबंधन मुहाफिज में भी एक ऐसे शायर के चरित्र में शशि कपूर अपने पूरे जलवे के साथ नजर आये। अंग्रेजी जैसी अच्छी पकड़ उर्दू पर शशि कपूर की कभी भी नहीं थी परन्तु तब भी उन्होने एक शायर की ढ़लती हुयी जिन्दगी को बखूबी निभाया और इस चरित्र को एक यादगार चरित्र बना दिया। ओम पुरी और शबाना आजमी जैसे कलाकारों के सामने शशि कपूर अपना एक अलग व्यक्तित्व इस फिल्म में लेकर सामने आते हैं।
मर्चेंट आइवरी की फिल्मों से इतर उन्हे कोन्राड रुक्स की महत्वकांक्षी फिल्म सिद्धार्थ में काम करने का भी मौका मिला।
विशुद्ध व्यवसायिक फिल्मों की बात करें तो वहाँ भी उन्हे एक सफल कलाकार ही माना जायेगा। जब जब फूल खिले, आमने सामने, हसीना मान जायेगी, शर्मीली, आ गले लग जा जैसी कई फिल्में हैं जहाँ वे एकलौते नायक थे और न केवल इन फिल्मों ने सफलता प्राप्त की बल्कि उनका अपना काम भी इन फिल्मों में सराहा गया। शशि कपूर के एकदम बिंदास रुप को देखने के लिये हसीना मान जायेगी के एक गाने को देखने की जरुरत है। यह इस फिल्म का पैरोडी गीत है जहाँ वे प्रेम गुरु बनकर अपने कॉलेज के सहपाठियों को प्रेम करने के नुस्खे सिखाते हैं। इस गीत में उन्होने महिला का रुप भी रखा है और यह काम उन्होने जबर्दस्त तरीके से किया है।
दो या उससे अधिक नायकों वाली फिल्मों में तो बहुत सारी ऐसी हिट फिल्में हैं जिनमें शशि कपूर ने भी अपना योगदान दिया और इनमें वक्त्त, प्यार किये जा, प्रेम कहानी, रोटी कपड़ा और मकान, त्रिशूल, दीवार, कभी कभी, दीवार, सुहाग, क्रांति, नमक हलाल, दो और दो पाँच आदि शामिल हैं। यश चोपड़ा ने उनके व्यक्तित्व का बहुत अच्छा उपयोग कभी कभी में किया।
उनकी सफल फिल्मों की फेहरिशत बहुत लम्बी है। परन्तु हिन्दी फिल्मों की ही बात करें तो शशि कपूर का अभिनेता अपने पूरे शबाब पर जूनून, विजेता, कलयुग, उत्सव और न्यू देहली टाइम्स में नजर आता है। इन फिल्मों को देख कर लगता है कि यूँ तो उन्होने ढ़ेर सारी सफल हिन्दी फिल्मों में काम किया लेकिन शायद शशि कपूर मसाला फिल्मों के लिये नहीं वरन ऐसी ही अर्थ पूर्ण फिल्मों के लिये ही बने थे। इन फिल्मों में अभिनेता के तौर पर अपना एक विराट रुप दिखाते हैं जो किसी भी स्तरीय अभिनेता को टक्कर दे सकता है। इन फिल्मों में किसी पर भी संक्षेप में लिखना न केवल इन बेहतरीन फिल्मों के प्रति अन्याय होगा बल्कि शशि कपूर के योगदान के प्रति भी अन्याय होगा और प्रत्येक फिल्म अलग से एक आलेख माँगती है।
सन 1938 में जन्मे शशि कपूर ने एक बाल कलाकार के रुप में चालीस के दशक में ही हिन्दी फिल्मों में कदम रख दिया था और पचास के दशक में लगभग बारह साल की आयु में उन्होने राज कपूर की बहुचर्चित फिल्म आवारा में उनके बचपन का रोल किया था। उसके ठीक दस साल बाद उन्हे नायक के रुप में धर्मपुत्र मिल गयी थी जो संयोग से यश चोपड़ा की भी एक निर्देशक के रुप में पहली फिल्म थी।
हिन्दी फिल्मों में व्यवसायिक सफलता उन्हे सूरज प्रकाश द्वारा निर्देशित फिल्म, “जब जब फूल खिले” से मिली जिसमें उन्होने एक भोले भाले कश्मीरी हाउसबोट चलाने वाले का रोल किया था जिसे एक पढ़ी लिखी, आधुनिक और अमीर लड़की से प्रेम हो जाता है। अपने समय के सबसे ज्यादा पढ़े लिखे अभिनेता को एक अनपढ़ हाउसबोट चलाने वाले का रोल निभाते देखने की कल्पना करना कुछ कठिन जान पड़ती है परन्तु शशि कपूर के आकर्षक व्यक्तित्व ने इस कमजोरी पर काबू पा लिया और अब तक लोग इस कल्पनाशील साँचे में ढ़ली इस फिल्म को आसानी से देख और सराह लेते हैं। हल्की फुल्की और रोमांटिक फिल्मों के लिये वे उपयुक्त कलाकार रहे।
बरसों उनका आकर्षक चेहरा फोटोग्राफी सिखाने वाली एक पुस्तक के कवर पेज पर छपता रहा।
अस्सी के दशक के शुरु में भी उन्होने कुछ व्यवसायिक फिल्मों के पाले में आने वाली कुछ सामाजिक फिल्में कीं जिनमें से कुछ ने अच्छी सफलता भी पायी परन्तु इस दशक के शुरु में ही हुयी उनकी पत्नी जेनिफर केंडल की असमय मृत्यु ने उनके जीवन को बहुत गहरे में प्रभावित किया।
शशि कपूर तब केवल 43 साल के थे। वे अगर जीवित रहतीं तो यह पक्का था कि शशि कपूर सिने जगत को और ज्यादा योगदान दे सकते थे। उनकी पत्नी उनकी रचनात्मक ऊर्जा का स्त्रोत और प्रेरणा थीं और उनके जाने ने शशि कपूर को शारीरिक स्वास्थ्य की तरफ से लापरवाह बना दिया और नब्बे का दशक शुरु होते होते वे तेजी से बुढ़ापे की और अग्रसर हो गये।
जवानी में अपने टेढ़े मेढ़े दांतो के बावजूद एक आकर्षक कलाकार कहे जाने वाले शशि कपूर उन लोगों में से रहे हैं जिनका चेहरा कलमों में आयी सफेदी के बावजूद खूबसूरत लगता है। जिस उम्र में आजकल के स्टार कॉलेज छात्रों और नवयुवक प्रेमियों के चरित्र निभा रहे हैं उस उम्र में शशि कपूर ने अपनी प्रचलित छवि से एकदम उलट एक कुरुप कहे जा सकने वाले मोटे संस्थानक का चरित्र उत्सव में निभाया था।
शशि कपूर खुद बहुत कम उम्र के थे जब उनके बेटों और बेटी ने फिल्मी दुनिया में अभिनेता बन कर कदम रख दिया था। उनकी तीनों संतानों में से कोई भी हिन्दी फिल्मों में नहीं चल पाया पर शशि कपूर की तरफ से अपनी संतानों को जबर्दस्ती आगे बढ़ाने के लिये उन्हे फिल्मों में थोपे जाने का कोई प्रयास कभी भी सामने नहीं आया।
उन्हे एक सज्जन पुरुष के रुप में ही जाना जाता रहा है।
शशि कपूर ने एक निर्माता और अभिनेता के तौर पर भारतीय सिनेमा को और एक संरक्षक के तौर पर पृथ्वी थियेटर के रुप में नाटक संसार को इतना योगदान दिया है कि वे सिनेमा के क्षेत्र में दिये जाने वाले दादा साहेब फाल्के पुरस्कार के चुनींदा और सर्वाधिक उचित व्यक्त्तियों की सूची में काफी ऊपर आते हैं। अगर पिछ्ले तीस सालों में 3-4 और भी ऐसे कलाकार होते जो हिन्दी सिनेमा में ऐसा योगदान दे पाते जैसा कि शशि कपूर ने एक निर्माता के तौर पर दिया तो हिन्दी सिनेमा के विकास में एक उल्लेखनीय प्रगति आज देखने को मिलती।
सिनेमा के भारतीय प्रेमी केवल आशा ही रख सकते हैं कि उनके जीवित रहते रहते उन्हे सिनेमा का उच्च्तम पुरस्कार देकर भारत सरकार उनके सिनेमा को दिये गये योगदान के प्रति न्याय करेगी।
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{Rakesh}
एक बेहद under-rated कलाकार – और एक अच्छा लेख.
कुछ महीनो पहले मैंने उन्हे पृथ्वी थियेटर मे देखा था. वो व्हील्चैर पे थे और ठीक तरह से बात भी नही कर पा रहे थे. बगल मे एक सहायक् था जिसकी ज़रूरत शायद उनके न चाहते हुए भी, उन्हे लेनी प़ड़ रही थी.
शक्ल पर फिर भी ह्ल्की सी मुस्कान थी – पृथ्वी थियेटर के चहल पहल को देख के.
पता नही मेरे चेहरे पे मुझे वो मुस्कान क्यूँ न दिखी.
दुखद तो लगता ही है उनके जैसे व्यक्तित्व को शारीरिक रुप से यूँ अस्वस्थ देखकर पर अंदर गहरे में तो वही शशि कपूर होंगे जो वे हमेशा से रहे हैं।
कभी कभी आदमी क्षणों के तात्कालिक प्रभाव में आ जाता है और शायद इसी कारण आप मुस्कुरा नहीं पाये। पर वहाँ उनके अपने द्वारा विकसित थिएटर में कुछ समय बिता कर मिल रही खुशी में आपकी मुस्कान उन्हे अच्छी ही लगती।
I am a big fan of Shashi Kapoor.
I was shocked to see him on wheel chair with very sad mood.
I pray to GOD that he may live healthy & happy long life.
shashi Kapoor mere Fevrit Hero Rahe Hain,
Unko Padhmashree Aword mila Mujhe Bahut Khushi Hui, Unhe aur bhi aword Milne Chahiye,Aja Tak Main Use rubaru Nahi Mil Paya Ek Baar milneki Tammana Hain,
shashiji ne Bahut Jald Filmo main Kaam Karma Choddiya, Ishwe shashiji ki helth ko achha rakhe aur wo hamesha Khush Rahe
Bharat arvindlal Mashruwal
Surat. Gujarat
Shashi jee, aap great ho
Salaam aap ko.