किशोर कुमार : यादों पे बसर करते हैं

किशोर कुमार : यादों पे बसर करते हैं

किशोर कुमार एक विलक्षण शख्सियत रहे हैं हिन्दी सिनेमा की और उनका बहुत बड़ा योगदान रहा है हिन्दी सिनेमा के प्रति, न केवल एक गायक के तौर पर बल्कि एक अभिनेता, निर्देशक, निर्माता और संगीतकार, लेखक और गीतकार के रुप में भी। किशोर कुमार के जीवन काल में ही उनके बारे में कितनी ही किवदंतियों ने जन्म ले लिया था और उनका वास्तविक रुप उनके बारे में फले इन किस्से कहानियों के पीछे छिप गया था। वे केवल एक हँसोड़ अभिनेता और प्रसिद्ध गायक ही नहीं थे वरन वे इन सब बातों से बहुत ऊपर के एक जीनियस और एक संजीदा इन्सान थे। उनकी बातें निराली थी और हँसी हँसी में ही वे बहुत गूढ़ अर्थों वाली बातें कह जाया करते थे।

उनके एक परम प्रशंसक कौस्तुभ पिंगले के सौजन्य से प्राप्त किशोर कुमार के जवाबों पर आधारित एक फीचर यहाँ दिया जा रहा है, यह सवाल जवाब वाला फीचर फिल्म पत्रिका माधुरी में 1987 में छपा था।

साभार : माधुरी (1987) एवम कौस्तुभ पिंगले

प्रश्न – आप एक समय एक्टिंग में टॉप पर थे| बड़ी बड़ी फिल्मों में काम करते थे| आपने अचानक एक्टिंग करना बंद क्यों कर दिया (श्रीराम स्वामी – नयी दिल्ली)

केके- कई फिल्मों में काम कर चुकने के बाद मैंने महसूस किया कि प्रोडयूसर जो कहानियां ला रहे हैं, उनमें कोई दम नहीं है। वे मुझसे सिर्फ उछलकूद करवा के कहानी आगे बढाने की बात करने लगे थे। मैं कलाकार नहीं, कॉमेडियन बन कर रह गया था जबकि कॉमेडियन बनाना कभी मेरा उद्देश्य नहीं रहा। इसलिए मैंने अभिनय से किनारा लेना ही बेहतर समझा।

प्रश्न – पिछले दिनों खबर छपी थी की आपने अपनी पत्नी लीना चंदावरकर के कहने पर मसूरी में एक बंगला खरीदा है। तो क्या आप बम्बई छोड़ कर मसूरी में रहना चाहते हैं ? (कैलाशचंद्र सूद – देहरादून )

केके- हमने, मैंने या लीना ने मसूरी में कोई बंगला नहीं खरीदा है| एक बार मैं मसूरी गया ज़रूर था पर बंगला खरीदने नहीं| अपने दल बल के साथ मैं बद्रीनाथ की यात्रा पर गया हुआ था. बदरीनाथ से लौटते वक़्त रास्ते में एक जगह एक छोटी सी पंसारी की दूकान दिखाई दी जो मुझे बड़ी पसंद आई| उसे एक बुढ़िया चलाती थी| मैं वहीँ बैठकर उस बुढ़िया माँ से बातों में लग गया और सामान का भाव पूछता रहा| एक दाल उठाकर मैंने पूछा, “यह क्या है?” अम्मा ने बताया, “यह मसूर की दाल है“।
बस, तुरंत मुझे मसूरी याद आ गयी, मैंने पूछा, “यहाँ से मसूरी जा सकते हैं?”

सचमुच वहाँ से मसूरी को एक सीधा रास्ता जाता था| मैंने अपना सारा काफिला मसूरी की राह पर मोड़ लिया| शायद तभी यह अफवाह उड़ी हो कि मैं मसूरी में बंगला खरीद रहा हूँ”

प्रश्न – आप अभिनेता भी है और गायक भी| दोनों में से खुद आपको क्या पसंद है, अभिनय या गाना, और क्यों? (पारसमणि पाण्डेय – बरेली )

केके- मुझे निश्चित रूप से गाना ज्यादा पसंद है| इसकी वजह बहुत सीधी और साफ है, मैं तो गाना गाने के लिए ही बम्बई आया था | पहले गाना ही गाया, एक्टर तो बाद में बना| एक्टिंग चाहे कितनी ही असली जैसी क्यों न लगे रहती तो सदा नकली ही है| लेकिन संगीत में नक़ल नहीं होती| वह तो परम सत्य है, दिल से निकलता है| मैं यह भी मानता हूँ की मुझे अभिनय ने उतना मान नहीं दिया जितना संगीत ने दिया है|

प्रश्न – अगर मैं फिल्मों में प्लेबैक सिंगिंग करना चाहूं तो मुझे क्या करना चाहिए? (देवाशीष कर्नाड – बंगलोर)

केके- अगर आपकी आवाज़ किसी मशहूर सिंगर जैसी हो, या आप उसकी तरह गाना पसंद करते हो तो प्लेबैक सिंगर बनाने की कोशिश छोड़ देनी चाहिए| नक़ल बनाने की कोशिश से कोई फायदा नहीं| अगर आवाज़ में आपका कोई अपनापन हो और आप नतीजे की परवाह किये बिना लगातार मेहनत करने को राज़ी हो, तो आपको दो तीन अच्छे म्यूजिक डायरेक्टर्स से मिलकर उन्हें अपने गाने सुनाने चाहिए|

प्रश्न – आप फिल्में क्यों बनाते हैं, पैसा कमाने को, नाम कमाने को, या सिर्फ आपकी इच्छा पूरी करने के लिए? (उमा त्रिवेदी – लखनऊ)

केके- पैसा कमाने को दो तरह की फिल्में बनती हैं| एक वे जिनमें बड़े बड़े स्टार्स होते हैं| दूसरी वे जिनमें भरपूर सेक्स और मारामारी रखी जाती है| मेरी फिल्मों में न स्टार्स होते, न कॉमर्शियल वल्यू। मैं न तो स्टार्स के पीछे भाग सकता हूँ, न ठेठ मसाला जुटा सकता हूँ|
मुझे दुनिया भर की क्लासीकल फिल्में देखने का शौक है| उनकी वीडियो कैसेट्स भी मैं जमा करता हूँ| उन्हें देख देख कर कुछ अच्छा काम करने की इच्छा जाग्रत होती है| इसलिए बार बार अपनी इच्छा के मुताबिक़ बढ़िया सी फिल्म बनाने की कोशिश करता रहता हूँ| पर यह देखकर की अच्छी, साफ़ सुथरी फिल्मों में किसी की दिलचस्पी रह नहीं गयी है, अच्छी फिल्म बनाने का शौक और इच्छा दोनों ही ख़त्म होते जा रहे हैं|

प्रश्न – माधुरी में ही आपका इंटरव्यू पढ़ा था की आप अच्छे गाने न मिलने की वजह से दुखी होते हैं| क्या आप बताएँगे की अच्छा गाना क्या होता है ? ( कुसुम उप्रेती – रानीखेत )

केके- इसका जवाब अपने ही दिल से क्यों नहीं पूछ लेतीं| अगर वहाँ से जवाब नहीं मिलता तो मेरे इस सवाल का जवाब सोचिये की आपको पुराने समय के गानों और आज के गानों में फर्क क्यों लगता है? क्यों 20-20 बरस पुराने गाने आज भी संगीत प्रेमियों की ज़बान पर चढ़े हुए हैं और क्यों वही संगीत प्रेमी अभी दो साल पहले की फिल्मों के गाने नहीं गुनगुनाते?

प्रश्न – आप सबसे ज्यादा किस चीज़ से डरते हैं ? पत्नी से, ‘इन्कम -टैक्स ’से, या भगवान् से ? ( राजकुमार कोहली – बम्बई )

केके- भगवान को प्रार्थना से मनाया जा सकता है और रूठी पत्नी थोड़े नखरों के बाद, थोड़ी खुशामद, थोड़े प्यार से मान जाती है| लेकिन इन्कम-टैक्स? भगवान् बचाए ! मैं उसी से सबसे ज्यादा डरता हूँ!

प्रश्न – मैं एक बार आपसे मिली थी| ज़रा देर की उस मुलाक़ात में आप मुझे बड़े गंभीर आदमी लगे थे| लेकिन जब भी मैं आपके ’स्टेज प्रोग्राम’ देखती हूँ, तो आप बिलकुल दुसरे आदमी नज़र आते हैं| आपका कौनसा रूप असली है? (सविता जैन, लाल कोठी, भैरों जी का रास्ता, जयपुर)

केके- मुझे आपका सवाल बड़ा अच्छा लगा क्योंकि कलाकारों को इस तरह समझने की कोशिश कम ही लोग करते हैं| जिस किशोर कुमार को आपने स्टेज पर देखा है, वह बनावटी है, दूसरों को खुश करने वाला, अपने गम, अपनी परेशानियां दबाकर भी नाचने गाने वाला| असली किशोर वही है जो आपको मिला था – गंभीर, अपने आप में खोया हुआ|

प्रश्न – आपके मुताबिक दुनिया में संगीत का जन्म कब और कैसे हुआ होगा (चिरंजीत, पटियाला)

केके- इंसान को हर खूबसूरत चीज नेचर से मिली है, नेचर से मतलब प्रकृति से। संगीत भी हमें प्रकृति से ही मिला है। हवा चलती है तो उसकी अपनी आवाज होती है। बादल गरजते हैं तो अलग आवाज होती है। बिजली कड़कने, पानी बरसने, नदी के बहने, और सागर की लहरों के उछलने की आवाज में अपना एक रस होता है। इसके साथ मिली होती है पक्षियों की मधुर वाणी।  इन सबको हमारे पूर्वजों ने सुर-ताल में बाँधा होगा। फिर राग रागनियाँ बने होंगे। सुबह के समय प्रकृति की आवाज, दिन और शाम की आवाजों से अलग होती है। इसलिये रागों को गाने बजाने का समय भी अलग नियत किया गया होगा।

प्रश्न – आजकल जिस तरह के गाने आपको दिये जाते हैं, उनके बारे में अपाने बार बार शिकायत की है, कि आपको अपनी मर्जी के गाने नहीं मिलते। तो फिर आप खुद ही म्यूजिक डायरेक्टर क्यों नहीं बन जाते ( मो. असलम खान- हुबली)

केके- मैं तो बन जाऊँ, पर कोई मुझे अपनी फिल्म में संगीत देने के लिये कहे भी तो। प्यारे भाई – ’फिल्म इंडस्ट्री’ में अपनी मर्जी नहीं, दर्शकों की मर्जी चलनी चाहिये। मैंने एक बार म्यूजिक डायरेक्शन किया था, फिल्म थी वीरप्पन की ’जमीन आसमान’, जो बिल्कुल नहीं चली थी। तबसे मैं अपनी ही फिल्मों के म्यूजिक डायरेक्शन तक सीमित रह कर खुश हूँ।

प्रश्न – आप अपनी आवाज को कंट्रोल में रखने और उसे बढ़िया बनाये रखने के लिये क्या करते हैं? क्या प्रेक्टिस से आवाज सुरीली हो सकती है? (नटवर लाल पुरोहित- गाँधीनगर)

केके- आवाज कंट्रोल में रखने के लिये कोई कोशिश करने की मुझे कभी जरुरत ही नहीं पड़ी, हाँ रेकार्डिंग से पहले दिन मैं भरपूर आराम आवश्यक समझता हूँ और रेकार्डिंग वाले दिन एकदम हल्का भोजन करता हूँ। इससे ताजगी बनी रहती है। अभ्यास करने से, करते रहने से आवाज सुर ताल में बँध सकती है इसमें कोई शक नहीं। मैने तो कभी कहीं संगीत की कोई शिक्षा नहीं ली है। जो कुछ गा पाता हूँ सब सिर्फ अभ्यास ही की देन है।

प्रश्न – ज़िन्दगी में आप सबसे ज्यादा खुश और सबसे ज्यादा दुखी किस बात से हुये हैं? (लीला कठमाल – लखनऊ)

केके- सबसे ज्यादा खुश मैं तब हुआ जब 52 वर्ष की आयु में भगवान ने मुझे दूसरा बेटा दिया, सुमीत। सबसे ज्यादा दुखी मैं तब हुआ जब ईश्वर ने हमारी माँ सरीखी भाभी (श्रीमती अशोक कुमार) को उठा दिया।

प्रश्न – दुनिआ की बहुत सैर की है आपने, बहुत सी जगहें देखी होंगी, आपको सबसे अच्छी जगह कौन सी लगती है? (डेविड रुप किशोर – गोवा)

केके- मौसम के लिहाज से लंदन, मनोरंजन के लिये डिज्नीलैंड, जंगली जानवरों की कुदरती खूबसूरती की दृष्टि से अफ्रीका और सारे सुख चैन के लिहाज से बम्बई स्थित मेरा घर। अंग्रेजी कहावत सुनी होगी आपने “east or west, home is the best

प्रश्न – लोग आपको “eccentric genius” –  यानी सिरफिरा प्रतिभाशाली पुरुष कहते हैं। क्या आप मानते हैं कि आप जीनियस हैं? (पारसराम – पटना)

केके- जीनियस वो होता है जिसका हर काम कमाल का हो। मैने एक्टिंग में नयी ऊँचाइयाँ बुलंद नहीं कीं। मेरे गाने में कोई बड़ी खासियत नहीं, मेरी बनायी फिल्में नहीं चलतीं, तब मैं कहाँ से जीनियस हूँ?

4 Responsesto “किशोर कुमार : यादों पे बसर करते हैं”

  1. एक बहुत ही शानदार व्यक्तित्व के इस वार्तालाप से रूबरू कराने के लिये शुक्रिया…

  2. cinemanthan says:

    नागरिक जी,

    धन्यवाद

  3. SHEETAL THAKKAR says:

    GOOD ITNA SHANDAR SANGRAH PAHALE NAHI DEKHA KISHORE DA PAR AISE HI KUCH NA KUCH DETE RAHE

  4. rafat alam says:

    किशोर कुमार और राजकपूर साब ,ये दो ही महानुभाव नाचीज़ के विचार में सिने जगत के सच्चे आलराउंडर गुज़रे हैं.बहुआयामी व्यक्तित्व में एक परफेक्ट गायक (और गायकी का अंदाज़ भी वोह कि जो ना पलहे किसी का था और शायद अब किसी का होगा) तो दूसरे राज साब मनमोजी महान कलाकार जिनका अभिनय स्टाइल भी अनूठा है .बाकि अन्य आयाम निर्माता ,निर्देशक आदि का तो क्या कहना (किताबें बन सकती हैं और बनी हैं ).वक्त का खेल देखये जो लोग दिलीप साब या इन के सामने कांपते थे आज शताब्दी के सितारे बने फिर रहे हैं .खेर .
    आपने किशोर साब पर बहुत ही सुंदर फिचेर इंटरवीऊ ,सवाल जवाब की रूप में पर्स्तुत किया है जिसमें उस महान कलाकार का जीवन और दर्शन परत दर परत पाठक के सामने खुलता है और वोह मत्रमुगध पढता ही रह जाता है.कितने ही अनछुए प्रसंग उजागर हुए हैं और काफी नई जानकारी किशोर साब के बारे में मिली उसके लिए आपको साधुवाद. किशोर दा के एक जवाब का अंश हाज़िर है .देखिये सादगी और सच्चाई.
    जिस किशोर कुमार को आपने स्टेज पर देखा है, वह बनावटी है, दूसरों को खुश करने वाला, अपने गम, अपनी परेशानियां दबाकर भी नाचने गाने वाला| असली किशोर वही है जो आपको मिला था – गंभीर, अपने आप में खोया हुआ|जी तो चाहता है सारे फीचर की नकल करदूं. चलिए साब राजनीति की भाषा में पढ़ा हुआ (सो बार नकल किया हुआ) मान लिया जाए .एक बार फिर थैंक्स फॉर दिस एक्स्सलेंट फीचर.

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