इजाज़त के शुरु के कुछ मिनट और कतरा कतरा गाने का फिल्मांकन , दोनों बेहद जिम्मेदारी से भारतीय पर्यटन को बढ़ावा देने का काम कर सकते हैं।
हरियाली, पेड़, फूल पत्ते, पहाड़, चटटाने, नदी, आकाश, बादल, सूरज, उजाला, छाया, विम्ब, प्रतिविम्ब, ओस, आदि इत्यादी प्रकृति की खूबसूरती से भरे नजारे इन भागों में भरे पड़े हैं जिन्हे अशोक मेहता के कैमरे ने प्रकाश, छाया और रंगों के मिश्रण के द्वारा गुलज़ार के निर्देशन की छत्रछाया में इंद्रधनुषी खूबसूरती के साथ दर्शाया है।
इजाज़त मूलतः एक प्रेम कहानी है जो ताजगी भरे अहसास को दर्शकों तक लाती है। सुखद बात यह है इस फिल्म के साथ कि तमाम अन्य हिन्दी फिल्मों की तरह यह घिसी पिटी और फार्मूलों पर आधारित प्रेम कहानी नहीं है। यहाँ प्रेमियों के अलगाव के पीछे किसी खलनायक का कोई षडयंत्र नहीं है। यहाँ किरदार खुद जिम्मेदार हैं अपने द्वारा उठाये गये अच्छे और बुरे कदमों के लिये। कोई उन्हे बरगलाता नहीं है, कोई गलतफहमी भी उत्पन्न नहीं करता। इजाज़त जिंदगी को अपनी समझ से जीते चरित्रों की कहानी है।
इजाज़त बेहद सभ्य किरदारों की प्रेम कहानी है। ज़िन्दगियाँ यहाँ दुख तो पाती हैं पर दोषी कोई नहीं है। बेहद अच्छे लोग भी गलतियाँ कर जाते हैं। बेहद सुलझे हुये लोग भी वह देख लेते हैं जो शायद सच तो है पर उस सच की व्याख्या वह नहीं है जो उन्होने कर ली है और जिसके वशीभूत होकर वे कुछ ऐसा निर्णय ले लेते हैं जो उनके और उनके प्रिय के जीवन में दुख लेकर आता है।
स्त्री-पुरुष के मध्य रिश्ते पर बनी यह फिल्म गुलज़ार की ऐसे ही सम्बंधो पर बनी अन्य फिल्मों से ज्यादा गुणवत्ता वाली है। यह फिल्म 1987 में रिलीज हुयी थी जबकि हिन्दी सिने उद्योग से हर हफ्ते ऊटपटाँग फिल्में आने का दौर जोर पकड़ चुका था। बहुमत बेहद ऊलजलूल किस्म की फिल्में रिलीज होने का था और ऐसे कुरुपता फैलाते वातावरण में इजाज़त सौन्दर्य का अवतार बन कर आयी थी और तब से यह हिन्दी सिनेमा में कवित्त भाव लिये हुयी कुछ सिरमौर फिल्मों की जमात में ससम्मान शामिल हो चुकी है और सालों से दर्शकों को लुभाती आ रही है।
कथा और एक तार्किक कथा से ज्यादा इजाज़त का महत्व है फिल्मांकन में। दृष्य दर्शक को मनाते हैं, प्रभावित करते हैं। सुधा (रेखा) और महेन्द्र (नसीरुद्दीन शाह) आपस में शादी करते हैं माया (अनुराधा पटेल) और महेन्द्र के बारे में सब कुछ जानकर भी। वे शादी क्यों करते हैं, इस बात पर फिल्म नहीं टिकी है बल्कि यह एक स्थिति है जिसकी संभावना धरती पर मौजूद मानवों के जीवन में हो सकती है और होती भी है और इस फिल्म की कहानी में तो खैर है ही। परिस्थितियों के वशीभूत होकर सुधा और महेन्द्र की शादी हो गयी है और यह एक कदम फिल्म की इमारत बनाने के लिये एक स्तम्भ का कार्य करता है। सो “क्यों” से ज्यादा फिल्म का जोर इस बात पर है कि “जब ऐसा हो जाये तो क्या संभावनायें हैं ऐसे रिश्तों वाली फिल्म में“!
एक तरह से देखा जाये तो इजाज़त वहाँ से सिरे उठाती हुयी शुरु होती है जहाँ विजय आनंद और जया भादुड़ी अभिनीत फिल्म – कोरा काग़ज खत्म हुयी थी।
फिल्मांकन के स्तर पर फिल्म बेहद योजनाबद्ध है। चरित्रचित्रण ही ले लीजिये। महेन्द्र द्वारा शुरु में ही रेलवे वेटिंग रुम में दिखायी गयी अस्त-व्यस्तता उसकी आदतों को दर्शकों को दिखाती है और ऐसा सूचित करती है कि कहीं न कहीं यह आदमी बेहद बेतरतीब है और इसे महिला पर निर्भर होना चाहिये अपनी ज़िन्दगी को संवारने के लिये और सुव्यवस्थित बनाने के लिये।
सुधा महेन्द्र को वेटिंग रुम में देखकर एक पत्रिका की सहायता से अपना मुँह छिपा लेती है जिससे कि महेन्द्र उसे न देख पाये। गुलज़ार एक रहस्यमयी अंदाज में फिल्म शुरु करते हैं और सस्पैंस का यह तत्व फिल्म के क्लाइमेक्स तक मौजूद रहता है। महेन्द्र को वेटिंग रुम में देखने के बाद सुधा द्वारा किये गये व्यवहार से दर्शक समझ जाता है कि सुधा और महेन्द्र का कोई साझा भूतकाल अवश्य रहा है और यह बात दर्शक में एक उत्सुकता को जन्म देती है। वह इन दोनों के मध्य भूतकाल में बीते हुये इस सांझे समय की विरासत को जानने, पहचानने और खोजने के लिये बैचेन हो जाता है।
इजाज़त चरित्र और रिश्ते प्रधान फिल्म होते हुये भी संवाद द्वारा बताने से ज्यादा दृष्यों की सहायता से दिखाने पर जोर देती है। सुधा को वहाँ वेटिंग रुम में बैठा देख महेन्द्र अपना सूटकेस खुला ही छोड़ कर बाथरुम चला जाता है। शायद यह सोचकर कि वह तो देख ही लेगी।
वहीं वेटिंग रुम में चाय पीते हुये सुधा और महेन्द्र के बीच होने वाले संवाद पर जरा गौर करें कि कैसे धीरे धीरे उनके बीच किसी किस्म के पूर्व-सम्बंध होने की परतें निर्देशक ने खोली हैं।
सुधा के यह पूछने पर कि क्या वह अभी तक उसी पुराने घर में ही रहते हैं, महेन्द्र कहते हैं,” सब कुछ वही तो नहीं है पर है वहीं“।
बेहद असरदार तरीके से नसीर इस एक छोटे से वाक्य को कहते हैं और शब्दों के पीछे छिपे हुये गहरे भाव को जीवंत कर देते हैं!
वे अटक अटक कर कहते हैं “सब… कुछ… वही…..तो…नहीं है..” मानो किसी असमंजस में फँसे हुये हों और फिर जैसे तेजी से अंदर ही अंदर वे कुछ तय कर लेते हैं और शीघ्रता से कुछ ज्यादा जोर देकर वाक्य को पूरा करते हैं ..” पर है वहीं“।
दर्शक को ऐसा अहसास वे दे देते हैं कि वे कुछ छिपा रहे हैं।
इजाज़त में गुलज़ार की लिखने और निर्देशन की प्रतिभा पूरे शबाब पर चढ़ी प्रतीत होती है। हिन्दी सिनेमा में चेतन आनंद की हीर रांझा ही ऐसी फिल्म रही है जहाँ पर कि संवाद भी काव्य के रुप में रचे और बोले गये गये थे। इजाज़त भी गद्य और पद्य का बहुत खूबसूरत मिश्रण लेकर दर्शकों को रस में सराबोर करती हुयी चलती है।
माया (अनुराधा पटेल) हृदय से कवि है। उसके क्रियाकलाप अनपेक्षित हैं। उसके चरित्र के द्वारा गुलज़ार ने अपनी काव्य प्रतिभा का भरपूर दोहन किया है।
माया के आने से पहले ही उसका साया फिल्म में प्रवेश पा जाता है।
माया महेन्द्र के रिश्ते की प्रकृति तुरंत स्पष्ट हो जाती है जैसे ही महेन्द्र अपने दादा (शम्मी कपूर) से मिलकर वापिस शहर में अपने घर पहुँचता है और वहाँ उसे माया की एक प्रेममयी धमकी देखने को मिलती है।
“बिना बताये चले जाते हो, जाके बताऊँ कैसा लगता है“? … माया
प्रेमी के लिये उस भाव को अपने प्रेमी तक पहुँचाना जरुरी लगने लगता है जिससे उसका सामना हो रहा है।
माया, महेन्द्र के लिये छोड़े पत्र में शब्दों से विम्ब चित्रित कर जाती है।
चलते चलते मेरा साया कभी कभी यूँ करता है,
जमीं से उठके सामने आकर हाथ पकड़ के कहता है
अबकी बार मैं आगे आगे चलता हूँ
और तू मेरा पीछा करके देख जरा
क्या होता है?
ये वे कल्पनायें हैं जहाँ साये जमीन से उठ पड़ते हैं और अपने ही वास्तविक वजूद से बातें करने लगते हैं। ऐसी कल्पनायें एक विशिष्ट वातावरण रचती हैं फिल्म में और जिसके जादुई परिवेश में दर्शक खो जाता है।
माया दिखती नहीं है अभी तक पर उसके वर्णन के द्वारा फिल्म उसकी पेंटिंग रचने लगती है। उसे रुबरु भले ही न देखा हो दर्शक ने अभी तक पर वह आकार ले चुकी है। वह कैसी होगी इसका अंदाजा लगने लगता है।
अभी तक रहस्य की चादरों में ढ़की इस शख्सियत, माया, की तारीफ में उसकी सहेली मोना, महेन्द्र से कहती है कि एक बार खुद माया ने उससे कहा था।
मोना मैं सूखे पत्ते की तरह उड़ कर महेन्द्र के कॉलर पर जा अटकी।
एक सूखे पत्ते जैसा मुक्त्त जीवन जी रही महिला को देखने के लिये दर्शक की उत्सुकता स्वाभाविक है और इजाज़त ऐसी ही उत्सुकतायें जन्माती और बढ़ाती चली जाती है।
महेन्द्र की प्रेमिका (दर्शकों द्वारा अनदेखी) गायब हो गयी है और नियति महेन्द्र की शादी सुधा से करवा देती है।
पर हाथ छूट जाने से रिश्ते नहीं टूटा करते और कोई न भी हो किसी जगह पर, परंतु उसके वजूद का अहसास उस जगह पर रह ही जाता है। माया भी महेन्द्र के जीवन और घर में भौतिक रुप से अनुपस्थित होते हुये भी रहती है।
माया का फोटो महेन्द्र के पर्स में देखने के बाद रेखा का सुधा के रुप में किया हुआ अभिनय गवाह बन कर देखने की चीज है।
महेन्द्र जैसे स्पष्टीकरण देते हैं।
माया बहुत ज्यादा बसी हुयी थी इस घर में। सब जगहों से तो उसे निकाल दिया है अब कहीं कोने खुदरे में पड़ी रह गयी है वहाँ से भी हट जायेगी।
सुधा को महेन्द्र और माया के प्रेम सम्बंधों के बारे में शादी करने से पहले से ही पता है, पर है तो वह एक जीती जागती स्त्री ही और मानवीय संवेदनायें एकदम से प्लास्टिक जैसी निर्मोही नहीं बनायी जा सकतीं कि उन पर किसी बात का कोई असर ही न हो और वह भी सभ्यता के दायरे में अपना पक्ष रखती है।
मैं कहाँ कह रही हूँ कि हटा दो या निकाल दो उसे… सिर्फ ये कि सब कुछ ही बंटा हुआ लग रहा है इस घर में। जिस चीज को भी छूने जाती हूँ लगता है किसी और की चीज छूने जा रही हूँ, पूरा पूरा अपना कुछ भी नहीं लगता।
फिल्म पति पत्नी और वो जैसे रिश्तों की उलझने रचने लगती है। महेन्द्र विवाहेत्तर संबध को नहीं निभा रहे हैं। वे अपने और माया के बारे में सब कुछ पहले ही सुधा को बता चुके थे।
गुलज़ार बिना नाटकीय हुये संबधों की जाँच पड़ताल करते हैं।
उनकी इजाज़त के महेन्द्र जीवन को सीधी पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे हैं। कभी कभी आदमी अपने को एक पतंग की तरह ढ़ीला छोड़ देता है कि उड़ने दो हवा के संग संग। उन्हे शायद लगा होगा कि देखा जायेगा जैसे जैसे मोड़ जीवन लायेगा वैसे जी लेंगे। शादी के बाद सुधा की तरफ से यह पहला हल्का सा विरोध माया के प्रति दर्ज हुआ है। न महेन्द्र और न ही सुधा इस स्थिति को जानबूझ कर लाये हैं। ऐसा हो गया है। महेन्द्र सुधा को दुखी भी नहीं करना चाहते। माया का फोटो पर्स में अंदर के अंधेरे कोनों की ओर खिसक जाता है।
एक बात को रेखांकित किया जाना चाहिये कि हिन्दी सिनेमा में सिर्फ और सिर्फ गुलज़ार की फिल्म में ही ऐसा देखा जा सकता है कि सुधा मेज पर पड़े महेन्द्र के पर्स को उठाकर माया का फोटो फिर से पर्स की जेब में लगा देती है। सुधा के रुप में रेखा की मुस्कान देखिये इस हरकत को करते हुये। नवविवाहित युगल आपस में एक सम्बंध की बुनियाद रख रहे हैं। राधा कृष्ण रुकमणि या मीरा कृष्ण और मीरा के पति, ऐसे ही त्रिकोण की छाया है इजाज़त पर।
रेलवे के वेटिंग रुम में मौका पाने पर सुधा मेज पर पड़े महेन्द्र के पर्स को ऐसे चोरी छिपे खोलती हैं अन्दर की फोटो देखने को जिससे कि महेन्द्र को इस बात का आभास न हो। महेन्द्र दरवाजे पर वेटर से बातचीत में व्यस्त हैं। सुधा की हरकत से दर्शक के मन में भी उत्सुकता जाग उठती है कि महेन्द्र के पर्स में इस वक्त्त किसकी तस्वीर होगी, माया की या सुधा की या दोनों की? शायद सुधा के मन में कहीं उम्मीद है कि भौतिक दूरियों के आ जाने के बाद उसका फोटो भी पर्स में हो सकता है। मन तो बेहद विचित्र चीज है ये कब क्या करने को व्यक्ति को विवश कर दे कोई नहीं कह सकता। पर फिल्म गच्चा दे जाती है दर्शक को और यह न तो सीधे सीधे और न ही सुधा की भाव भंगिमा के द्वारा दर्शक को दिखाती है कि महेन्द्र के पर्स में किसकी तस्वीर लगी है?
गुलज़ार फ्लैशबैक तकनीक को बेहद प्रभावी और बेहतर ढ़ंग से इस्तेमाल करने वाले निर्देशक रहे हैं और उनकी फिल्मों में फ्लैशबैक की गुंजाइश बन ही जाती है।
सुधा जब पहली बार वेटिंग रुम में कैमरा उठाती है तो उसका जेहन पीछे बीती ज़िन्दगी में चला जाता है।
साथ में दो जीवंत आदमी कितने लम्हे गुजारते हैं और कितना कुछ ऐसा जिया जाता है जो यादों के बैंक में फिक्स डिपॉजिट की भाँति एकत्रित होता जाता है!
महेन्द्र कहते हैं वेटिंग रुम में,”ऐसे में गरमा-गरम चाय मिल जाये…” और यादों के गर्भ से एक ऐसा दृष्य जन्म ले लेता है जहाँ सुधा महेन्द्र के लिये चाय लेकर आती हैं।
इजाज़त पर बिना कवित्त भाव को अपनाये हुये नहीं लिखा जा सकता। ऐसा प्रयास भी करना इस खूबसूरत फिल्म की तौहीन है। यह ऐसी फिल्म नहीं है जिसका विश्लेषण विशुद्ध रुप से गद्य में किया जा सके।
वेटिंग रुम में जब सुधा महेन्द्र के गीले सिर को तौलिये से पौंछने लगती हैं तब एकाएक पार्श्व में बज उठे संगीत को सुनिये और कहीं दूर से पास और पास ही से और पास आते आनंद में खो जाइये।
ऐसी योजना के लिये बेहद सतर्कता और गजब की रचनात्मकता की जरुरत है। कोई भी लेखक रचने के अभाव वाले दिनों से जरुर गुजरता है और ऐसे दिन भी आते हैं जब रचनात्मकता चारों तरफ से बरसती है इजाज़त ऐसे ही समय की पैदाइश है जब गुलज़ार के ऊपर चारों तरफ से रचनात्मकता की बारिश हो रही होगी।
ऐसे ऐसे संवाद गुलज़ार ने रचे हैं जिन्हे सुनकर दर्शक बस फिल्म पर न्यौछावर हो जाये।
महेन्द्र के लगातार बरसती बारिश के खत्म ने होने को लेकर की गयी शिकायत के जवाब में सुधा धैर्य से कहती हैं -
बरस जायेगी तो अपने आप बंद हो जायेगी।
एक अकेले आदमी की रचनात्मकता, कहानी, स्क्रीनप्ले, फिल्मांकन, दृष्य संयोजन, संवाद, गीत आदि कितने ही रुपों में उत्कृष्ट रुप में सामने आ सकती है, इजाज़त उसका ज्वलंत उदाहरण है।
वेटिंग रुम में एक रात सुधा और महेन्द्र, दोनों के वर्तमान के जीवन की ऐसी रात है जो उनकी बीते जीवन में किसी समय छोड़े गये सिरों को मिला देती है। सुधा के महेन्द्र की अनुपस्थिति में घर से चले जाने से सुधा और महेन्द्र के बीच एक ऐसा उधार बकाया रह जाता है जो इसलिये पनपता है क्योंकि वे इस अलगाव के कारणों पर कभी भी आमने सामने बात नहीं कर पाये। दोनों को कचोटता होगा इस संवाद का अभाव। वेटिंग रुम की यह रात वह मौका लायी है जब जो गिले शिकवे बचे थे उन्हे सुलझाया जाया सकता है। बिना बताये चले जाना पीछे छूट गये लोगों को तड़पन दे जाता है।
महेन्द्र, सुधा और माया – इन नामों के अर्थ तीनों चरित्रों के गुणों और प्रकृति का प्रतिनिधित्व करते हैं। सुधा के रुप में रेखा का चयन गजब का है। सुधा (वाया रेखा) का बाह्य और आंतरिक सौन्दर्य, उनके सलीकेदार तौर तरीके, धैर्य, और सुलझापन सब कुछ ऐसा है जो कि महेन्द्र को वैवाहिक जीवन में ठहरा सके। केवल विवाह करने के कर्तव्य से ही महेन्द्र सुधा के साथ नहीं है बल्कि वे उनसे भी उतना ही जुड़ाव महसूस करने लगते हैं जितना वे माया के साथ महसूस करते थे या करते हैं। सुधा के महेन्द्र की अनुपस्थिति में घर से चले जाने वाली रात उनके सुधा से भी प्रेम की गहरायी को दिखाती है और नसीर ने क्या काबिलेतारीफ अंदाज में उन दृष्यों को अपने अभिनय से जीवंत कर दिया है!
इजाज़त में एक तरह से गद्य को पद्य में जोड़ा गुलज़ार ने और अकविता को भी बाग मे जगह दी जिससे कि वह भी पनप सके।
मेरा कुछ सामान नज़्म को महेन्द्र द्वारा पढ़े जाते समय सुधा का रुदन जीवन है, जीवन की संवेदना है। यहाँ दूसरे का दर्द अपना बन गया है। यह अपने किये हुये पर पछतावे का दर्द है। यह बिना समझे कुछ कर जाने के पछतावे का दर्द है। यह एक दर्द के कविता में रुप में सामने आ जाने का दर्द है।
गुलज़ार ऐसी कल्पना का समावेश भी कर देते हैं अपने काव्य में कि अगर सुनने वाला शब्दों को सुन ले तो ठिठक जाये।
एक सौ सोलह चाँद की रातें एक तुम्हारे काँधे का तिल
– सुनने वाला बिना इस गुत्थी को सुलझाये चैन नहीं पा सकता कि क्यों गुलज़ार ने ये पंक्त्ति लिखी। जबकि एक सौ सोलह चाँद की रातें एक ऐसे ही वर्णित की हुयी संख्या है।
महेन्द्र के कँधे पर तिल का वर्णन कविता में सुनकर सुधा को माया की महेन्द्र से नजदीकी का परोक्ष रुप से अहसास होता है और वह रोते हुये उस तिल को छूती है।
माया रहस्मयी है। जीवंत है, बिना रोक-टोक बहने वाली नदी है। माया बेफिक्र है या उसने अपनी फिक्रों को भुलाने के लिये ही जीवन जीने का ऐसा अंदाज अपना लिया है। वह भाग तो रही है, जैसी ज़िन्दगी उसे परिवार की तरफ से मिली है उससे, परन्तु जो वह कुछ करती है उससे जीवन भी उत्पन्न होता है। उसकी ज़िन्दगी बिंदास है, मौत का खौफ वहाँ नहीं है क्योंकि ज़िन्दगी की भी बहुत कीमत उसके लिये नहीं है, मौत आज आती हो तो अभी आ जाये। अपने रचे में भी उसे बहुत सहारा नहीं मिलता वरना वह अकेले रहने के ख्याल से उदास न हो जाती, नींद की गोलियाँ खाकर आत्महत्या करने की कोशिश न करती।
एक अच्छा संवाद माया के द्वारा बोला गया है आत्महत्या करने के प्रयास पर। वह महेन्द्र से कहती है।
जानते हो महेन्द्र अगर जरुरत से ज्यादा गोलियाँ भी खा लो तो भी मौत नहीं आती क्योंकि उल्टी हो जाती है, गोलियाँ तो बस इतनी खानी चाहियें जितनी पेट पचा सके।
साथ छूट जाने पर भी रिश्ते विचारों के स्तर पर बने रहते हैं और पुनर्मिलन होने पर याद आ गये अधिकार भी वापिस आ जाते हैं। हालाँकि साल बीत जाते हैं, कुछ आदतें दम तोड़ जाती हैं कुछ नयी आदतें जन्म ले लेती हैं। पर रिश्तों में मौजूद रहे अधिकार नहीं बदलते। वे थोड़ी सी हिचकिचाहट के बाद वापस आ जाते हैं।
आदतें भी अजीब होती हैं
सांस लेना भी कैसी आदत है
जिये जाना भी क्या रवायत है
आदतें भी अजीब होती हैं
इजाज़त में एक सच्चाई है। कविता है पर जीवन की सच्चाई से ओतप्रोत।
महेन्द्र कहते हैं सुधा से -
मैं माया से प्यार करता था ये सच है और उसे भूलने की कोशिश कर रहा हूँ ये सही है।
ऐसा ही तो हो सकता है, ऐसा ही हो सकना तो संभव है। ऐसा ही हो सकना तो सही है।
वेटिंग रुम से निकलते हुये सुधा के घुटने में लगी चोट के बाद के दृष्य और कतरा कतरा गीत का दृष्यांकन दर्शा देते हैं कि ज़िन्दगी परिभाषाओं में बँधी चिड़िया का नाम नहीं है। यह तो कल्पना से भी परे की स्वतंत्रता का नाम है बल्कि भाषा में इसे बाँधना बहुत मुश्किल है। भाषा तो बहुत छोटी चीज है ज़िन्दगी की विशालता के सामने।
इजाज़त का साऊण्ड ट्रैक भी अनूठा है हिन्दी सिनेमा में।
ऐसा भी हो सकता है कि कवि कुमार विश्वास को इजाज़त के प्लेन वाले दृष्य में माया द्वारा भेजी गयी भेंट महेन्द्र को मिलने के बाद के दृष्य देखकर ही अपनी प्रसिद्ध कविता
एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है
एक पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है।
के लिये प्रेरणा मिली हो।
सम्बंधों पर बनायी गयी फिल्मों में इजाज़त गुलज़ार का बेहद उल्लेखनीय काम है। एक परिपूर्ण फिल्म की योजना यहाँ दिखायी देती है।
खाली हाथ शाम आयी है की टाइमिंग देखिये। महेन्द्र के हार्ट अटैक वाले सीन में नसीर की अदाकारी देखिये।
एक सम्पूर्णता है एक एक संवाद में।
सुधा तलाक लेने का नहीं देने का सोच रही है।
सूक्ष्म स्तर पर परिपूर्ण हैं फिल्म के संवाद।
सभ्य किरदारों की कहानी है इजाज़त। आँधी में छोड़े गये रिश्तों में अलगाव के रेशे यहाँ एक झीना परन्तु मुकम्मल वस्त्र बुन देते हैं।
फिल्म के दृष्य इतने प्रभावी हैं कि जब जिस चरित्र की तरफ से फिल्म दिखायी जाती है तब दर्शक भी उसी चरित्र की तरफ से फील्डिंग करने करने लगता है।
सुधा के घर छोड़ने पर दिल के दौरे की बात जब महेन्द्र सुधा को पहली बार बताते हैं तो इस दृष्य को पहले ही देख लेने के बावजूद सुधा के साथ दर्शक भी चिहुँक जाते हैं।
अगर महेन्द्र बता देते सुधा को कुद्रेमुख से लौटकर ही कि माया ने आत्महत्या करने की कोशिश की तो एक अलग ही कहानी बन जाती और जैसा कि एक बार महेन्द्र माया से कहते हैं कि वे उसे सुधा के हवाले कर देंगे क्योंकि सुधा समझदार है और वह वही करेगी जो सच है और सही है और उसे जरुर पता होगा कि क्या करना चाहिये।
महेन्द्र द्वारा सुधा को माया की आत्महत्या की कोशिश के बारे में न बताने की भूल या इस निर्णय को कुछ समय टालने की गलती एक जीवन को खत्म कर देती है और दो जीवनों को अलगाव का दुख दे जाती है। फिल्म में यही एक ऐसा क्षण है जिस पर लगभग सबकी, चाहे वे महेन्द्र, माया अया सुधा और अन्य चरित्र हों या फिर दर्शक ही क्यों न हों, एक ही राय रख सकते हैं।
माया तो आजाद हवा थी, उसके साथ शायद महेन्द्र भी न रह पाते पर समय चक्र ऐसा घुमता है कि माया और सुधा दोनों महेन्द्र के जीवन से दूर चली हैं।
फिल्म दिल के साथ छेड़छाड़ करती है, उसे कचोटती भी है, दिमाग पर एक नशे की खुमारी भी चढ़ाती है और कभी उसे जाग्रतावस्था में भी ले आती है जब सम्बंधों के बारे में ऐसा दिखा और समझा जाती है जो अब तक दर्शक के जेहन से अंजान ही था।
अगर किसी को ऐसा लगता हो कि वह ज़िन्दगी को समझने लगा है तो उसे इजाज़त दिखा देनी चाहिये उसका गुरुर टूट जायेगा।
सुधा महेन्द्र के दुख और दर्द दोनों से वाकिफ हो जाती है रेलवे के वेटिंग रुम में। वह दुखी है, बहुत ज्यादा दुखी है महेन्द्र के दुख से और कहीं न कहीं अपनी नादानी को भी इसका जिम्मेदार मानती होगी और जब दर्शक और महेन्द्र दोनों को लगता है कि शायद अब फिल्म में महेन्द्र और सुधा के उलझन भरे जीवन में एक सुखद पड़ाव आ गया है और नयी शुरुआत हो सकती है उसी समय आँधी तूफान की तरह एक ऐसे आकर्षक, खुशमिजाज़ शख्स का प्रवेश वेटिंग रुम में होता है जिसका आगमन महेन्द्र के पैरों तले से जमीन खिसका देता है।
पिछले साल मैंने शादी कर ली- जब सुधा कहती हैं तब नसीर तो अवाक खड़े रह ही जाते हैं, दर्शक भी समझ नहीं पाते कि किस किरदार की तरफ से वह जीवन को समझे!
इस बार जब सुधा जब बाकायदा इजाज़त माँगती हैं महेन्द्र से अपने वर्तमान पति के साथ जाने के लिये तब महेन्द्र द्वारा दिये गये आशीर्वाद में प्रेम की ऊँचाई का एक अन्य रुप फिल्म दिखा देती है।
जीवन क्या कठोर है? जीवन ने इतने बरसों में परिवर्तन ला दिया है। एक और शख्स से जुड़ाव हो गया है सुधा का। और यह जुड़ाव भी दिल से है। वह वही करती है जो आज का सच है और आज सही है।
नारी ज्यादा सही निर्णय लेती है इन मामलों में।
अंत ऐसा है कि आँखें उभर आयी नमी से धुँधली हो जायें तो समझिये गुलज़ार की कला ने आपको ठीक जगह छू लिया है। यह हाल तो तब है जब देखते समय दर्शक इसकी कमजोरियों को स्पष्ट देख चुका होता है। सुधा और महेन्द्र दोनों को पालने और बड़ा करने वाले दादा जी की जब मृत्यु हुयी होगी तो क्या महेन्द्र और सुधा और सुधा की माँ की मुलाकात नहीं हुयी होगी?
सम्पादन (एडीटिंग) की गलती भी दर्शक साफ साफ देख चुका होता है। वेटिंग रुम में सुधा और महेन्द्र के पुनर्मिलन के बाद कुछ दृष्य फिल्म के अंत में सुधा के विवाहित होने के खुलासे के बाद उचित नहीं लगते।
आपकी भूलने की आदत नहीं गयी और मेरी रखने की – जैसे संवाद अब उचित नहीं लगते पर इनमे से कोई भी कमी इजाज़त के असर को कम नहीं करती।
बाकी सब बातें बेमानी हैं उस अहसास के सामने जो फिल्म दर्शक को दे जाती है।
फिल्म का यही उद्देश्य भी है कि यह दिल को छू जाये और व्यक्ति संवेदनाओं के समुद्र में गहरे उतरने की कला की झलक पा जाये।
बहुत कम फिल्मों का ऐसा अंत देखने को मिलता है। फ्रीज शॉट और पार्श्व में से आती हुयी ट्रेन की ध्वनि। सुबह 7.30 की ट्रेन जिस पर सवार होकर दो पुराने साथी अपनी अपनी अलग मंजिलों की तरफ तो जायेंगें पर एक दूसरे के ख्यालों से भरे हुये।
एक विवशता भरी मुस्कान, आँसु बहाते दो नैन, एक संवेदनशील मुस्कान मानो कह रही हो, धन्यवाद तुम्हारी असंवेदनशीलता को जिसके कारण मुझे ऐसा नगीना मिला, कितना बड़ा दुर्भाग्य था तुम्हारा और है।
पर ज़िन्दगी कहानी नहीं है जो बस यहीं रेलवे स्टेशन पर खत्म हो जाये। ज़िन्दगी तो सुधा के आँसुओं में है, पीछे लौटकर दुखी खड़े महेन्द्र को देखती उसकी भावप्रवण आँखों में है, उसकी भावनाओं में है जो उसके साथ ताउम्र रहने वाली हैं।
पर स्टेशन पर लगी घड़ी तो दिखा रही है कि अभी तो ट्रेन छूटने में आधा धंटे से ज्यादा का वक्त्त है। कैसे कटेगा सुधा और महेन्द्र का यह वक्त्त, जब तक कि ट्रेन चल ही न दे!
उस वक्त्त या बाद में यात्रा के समय सुधा तो शायद आसुओं के लगातार बहने से धुँधला गयी आँखों और रोने से रुँधी आवाज से महेन्द्र की दुखभरी कथा को अपने पति को संप्रेषित कर रही होंगी और उनसे बेहद प्रेम करने वाले पति उन्हे सांत्वना दे रहे होंगे पर महेन्द्र कैसे उस दुख से पार पा पायेंगे जो इस बार इजाज़त लेकर गयी सुधा को खोने से उन्हे मिला है?
खोकर फिर से पाने का सौभाग्य और पाकर फिर से अपनी आँखों से खोते देखने का दुर्भाग्य जीवन को हिला तो देगा ही।
इजाज़त खत्म होकर भी खत्म नहीं होती, यह दर्शक के अंदर घुस कर बस जाती है। खुशी और गम के कितने ही दृष्य आकर उसकी स्मृतियों के साथ छेड़छाड़ करने लगते हैं।
छोटी सी भूमिका में नज़र आने वाले शम्मी कपूर अपने पौत्र से मिलकर आनंदविभोर होकर मस्ती में बाल बनाते हुये याद आने लगते हैं। कभी ऐसा लगता है कि सुधा-महेन्द्र-माया की तिकड़ी को उस जगह ऐसा कर लेना चाहिये था या वैसा कर लेना चाहिये था।
कभी कोई खूबसूरत दृष्य यादों में आकर लुभाने लगता है।
कभी हँसी आने लगती है याद करके उस दृष्य को जिसमें महेन्द्र सुधा को बताते हैं कि वे बचपन में क्या सोचते थे कि बड़े होकर क्या बनेंगे? और सुधा का असफल प्रयास याद आ जाता है पूरे संस्मरण को बिना हँसे सुनने को। पूरा दृष्य याद में भी ठहाके लेकर आता है और उसके बाद टेलीफोन कॉल आने वाला दृष्य नहले पर दहले वाला अहसास लेकर आता है।
जिस किसी ने भी इजाज़त को एक बार भी देखा है उसके लिये इजाज़त कभी भी खत्म नहीं होती, खत्म हो भी नहीं पायेगी।
…[राकेश]
[...] [...]
“सुधा को वहाँ वेटिंग रुम में बैठा देख महेन्द्र अपना सूटकेस खुला ही छोड़ कर बाथरुम चला जाता है। शायद यह सोचकर कि वह तो देख ही लेगी।”
लेकिन जब महेंद्र और सुधा के बीच अब कुछ भी बाकी नहीं रह गया है तो क्या ऐसा दिखाना उचित था? क्या अभी भी महेंद्र, सुधा पर जो कि अब एक प्रकार से अजनबी हो चुकी है, पर इतना भरोसा कर सकते हैं?
“सिर्फ और सिर्फ गुलज़ार की फिल्म में ही ऐसा देखा जा सकता है कि सुधा मेज पर पड़े महेन्द्र के पर्स को उठाकर माया का फोटो फिर से पर्स की जेब में लगा देती है।”
मैं समझ नहीं पाया कि गुलज़ार साब दिखाना क्या चहेते हैं? यह कि सुधा को माया से कोई आपत्ति नहीं है? या यह कि सुधा के लिए महेंद्र कि ख़ुशी ही सबसे महत्त्वपूर्ण है? ऐसी चीज़ें रिश्तों मेंअकसर दरार कि वजह बन जाया करती हैं. परन्तु दोनों ही परिस्थितियों में सुधा का बाद में किया गया व्यवहार अर्थात ् सुधा का महेंद्र को छोड़कर जाना उसके इस व्यवहार से मेल नहीं खाता.
“वेटिंग रुम में सुधा और महेन्द्र के पुनर्मिलन के बाद कुछ दृष्य फिल्म के अंत में सुधा के विवाहित होने के खुलासे के बाद उचित नहीं लगते।”
शायद महेंद्र को तौलिये से पोंछने वाला दृश्य कुछ ऐसा ही है. साथ ही महेंद्र के सूटकेस को खुला छोड़ जाने वाला दृश्य.
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निश्चित रूप से यह फिल्म काफी सशक्त है. मुझे तो यह लेख पढ़ते हुए ऐसा लगा मानो फ़िल्म एक बार फिर से जेहन में चल गयी हो, वे सारे दृश्य आँखों के सामने घूम गए और इस लेख के आखिर में एक अद्भुत अहसास करा गए.
जहाँपनाह,
अजनबी शब्द तो उचित नहीं होगा सुधा और महेन्द्र के लिये। शुरु में वेटिंग रुम में जैसे ही दरवाजे पर सुधा और महेन्द्र टकराते हैं सुधा बिना कुछ कहे अंदर चली जाती हैं और महेन्द्र उनसे सूटकेस की चाभी भी नहीं माँग पाते हैं सो दूरियों का अहसास तो पूरे तौर पर दिखाया गया है। स्टेशन मास्टर ही चाभी के लिये महेन्द्र की सिफारिश सुधा से करते हैं।
सुधा को तो यही पता है कि महेन्द्र माया के साथ रहते होंगे और महेन्द्र को सुधा के बारे में पता नहीं है, पर सुधा को अकेले देख कर उन्हे ये तो लगा ही होगा कि वे अभी तक अकेली ही हैं।
सुधा का महेन्द्र से दरवाजे पर बात न करना, फिर स्टेशन मास्टर के कहने से महेन्द्र को चाभी देना…
ये सारा खुलापन फिल्म को जीवंत बनाता है और फार्मूला टाइप फिल्मों से अलग वातावरण देता है।
वेटिंग रुम में उस वक्त्त सुधा और महेन्द्र ही हैं जब वे सूटकेस
खुला छोड़कर बाथरुम जाते हैं।
भरोसा भी सही शब्द नहीं होगा। सामान के लिये सुधा पर भरोसा?
चाभी मिलने के बाद इतना तो उन्हे लगेगा ही कि वे देखभाल कर लेंगी सूटकेस की।
और हो सकता है कि उन्होने जान कर ऐसा किया हो यह जानने के लिये कि क्या वे कुछ कहेंगी।
मानव मन खास कर पुरुष मन ऐसी परिस्थितियों में ऐसा कर सकता है।
महेन्द्र तो जानते ही हैं कि सुधा उन्हे गलत फहमी के कारण छोड़ गयी थीं।
जहाँपनाह,
आपका दूसरा मुद्दा -
कहना और बात होती है और उस पर मनन करना एक अलग बात। सुधा जब पर्स में माया की तस्वीर देखकर महेन्द्र से कहती हैं कि वे खुद ही पैसे निकाल कर दे दें तब माया की तस्वीर देख कर ही महेन्द्र उनसे वह बात कहते हैं कि माया की याद इस घर से धीरे धीरे चली जायेगी और सुधा अपना संवाद कहती हैं।
आपत्ति तो उन्हे क्या किसी को भी होगी अगर पति या पत्नी शादी से बाहर भी एक और दाम्पत्य सरीखा ही सम्बन्ध बना कर रखना चाहे पर उस वक्त्त सुधा महेन्द्र की बातों में सच्चाई भी पाती हैं क्योंकि शादी से कुछ दिन पूर्व ही महेन्द्र उन्हे सब कुछ बता चुके हैं। ऐसे में उन्हे तो विश्वास रखना ही है महेन्द्र के ऊपर। फिर महेंद्र के प्रयास भी हैं शादी को ढ़ंग से निभाने के लिये और सुधा के साथ एक सच्ची नजदीकी बढ़ाने के।
इसी दृष्य से पहले का दृष्य आपको याद होगा जब महेन्द्र डार्क रुम में काम कर रहे हैं और सुधा दरवाजा खटखटाती हैं।
उनके पूछने पर महेन्द्र कहते हैं एक लड़की की तस्वीरें डेवेलप कर रहा हूँ और सुधा के पूछने पर कहते हैं कि इस लड़की से कुछ समय पूर्व मैंने शादी की है।
सुधा के लिये तो महेंद्र के साथ शादी तीन इच्छाओं की पूर्ती है, उनके दादा जी, माँ और उन दोनों की इच्छा के कारण उनकी अपनी इच्छा की भी।
उनमें तो धैर्य और क्षमा पहले से ही है। उनमें एक बेहद अच्छी पत्नी बनने और बढ़कर एक बहुत अच्छी नारी होने के गुण पहले से ही दिखाये गये हैं। महेंद्र ने शायद ध्यान भी न दिया हो कि उनके पर्स में माया की तस्वीर अभी तक लगी हुयी है।
सुधा की हिचकिचाहट और आपत्ति के बाद ही वे तस्वीर को अंदर डाल देते हैं।
सुधा को भी महेंद्र का दुख दिखायी देता है। वे भी सभ्य तरीके से इस मामले को सुलझाना चाहती हैं।
जैसा की लेख में भी एक जगह उल्लेख किया गया कि गुलज़ार सप्रयास अपनी फिल्मों में खासतौर पर प्रेमियों और पति पत्नी के सम्बंधों वाली फिल्मों में ऐसी कोशिश करते रहे हैं कि उनके किरदार सभ्य हों। आपको शायद आँधी की याद हो उसमें तो संजीव कुमार साफ साफ सुचित्रा सेन से कहते भी हैं कि यदि उन्हे इस शादी से अलग होना हो तो वे ऐसा चुपचाप कर दें उन्हे तमाशा पसंद नहीं है।
पाशविक प्रकृति और लाऊड प्रस्तुती गुलज़ार की फिल्मों के लिये नहीं है।
फिल्म में सिर्फ दो बार किरदार ऊँची आवाज में बात करते हैं या बहस करते हैं। पहली बार जब महेन्द्र सुधा से जिद करते हैं कि वे शाम को माया को लेकर आ रहे हैं और दूसरी बार जब महेंद्र माया को डाटते हैं जब वे सुधा को लेने जाने के लिये जाना चाहती हैं।
पर्स वाली घटना और मेरा कुछ सामान वाले तार के बाद के बाद सुधा माया और महेंद्र के रिश्ते के बारे में सहज है। आपको शायद फोन की याद हो पहली बार माया का फोन वे महेन्द्र को दे द्ती हैं और दूसरी बार रिंग बनने पर मीठी शिकायत के लहज़े में कहती हैं कि आप अटेंड करो फोन, मेरा ठोड़ी ही होगा।
सब कुछ ढर्रे पर है सुधा के लिये परन्तु कुद्रेमुख से लौटकर जब उन्हे लगता है कि महेंद्र माया से चोरी चोरी मिल रहे हैं तब उनका विश्वास डगमगाता है। इसके बाद भी वे खुश हो जाती हैं जब महेन्द्र उन्हे कहते हैं कि माँ से मिलकर तुरंत शाम को ही वापिस आ जाना पर खुद उन्हे खाली घर मिलता है
(खाली हाथ शाम आयी है)
उनके लिये गलतफहमी हो जाना स्वाभाविक है।
वे तभी छोदड़कर जाती हैं जब महेंद्र उन्हे माया के आत्महत्या के प्रयास के बारे में न बताने की गलती करते हैं बल्कि वे तब भी स्थिति की गम्भीरता नहीं समझ पाते जब सुधा उनसे पूछती हैं कि क्या वे इन दिनों माया से मिलते रहे हैं।
सुधा का छोड़ कर जाना एकदम परिस्थितिजन्य है। वे माया महेन्द्र के रिश्ते के बारे में जानती हैं और जैसा कि वे दीना पाठक और शम्मी कपूर से कहती भी हैं कि महेंद्र ने उन्हे कभी कोई शिकायत का मौका नहीं दिया वे ही दोनों के बीच नहीं आना चाहतीं।
वे पाती हैं कि शायद महेंद्र माया को भूल पाने में सक्षम नहीं है और जिनदगी इतनी कटु न बन जाये कि उस दिन जैसे झगड़े रोज़ रोज़ न होने लगें अत: वे चली जाती हैं।
बाद में भी सारी परिस्थितियाँ ही हैं। उनका एक माह के बाद फोन करना और उस फोन को माया द्वारा रिसीव करना।
दर्शक ही तो जानते हैं कि यह सब गलतफहमी है किरदार तो नहीं जानते और दर्शक भी तब जान पाते हैं जब फ्लैश बैक के जरिये देख पाते हैं।
जहाँपनाह,
सुधा द्वारा तौलिये से महेन्द्र का गीला सिर पोंछने वाला पूरा दृष्य तो नहीं परन्तु महेंद्र और सुधा के चेहरे पर भाव जरुर बाद में उचित नहीं लगते।
ऐसे ही सुधा द्वारा अपनये गये भाव – यह कहते हुये कि “आपकी भूलने की आदत नहीं गयी और मेरी रखने की” कुछ नियंत्रित हो सकते थे। आखिरकार सुधा तो जानती ही हैं कि वे शादी शुदा हैं अब, सो वेटिंग रुम के कुछ दृष्य कुछ और भाँजे जा सकते थे ताकि बाद में वे अजीब न लगें|
निस्संदेह एक विशिष्ट फिल्म है इजाज़त
फ़िल्म में संवेदनाएं एवं भावों को अत्यंत सलीके व बारीकी से दिखाया गया है, इन्हें देखने के लिए तीक्ष्ण नज़र का होना आवश्यक है, साथ में फ़िल्म से जुडी़ यादों का ताज़ा होना भी.
जहाँपनाह,
इजाज़त नये अर्थ खोलेगी जब आप इसे कुछ अंतराल के बाद फिर फिर देखेंगे। जीवन में जैसे जैसे अनुभव बढ़ेगा, यह भी साथ साथ चलकर सम्बंधों के बारे में यह जो कहना चाहती है उसे समझायेगी।
इतने मनन के बाद आप इसे हाल फिलहाल देखेंगे तो शायद पायें कि इस बार देखने का अनुभव पिछली बार के अवलोकन से अलग था।
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एक इतवारी किताब है आपका ये ब्लॉग…. आज मैं आधे दिन यहीं रहा… बहुत कुछ सीखने, पढने, गुनने को मिला… अद्भुत है.. अब आता रहूँगा…. आप और लिखें इसी तरह शानदार …
बहुत बहुत धन्यवाद सागर जी