रंजीत कपूर : थियेटर के एवरेस्ट पर झण्डारोहण से चिंटू जी के सृजन तक

रंजीत कपूर : थियेटर के एवरेस्ट पर झण्डारोहण से चिंटू जी के सृजन तक

विख्यात थियेटर निर्देशक (और अब फिल्म निर्देशक भी) और लेखक रंजीत कपूर की रगों में थिएटर एक तरह से बचपन से ही समाया हुआ था क्योंकि नाट्यशास्त्र और रंगमच की दुनिया से उनका सम्बंध तभी जुड़ गया था जब वे अपने अनुज अन्नू कपूर (अभिनेता) के साथ म.प्र, उ.प्र. राजस्थान, महाराष्ट्र, गोवा, दमन और दीव और अन्य प्रदेशों में अपने पिता की घुमंतु पारसी थिएटर कम्पनी के साथ घूमते थे। नाटकों में काम करते थे, नाटकों का प्रचार करते घूमते थे। अगर पिता रंगकर्मी तो माँ एक ख्याति प्राप्त शायरा जो देश भर में होने वाले मुशायरों में शिरकत करती थीं। ऐसे माहौल में रंजीत कपूर और अन्नू कपूर के कलाकार बनने के संयोग ही सबसे ज्यादा प्रबल थे और ऐसा ही हुआ।

बड़े होने पर रंजीत कपूर NSD से निर्देशन का कोर्स (1973-76 बैच) करने दिल्ली आ गये और उन्होने अपनी रचनात्मक श्रेष्ठता की झलक तभी दिखा दी थी जब उन्होने NSD में जर्मन क्लासिक नाटक Woyzeck’ (George Buchner) का निर्देशन किया था और उन्हे सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार प्रदान किया गया था। इस नाटक में नायक की भूमिका निभाई थी उनके बैचमेट और आज के दौर के भारत के सबसे बेहतरीन अभिनेता पंकज कपूर ने और उस नाटक में अच्छे अभिनय के लिये उन्हे भी सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला था।

उसके बाद उन्होने NSD Repertory Co. में कुछ अरसे तक काम किया और उसे छोड़ने के बाद से ही एक फ़्रीलांसर लेखक और निर्देशक के तौर पर थियेटर और टेलीविजन पर काम करते रहे हैं।

पिछले तीस सालों से ज्यादा समय से वे थिएटर के क्षेत्र में अपने झंडे गाड़ते आ रहे हैं। देश भर के कई क्षेत्रों और शहरों, दिल्ली, मुम्बई, पुणे, कोलकाता, बंगलोर, लखनऊ, भोपाल, हिमाचल प्रदेश और छत्तीसगढ़ आदि में उन्होने थिएटर वर्कशॉप आयोजित कीं हैं और बहुत सारे बेहतरीन नाटकों का निर्देशन किया है और कितने ही नाटकों को किताबों से निकाल कर उन्हे मंचित करके उनके अंदर मौजूद सामग्री को जीवन प्रदान किया है।

बिच्छू, शेर-अफगान, बेग़म का तकिया, मुख्य मंत्री, एक रुका हुआ फैसला, एक घोड़ा छह सवार, Poor Bitos, कव्वा चला हंस की चाल, Bury the Dead, कुरु कुरु स्वाहा, चैनपुर की दास्तान, खूबसूरत बहू, एक मामूली आदमी, कोर्ट मार्शल, पैर तले की जमीन, आदर्श हिन्दु होटल, एक मुसाफिर बे-असबाब, सूरजमुखी और हेमलेट, बहुत बड़ा सवाल, मेरा दोस्त राजू, द जनपथ किस, अंतराल, शार्ट कट – द मयूजिकल, एक संसदीय समिति की उठक बैठक, अफवाह, चेखव की दुनिया, हम रहे ना तुम, और अतियों का तहखाना और अन्य बहुत सारे नाटकों ने उनके निर्देशन में देशव्यापी ख्याति पायी।

बिना वजह ही रंजीत कपूर को थियेटर की दुनिया में एक शहंशाह नहीं समझा जाता रहा है। प्रसिद्ध लेखक स्व. मनोहर श्याम जोशी जी की विलक्षण कृति कुरु कुरु स्वाहा को मंचित करने का साहस कोई विलक्षण प्रतिभा वाला रंगकर्मी ही कर सकता है। रंजीत कपूर के अन्य बहुत सारे नाटकों की तरह कुरु कुरु स्वाहा ने भी ख्याति पायी और उन्हे जबर्दस्त प्रशंसा मिली इस क्लिष्ट मगर बेहद मनोरंजक पुस्तक को नाटक के रुप में प्रस्तुत करने के लिये।

रंजीत खुद अपने इस हिट नाटक के प्रदर्शन से जुड़ा हुआ एक रोचक प्रसंग बताते हैं।

कुरु कुरु स्वाहा की एक प्रस्तुती देखने स्वयं मनोहर श्याम जोशी अपनी धर्मपत्नी के साथ आये। प्रदर्शन के बाद जोशी जी अपनी धर्मपत्नी के साथ स्टेज के पीछे आये और मुझे बधाई दी। श्रीमति जोशी ने मेरा हाथ थामा और कहा,” भइया हमें तो आज समझ में आया कि इन्होने लिखा क्या है “। जोशी जी ठहाका लगाकर हँस पड़े। भाभी जी की टिप्पणी मेरे लिये सबसे बड़ा कॉम्पलीमेंट था।”

जोशी जी की कुछ कृतियाँ उच्च स्तरीय फिल्में बनाने के लिये एकदम उपयुक्क्त हैं और उनकी मनोरंजक मगर जटिल कथानक और प्रकृति वाली पुस्तकों पर फिल्में बनाने के लिये रंजीत कपूर जैसी साहित्यिक समझ वाले रंगकर्मी और फिल्ममेकर की जरुरत है।

रंगमंच के क्षेत्र में उनके मूल्यवान योगदान के लिये 2006 में संगीत नाटक अकादमी ने उन्हे अपने सर्वोच्च सम्मान से नवाजा और पूर्व राष्ट्रपति डा. अब्दुल कलाम ने उन्हे यह पुरस्कार प्रदान किया। उन्हे साहित्य कला परिषद (दिल्ली) सम्मान भी दिया गया और म.प्र ने उनके योगदान को शिखर सम्मान देकर सम्मानित किया।

80 के दशक के शुरु में ही उनका जुड़ाव फिल्मों से भी हो गया। शशि कपूर द्वारा निर्मित और श्याम बेनेगल द्वारा निर्देशित कलयुग में उन्होने अभिनय भी किया और प्लांट मैनेजर की भूमिका प्रभावी ढ़ंग से निभाई। बाद में कई साल बाद उन्हे राज कुमार संतोषी की फिल्म हल्ला बोल में देखा गया और इस फिल्म में उन्होने एक फिल्म निर्देशक की भूमिका निभाई।

80 के दशक के शुरु में ही उन्होने अपनी रचनात्मकता के एक और पहलू का परिचय दुनिया को दिया और अशोक आहुजा की फिल्म आधारशिला के लिये गीत लिखे और उन्हे संगीत से भी सजाया।

भूपेन्द्र के गाये एक दुर्लभ गीत को सुनने वाले रंजीत कपूर की रचनात्मकता की सराहना करे बिना नहीं रह सकते।

सपनों का शहर है ये सपनों का शहर
ये जागे ना जागे किसे है खबर
सपनों का शहर है ये सपनों का शहर
रंग बिरंगे परदे हैं काली काली यादों पर
ऊँची ऊँची तामीरे हैं दलदल की बुनियादों पर
दिलेजार रुक जा जरा तो ठहर
सपनों का शहर है ये सपनों का शहर

इसी फिल्म में उन्होने एक अन्य गीत की रचना की जो उस समय काफी प्रसिद्ध भी हुआ था। सुरेश वाडेकर और दिलराज कौर द्वारा गाया गया यह गीत था।

महका हुआ गुलाब हो तुम
शबनम कभी शराब हो तुम
बस मैं इतना समझ न पाऊँ
सचमुच हो या ख्वाब हो तुम

दिल तो पागल है के गीत ले गयी ले गयी की शुरुआती धुन और इस गीत की शुरुआती धुन कुछ समानतायें लिये हुये हैं। दिल तो पागल है में संगीत देने वाले उत्तम सिंह ने आधारशिला में भी ऑर्केस्ट्रा की जिम्मेदारी संभाली थी।

बहरहाल 1981 में रंजीत कपूर ने स्टेज पर एक नाटक किया “एक रुका हुआ फैसला“, हॉलीवुड की प्रसिद्ध फिल्म 12 Angry Men से प्रेरित इस नाटक ने देश भर में जबरदस्त सफलता पायी और बम्बई में इसके प्रदर्शन के समय यश चोपड़ा ने भी इसे देखा और प्रभावित होकर उन्होने रंजीत कपूर को इस पर फिल्म बनाने का प्रस्ताव दे दिया। परन्तु किन्ही कारणों से इस मामले में प्रगति नहीं हो पायी और बाद में रंजीत कपूर ने अपने लिखे नाटक पर फिल्म बनाने की स्वीकृति बासु चटर्जी को दे दी जो इसे स्वयं निर्देशित करना चाहते थे। रंजीत कपूर ने एक शर्त रखी थी कि उनके नाटक में काम करने वाले अभिनेता ही फिल्म में भी काम करेंगे। बासु चटर्जी ने इस शर्त को मान लिया परन्तु अंतिम समय पर नाटक में अभिनय करने वाले दो अभिनेता राम गोपाल बजाज और विनोद नागपाल फिल्म में काम नहीं कर पाये और राम गोपाल बजाज द्वारा निभाई गयी भूमिका को निभाया दीपक केजरीवाल/काजिर ने और विनोद नागपाल द्वारा निभाई गयी भूमिका गयी सुबीराज के खाते में। फिल्म से स्पष्ट है कि सुबीराज ने अपनी भूमिका को अति नाटकीय अंदाज में निभाया और अगर विनोद नागपाल, जो कि अस्सी के दशक में अपने अभिनय के जलवे टीवी के माध्यम से दुनिया को दिखा रहे थे, ही फिल्म में भी काम करते तो निस्संदेह फिल्म की गुणवत्ता ज्यादा होती और इसका असर ज्यादा होता।

रंजीत कपूर कुंदन शाह के साथ “जाने भी दो यारो” लिखने में लग गये। उसी समय उन्होने विधु विनोद चोपड़ा के साथ “खामोश” की स्क्रिप्ट पर भी काम किया और फिल्म के लिये संवाद लिखे।

अस्सी के ही दशक में उन्होने एक बार फिर अपनी ही लिखी एक कहानी पर नसीरुद्दीन शाह और शबाना आजमी को लेकर एक कामेडी फिल्म बनाने की कोशिश की परन्तु थियेटर में पूरी आजादी से काम करने वाले कुछ हद तक आदर्शवादी रंजीत कपूर को निर्माताओं द्वारा शर्तें लादना और निर्देशक के काम में दखल देना नहीं भाया और वे निर्देशक के तौर पर थियेटर की दुनिया में ही व्यस्त हो गये और जब कभी भी कोई अच्छा प्रस्ताव मिला फिल्मों में लेखन का काम करते रहे।

अस्सी के दशक के मध्योपरांत जब भारत में टीवी एक मह्त्वपूर्ण स्थान ले चुका था और सिनेमा और थियेटर की दुनिया के बड़े बड़े नाम टीवी की दुनिया को दूरदर्शन के जरिये गुलजार कर रहे थे, रंजीत कपूर ने भी चेखव की दुनिया, बसंती, पुरवाई और अमीर खुसरो जैसे उच्च स्तरीय धारावाहिक बना कर टीवी की दुनिया में भी अपनी एक छाप छोड़ी। दुर्भाग्य से किन्ही कारणों से दिल्ली दूरदर्शन ने चेखव की दुनिया जैसा बेहतरीन धारावाहिक छह किस्तों के बाद प्रसारित नहीं किया जबकि उन दिनों सामानयत: 26 किस्तों के लिये धारावाहिक मंजूर किये जाते थे। ऐसा किया जाना न केवल दर्शकों के लिये एक हानि था क्योंकि वे चेखव के विश्व स्तरीय साहित्य से कुछ चुनींदा कहानियों को टीवी पर देखने से वंचित रह गये बल्कि दिल्ली दूरदर्शन भी एक अच्छे कार्यक्रम को प्रस्तुत करने से चूक गया। रंजीत कपूर को तो निश्चय ही हानि पहुँची ऐसे निर्णय से क्योंकि उनका एक उम्दा प्रयास दर्शकों के सामने नहीं पहुँच पाया।

कुंदन शाह ने फिर से उन्हे अपनी फिल्म “कभी हाँ कभी ना” पर काम करने के लिये आमंत्रित किया और रंजीत कपूर ने इस फिल्म के लिये संवाद लिखे और लगभग उसी समय रंजीत कपूर को शेखर कपूर की महत्वाकांक्षी फिल्म “द बेंडिट क्वीन” के लिये संवाद लिखने का निमंत्रण मिला और उन्होने अपनी लेखनी के बलबूते बेहतरीन योगदान दिया दोनों ही फिल्मों में। बाद में उन्होने राज कुमार संतोषी की कुछ फिल्मों में अपनी लेखनी के बलबूते योगदान दिया जिनमें लज्जा और हल्ला बोल प्रमुख हैं।

इसे हिन्दी फिल्मी दुनिया की एक अजीब प्रकृति ही कहा जायेगा कि थियेटर की दुनिया के इतने बड़े निर्देशक और फिल्मों के एक प्रसिद्ध लेखक को अपनी खुद की फिल्म निर्देशित करने का अवसर तब मिलता है जब वे उस आयु वर्ग में पहुँच जाते हैं जब कि नौकरी करने वाले लोग सेवानिवृति के महीने गिन रहे होते हैं। कुछ छिटपुट कमियों के अलावा रंजीत कपूर द्वारा निर्देशित फिल्म चिंटू जी एक उम्दा और मनोरंजक फिल्म है। यूँ तो ऋषि कपूर ने अपने लम्बे अभिनय जीवन में कई बार बेहद उम्दा अभिनय का प्रदर्शन किया है पर उनकी जीवनी में “मेरा नाम जोकर” और “चिंटू जी” में किया अभिनय अलग से चमकते हुये अक्षरों में लिखा जायेगा।

परिस्थितिजन्य हास्य और संवेदनापूर्ण सामाजिक सरोकार ही नहीं वरन संगीत पर भी गहरी पकड़ रंजीत कपूर ने अपने द्वारा निर्देशित पहली फिल्म में दिखायी है। अगर अकीरा कुरोसावा, विटोरियो डी सिका आदि सिनेमा के अमर नामों से सजा गाना रंजीत कपूर की असीमित कल्पना की झलक दिखाता है तो चाय के बहाने वाला गीत वास्तव में कुछ सूकून के क्षण प्रदान करता है और गीत को फिल्माने का तरीका स्पष्ट कर देता है कि गीत को अभी भी पुरानी अच्छी हिन्दी फिल्मों की तरह कथानक को आगे बढ़ाने वाले तत्व के रुप में प्रस्तुत किया जा सकता है और गीत की फिल्म में उपस्थिति को प्रासंगिक बनाया जा सकता है। गीत के दृष्य इसके बोलों के अनुसार ही उभर कर आते हैं और गीत को एक विजुअल अर्थ प्रदान करते हैं। क्लोज अप, मीडियम, वाइड एवम एक्सट्रीम वाइड एंगल और एरियल शॉट्स के मिश्रण से सजा इस गीत का प्रस्तुतीकरण स्पष्टतया दर्शा देता है कि हिन्दी फिल्म संसार को एक अन्य निर्देशक मिल गया है जो गीत को आकर्षक ढ़ंग से प्रस्तुत करने की योग्यता रखता है।

गलत मार्केटिंग की बदौलत चिंटू जी का बॉक्स ऑफिस पर भले ही कमजोर प्रदर्शन रहा हो पर स्वस्थ मनोरंजन की चाह रखने वाले दर्शकों के लिये इस फिल्म की डीवीडी अपने संग्रह में रखने वाली चीज है जो उन्हे समय समय पर हँसाती रहेगी, और उनकी संवेदनशीलता को उभारती रहेगी।

आशा है निकट भविष्य में रंजीत कपूर कुछ अन्य उम्दा फिल्में दर्शकों को देंगे। ऐसा सुनने और पढ़ने में आया था कि वे एक लेखक के तौर पर डा. असग़र वजाहत के प्रसिद्ध नाटक “जिन लाहौर नहीं वेख्या” पर आधारित एक फिल्म की रुपरेखा पर काम कर रहे थे। शायद राज कुमार संतोषी फिल्म को निर्देशित करेंगे।

थियेटर संसार की भाँति फिल्म संसार में भी उम्दा योगदान की रंजीत कपूर से आशा है।

5 Responsesto “रंजीत कपूर : थियेटर के एवरेस्ट पर झण्डारोहण से चिंटू जी के सृजन तक”

  1. aachaaryjee says:

    सुन्दर लेखन।

  2. cinemanthan says:

    धन्यवाद आचार्य जी

  3. Ranjit Kapoor says:

    Thanks a million. I’m overwhelmed & gtateful!

    God bless you and Cine Manthan.
    Amen!

    Ranjit Kapoor

  4. Ranjit Kapoor says:

    Thanx a million. I’m overwhelmed & grateful.

    God bless you & Cine Manthan.

    Amen!

    Ranjit Kapoor

  5. cinemanthan says:

    रंजीत जी,
    यहाँ पधारने और शुभकामनाओं के आशीर्वचन के लिये आपका बहुत बहुत धन्यवाद

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