अभिमान(1973): श्रेष्ठ है कला और प्रतिभा, स्त्री या पुरुष नहीं

अभिमान(1973): श्रेष्ठ है कला और प्रतिभा, स्त्री या पुरुष नहीं

उमा (जया भादुड़ी) अपने पति सुबीर (अमिताभ बच्चन) को घर ले जाने के लिये सुबीर की दोस्त चित्रा (बिन्दु) के घर आती हैं। उमा और सुबीर की शादी के स्वागत समारोह के बाद यह उमा और चित्रा की दूसरी ही मुलाकात है।

चित्रा पूछती हैं कि उमा को कैसे पता चला कि सुबीर यहाँ उसके घर होंगे?
उमा – बस मुझे पता था।
चित्रा उमा को सोफे पर बैठाती हैं और थोड़ी झिझक के साथ कहती हैं,” कहीं आप ऐसा तो नहीं समझतीं कि मैं सुबीर को बहका रही हूँ”?
उमा स्पष्ट कहती हैं,” नहीं मुझे पता है आप ऐसा नहीं करेंगी। जो प्यार करते हैं…”।

ऐसे कुछ संवाद और ऐसा दृष्टिकोण ह्रषिदा की अभिमान को एक आकर्षक फिल्म बनाते हैं। बल्कि साठ और सत्तर के दशक की हिन्दी फिल्मों के ढ़ाँचे से अलग कुछ प्रयोग करके ह्रषिदा चित्रा (बिन्दु) का चरित्र गढ़ते हैं और चित्रा और इस चरित्र में बिन्दु द्वारा किया गया अभिनय, दोनों एक अलग छाप छोड़ जाते हैं।

सुबीर की ज़िन्दगी में उमा के आने से पहले से ही चित्रा सुबीर से प्रेम करती है और उनके मध्य दोस्ती तो है ही।

सुबीर के मित्र चंदर (असरानी), जो सुबीर के बिजनेस मैनेजर का कार्य भी देखते हैं, चित्रा द्वारा सुबीर से नजदीकी बढ़ाने के प्रयासों को पसंद नहीं करते हैं और सुबीर को टोकते हुये वे एक बार कहते हैं,” सुबीर स्त्री और पुरुष के मध्य दोस्ती कैसी”?

अभिमान एक तरफ पुरुष की ऐसी पुरातनपंथी विचारधारा दिखाती है और दूसरी तरफ चित्रा के चरित्र द्वारा आदर्श गढ़ती है।

सुबीर अचानक ही उमा से शादी कर लेते हैं और बम्बई आने पर चंदर द्वारा आयोजित स्वागत समारोह में चित्रा आती हैं और सुबीर और उमा को गाते हुये सुनती हैं। सुबीर क्षमायाचना की मुद्रा में हैं पर एक अच्छे दोस्त की तरह किसी भी किस्म की शर्मिंदगी से सुबीर को मुक्त्त करते हुये चित्रा कहती हैं,” सुबीर मैं दुखी थी जब तुम्हारी शादी की बात सुनी। गुस्सा भी आया परंतु आज उमा का गाना सुनकर मुझे यही लगा कि वे ही तुम्हारी पत्नी बनने योग्य थीं। मैं उस स्थान पर शायद ठीक नहीं रहती”।

स्त्री सामने वाले को सिर्फ निगाह से ही पहचान सकती है। सुबीर द्वारा चित्रा का परिचय उमा से करवाये जाने के बाद उमा चित्रा का हाथ पकड़ कर अपने साथ ले जाती हैं।

अभिमान रिश्तों में आदर्श व्यवहार अपनाये जाने की वकालत करती है।

अभिमान, चंदर की सुबीर से दोस्ती के द्वारा भी कुछ सवाल खड़े करती है। क्या एक व्यक्त्ति द्वारा अपने ही मित्र के व्यवसाय में हाथ बंटाने के बाद और मैनेजर जैसी भूमिका निभाने के बाद भी दोस्ती कायम रह सकती है?

रह सकती है यदि आपसी सम्मान दोनों तरफ से बनाया रखा जाये।

पति-पत्नी के संबधों में आयी उलझनों और गिरावट पर तो कितनी ही फिल्में बन चुकी हैं। अभिमान खुद भी शुरु के तकरीबन एक घंटे तक जब तक कि यह चरित्रों को पेश करने और उन्हे स्थापित करने में लगी रहती है, एक सामान्य फिल्म की तरह ही विचरती रहती है और उमा और सुबीर की शादी के बाद भी जब तक उन दोनों के संबंध अच्छे रहते हैं तब तक कुछ प्रसंगों को छोड़कर फिल्म एक सामान्य स्तर की फिल्म ही रहती है। फिल्म बहुत सारे दृष्यों में कसी हुयी और अच्छी फिल्म होने की पटरी से उतरती रहती है कभी संवाद लाऊड हो जाते हैं कभी अभिनय लाऊड हो जाता है और कभी लगता है कि ऐसे दृष्य ह्रषिदा की फिल्म मे तो होने की उम्मीद दर्शक कम से कम ही करता है।

सुबीर द्वारा उमा को बार बार और बार बार होठों पर ऊँगली ले जाकर उन दोनों के बीच की शारीरिक नजदीकी की याद दिलाने के दृष्य ऊब जन्माते हैं और ऐसा लगने लगता है कि ह्रषिदा की प्रसिद्ध सम्पादन की कला को क्या हो गया था इस फिल्म को सम्पादित करते हुये?

सुबीर और उमा के मध्य का यह व्यक्तिगत जोक नुमा इशारा सिर्फ और सिर्फ एक बार रोचक लगता है जब घर में आयी धोबन अपने होठों पर सुबीर की तरह ऊँगली रखकर बैठ जाती है और तभी थोड़ा सा हास्य उत्पन्न होता है जिसके लिये ह्रषिदा माने जाते थे।

सचिन देव बर्मन दादा भी ह्रषिदा के साथ साथ दर्शकों के साथ मज़ाक करते हैं और देश के एक प्रसिद्ध गायक सुबीर के चरित्र के लिये थोड़े ही समय में अलग अलग गायक पार्श्व गायन करते हैं। परदे पर सुबीर कभी तो किशोर कुमार की आवाज में गाना गाते हैं कभी रफी उन्हे अपना गला उधार देते हैं और एक बार तो मनहर भी मैदान में कूद पड़ते हैं।

तब के नवोदित गायक मनहर को छोड़ भी दें पर अगर कोई गायक रफी और किशोर कुमार दोनों की आवाज में गाने गा दे तो वह देश का टॉप गायक बन ही जायेगा सो सुबीर कुमार भी देश के सबसे प्रसिद्ध गायक बन जाते हैं।

फिल्म के विषय में वापिस आयें तो फिल्म में वास्तव में जान पड़ती है डेविड के मैदान में उतरने के बाद और उससे भी ज्यादा तब जब वे उमा को सुबीर के साथ गाते हुये सुनते हैं और अपने साथी से कहते हैं कि अच्छा हो यदि सुबीर उमा को अपने साथ व्यवसायिक रुप से गाने के लिये विवश न करे।

साथी के पूछने पर कि इसमें खराबी क्या है।

वे कहते हैं,” देखते नहीं, उमा सुबीर से ज्यादा प्रतिभाशाली है और पुरुषों को बचपन से घुट्टी में पिलाया जाता है कि वे श्रेष्ठ हैं”

साथी लापरवाही से कहता है,” अरे साहब सारी प्रतिभा रसोईघर में और बच्चों को पालने में निकल जायेगी”।

डेविड कहते हैं,” यह तो और भी बुरा होगा”।

डेविड की चिंता जायज है, और आज भी प्रासंगिक है।

स्त्री की प्रतिभा का क्या हो मौटे तौर पर पुरुष द्वारा संचालित इस संसार में?

क्या एक पत्नी सिर्फ इसलिये अपनी प्रतिभा का गला घोट दे कि उसके खुलकर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने से उसके पति का समाज में स्थान उसकी शोहरत और प्रतिभा के सामने कम हो जायेगा?

जनक की सभा में हुये गार्गी याज्ञवल्क्य शास्त्रार्थ की विरासत सनातन काल से चली रही है और भले ही यह घटना भारत में घटी हो पर सत्य यह विश्व की सभी सभ्यताओं के संदर्भ में है।

अभिमान से कुछ ही साल पहले विजय आनंद ने दिखाया था कि कैसे राजू गाइड ने अभिमान के साथ गुस्से में हिकारत भरी दृष्टि से रोज़ी को देखते हुये कहा था कि तुम आज जो इतनी शोहरत और दौलत बटोर रही हो, यह और सारी तुम्हारी सफलता सब मेरी सूझबूझ और मेहनत का नतीजा है वरना तुम क्या थीं – अपने पति के व्यवहार से कुंठित होकर आत्महत्या का प्रयास करने वाली एक कमजोर औरत।

अभिमान में सुबीर खुद ही उमा को उनकी इच्छा के खिलाफ व्यवसायिक गायन में उतारते हैं और बाद में उमा द्वारा लगातार सफलता पाने के कारण मन ही मन कुंठा से भर जाते हैं। शुरु में वे अपनी कुंठा और उमा से जलन को वे दबाकर रखते हैं और चुपचाप उमा को सफलता की सीढ़ी चढ़ते हुये देखते रहते हैं।

स्त्री सूक्ष्म मनोभावों को भी समझ लेती है और उमा सुबीर के अंदर चल रही उथल-पुथल को भाँप कर कम से कम दो बार अपने द्वारा व्यवसायिक रुप से गाना न गाने और कहीं भी लोगों के सामने अपनी गायन प्रतिभा का प्रदर्शन न करने की मंशा का एलान कर देती हैं परंतु उनका ऐसा करना भी सुबीर को अपनी हार लगता है उन्हे लगता है कि अगर यह लोगों पर जाहिर हो गया कि वे अपनी ही पत्नी की सफलता से जलन रखते हैं तो उनकी छवि पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। इसी भय के कारण वे जोर देकर कहते हैं कि उमा को गाना गाना बंद नहीं करना चाहिये। उन लोगों का क्या होगा जिन्होने उमा के साथ करार किये हुये हैं?

मैं तंगदस्त हूँ ये गर राज़ खुल गया
मेहमान बनकर कोई मेरे घर न आयेगा

पर कुंठा और जलन बहुत दिनों तक तो दब कर रह नहीं सकतीं, ये तो वे विषबेलें है जो व्यक्ति को धीरे-धीरे इतना कटु बना देती हैं कि व्यक्ति अपने नजदीकी व्यक्तियों पर भी कटाक्ष करने से नहीं चूकता। जलन और कुंठा से भरा व्यक्ति जहर भरे बोल बोलने लगता है और यही सुबीर के साथ होता है।

ऐस व्यक्ति नितांत अकेला भी हो जाता है और अपना भला चाहने वाले नजदीकी व्यक्ति भी दुश्मन नजर आने लगते हैं।

सुबीर न केवल वैवाहिक संबंधों की मर्यादा को बल्कि दोस्ती की मर्यादा को भी तोड़ते हैं। वे उमा को अपमानित करते हैं। वे चंदर का अपमान करते हैं। उन्हे अपनी कला का घमंड है और अपनी कला के उमा से कमतर होने के कारण वे कुंठाग्रस्त भी हैं। कला उनके पास भी है और वे चाहें तो उसमे और निखार ला सकते हैं। वे चाहें तो उमा की सफलता में खुशी महसूस कर सकते हैं और अपने वैवाहिक, व्यक्तिगत और व्यवसायिक जीवन को संवार सकते हैं। आखिरकार उमा भी तो उनकी खातिर हर तरह का त्याग करने को तैयार हैं और सुबीर की सफलता से खुश भी होती हैं तो फिर सुबीर ऐसा क्यों नहीं कर सकते?

क्या पुरुषों को दी जाने वाली सामंतवादी समझ – कि पुरुष हर मामले में स्त्री से श्रेष्ठ है- सुबीर को घेरे हुये है जिससे कि वे उमा को अपनी साथी नहीं बल्कि प्रतिद्वन्दी मानने लगते हैं?

व्यक्ति के अंदर इतने ऋणात्मक भावों के पनपने के बाद अच्छा होने के आसार कमतर होते चले जाते हैं और सुबीर के अंदर की कड़वाहट उसके वैवाहिक जीवन को चौपट कर देती है और मित्रता को भी घायल कर देती है।

राजा भरत की शकुंतला और अयोध्या के राम की सीता की तरह ही गर्भवती उमा को अपने पति का घर छोड़ना पड़ता है।

इतिहास अपने को दोहराता है ही हर युग में, हर दशक में बल्कि ऐसा हर साल-हर महीने-हर दिन-हर क्षण होता ही रहता है। मानव के लिये सीख किताबी ही होती है जब तक कि वह खुद भुगत न ले। वह उसके पूर्वज मानवों द्वारा की गयी गलतियाँ दोहराता ही चला जाता है।

सुबीर ने कभी अपने और उमा के भविष्य- उनकी संतान- के लिये खुशी से भरा एक गीत रचा था – तेरे मेरे मिलन की ये रैना नया कोई गुल खिलायेगी-
पर मिलन तो बहुत समय तक कायम न रह सका पर उन दोनों की जुदाई जरुर गुल खिलाती है पर गलत अर्थों में।

सुबीर का कुंठाग्रस्त अहंकार इतना बढ़ चुका है कि उमा के गर्भवती होने की सूचना उसे उमा और अपनी माँ समान मौसी के पास जाने के लिये प्रेरित नहीं करती।

ऐसे कठोर हालात में उमा के जीवन पर तुषारापात होता है और उसका अस्तित्व सर्द हो जाता है।

बदलाव आता है जीवन में। जब तक सुबीर को जीवन में आये दुख का अहसास होता है बहुत ज्यादा नुकसान उसके जीवन में हो चुका है। उमा जीती तो है, चलती फिरती तो है पर पत्थर की एक मूरत की तरह जिसे किसी भी तरह को कोई अहसास छूता नहीं है।

वक्त्त के गुजरने से जख्म तो भर जाते हैं
पर दिल से दर्द की एक ख़ालिश नहीं जाती

कैसी विडम्बना है कि पत्थर बनी उमा के लिये आँसू बहाना जीवन फिर से पाने का जरिया बन जाता है। सुबीर और उमा के शुभचिंतक बुजुर्ग संगीतकार (डेविड) ही सुबीर को सलाह देते हैं कि जिसने दर्द दिया है वही दवा भी देगा। जिस संगीत के कारण तुम जुड़े और फिर अलग हुये वही संगीत फिर से तुम्हे जोड़ेगा।

हालात सुबीर और उमा को एक बार फिर से- तेरे मेरे मिलन की ये रैना- युगल गीत गाने के लिये तैयार करते हैं पर अब तक बहुत ज्यादा पीड़ा का समावेश जीवन में हो चुका होता है।

जो गीत कभी हँसते खेलते जीवन का प्रतीक था अब वह आँसुओं से भरी आँखें लिये गाया जाता है।

तुलना कैसा विनाश व्यक्ति के जीवन में ला सकती है – इसे बहुत प्रभावी ढ़ंग से अभिमान में दिखाया गया है।

फिल्म स्थापित करती है इस अवधारणा को कि प्रतिभा और कला श्रेष्ठ होती हैं, स्त्री या पुरुष कला से बढ़कर नहीं होते, जीवन के उतार-चढ़ाव के साथ साथ उनके प्रदर्शन में भी उतार-चढ़ाव आते रहते हैं पर यदि उनमें प्रतिभा है तो वे इन मुसीबतों का सामना करते हुये कला की साधना में लगे रह सकते हैं।

दुख और परेशानियों के आगमन के कथानक में प्रवेश करने के साथ ही फिल्म योग्यता के मामले में तुरंत ऊँची उड़ान भरने लगती है और फिल्म का स्तर बहुत ऊँचा हो जाता है। फिल्म के अब तक बीते भाग में लगभग सामान्य स्तर का अभिनय प्रदर्शन करने वाले अमिताभ बच्चन भी गहराई ला पाते हैं अपने अभिनय में। वैसे इस फिल्म में जया, बिन्दु और दुर्गा खोटे तीनों महिलायें उनसे बीस ही रहती हैं अभिनय की श्रेष्ठता के मामले में।

जया भादुड़ी अभिनय में अपनी रेंज का प्रदर्शन बखूबी करती हैं। अभिमान एक तरह से उनके अभिनय जीवन की प्रतिनिधि भी है। सत्तर के दशक में वे बहुत अच्छे फॉर्म में थीं और अगर शादी के बाद वे स्वैच्छिक रुप से फिल्मों में अभिनय करने से किनारा न कर लेतीं तो वे कुछ कालजयी फिल्मों की नायिका बन सकती थीं।

एक.के हंगल साब के बारे में क्या कहा जाये, वे तो इतनी ज्यादा विश्वसनीयता अपने चरित्र में ले आते हैं कि ज्यादातर ऐसा ही लगता है कि वास्तविक जीवन में जरुर उन्होने वे सब काम किये होंगे जो फिल्म में उनके चरित्र को करने हैं। गाँव में आ बसे ऐसे सेवानिवृत अध्यापक, जिन्हे हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का बहुत अच्छा ज्ञान है, की छोटी सी भूमिका में वे अपने अभिनय कौशल का इस तरह से प्रदर्शन करते हैं कि उनकी उपस्थिति मात्र से ऐसा विश्वास हो जाता है कि वे संगीत के प्रकांड पंडित हैं और अपने चरित्र के दुखी और उदास पुत्री के दुखी पिता वाले भाग को भी वे बखूबी निभाते हैं।

ऐसा ही डेविड की उपस्थिति से भी होता है। ये दोनों और इनकी पीढ़ी के कुछ अन्य चरित्र अभिनेता कितनी ही फिल्मों में अक्सर फिल्म के नायक-नायिका के मुख्य किरदार निभाने वाले अभिनेताओं से ज्यादा अच्छा अभिनय करके दिखा चुके हैं। उनके अभिनय में एक सच्चाई होती थी।

उमा को एक गायिका दिखाया गया है और सचिन देव बर्मन इस बात का पूरा फायदा उठाकर लता की आवाज में बेहतरीन गाने रच गये हैं।

फिल्म के कथानक के अनुसार भी सिर्फ तेरे मेरे मिलन की ये रैना ही ऐसा गीत है जहाँ किशोर कुमार लता की बराबरी करते हैं वरना बाकी समय लता फिल्म के संगीत पर छाई रहती हैं।

अभिमान रिश्तों में आदर्श की भावना जगाकर और रिश्तों को समझ-बूझ और सभ्यता से निभाने की सीख देकर अपना एक गहरा असर दर्शक पर छोड़ जाती है। फिल्म यह भी सीख दे जाती है कि पति-पत्नी जैसे रिश्ते से व्यक्तिगत अहंकार को जहाँ तक हो सके दूर ही रखना चाहिये वरना जीवन में बड़ी हानि उठानी पड़ सकती है।

…[राकेश]

29 Responsesto “अभिमान(1973): श्रेष्ठ है कला और प्रतिभा, स्त्री या पुरुष नहीं”

  1. RAFAT ALAM says:

    राकेश साब, एक और अति सुंदर पोस्ट. क्या टिप्पणी लिखी जाये .आपका लिखा विवरण विषय अनुरूप तो होता ही है साथ आप सवाल भी करते हैं और सटीक जवाब भी खुद ही दे देते हैं ,तो लाजवाबी के सिवा क्या बचता है अपने दो सुंदर शेर भी छोड़े हैं
    मैं तंगदस्त हूँ ये गर राज़ खुल गया
    मेहमान बनकर कोई मेरे घर न आयेगा..वाह,वाह वो हतेली पढ़े कोन /जिसकी मुट्ठी खाली है
    वक्त्त के गुजरने से जख्म तो भर जाते हैं
    पर दिल से दर्द की एक ख़ालिश नहीं जाती
    कुछ दिन गए एक ब्लॉग उड़नतश्तरी में एक शेर छोड आया था याद आ गया सो अर्ज है
    मुमकिन है वक्त हर ज़ख़्म भर देता हो
    ज़ख्म भर भी जायें तो निशान कहाँ जाते हैं
    यही तो मज़ा है इमोशन का जिसमें चिराग से चिराग जलते है.
    साब,फिल्म उस दौर कि है जब महिलाएं इतनी कामकाजी नहीं थी तो प्रोफशनल जेलेसी वाली बात भी इतनी नहीं थी.(आज तो सबकुछ गडमड है लिव इन रिश्ते तक भी मान्य हैं )फिर भी जब जब पति पत्नी संबंधों के बीच प्रोफशनल जेलेसी आयी तबाही भी साथ लायी . फिल्म अभिमान जेसी कहानी पंडित रविशंकर जी(कोई गुरेज़ नहीं महान सितारवादक हैं) और अन्नपूर्णा जी के बीच भी घटी थी पर उस कहानी का दुखद अंत हुवा .अन्नपूर्णा जी(महान संगीतकार उस्ताद अल्लाह रक्खा खां सब.कि पुत्री और पंडित जी कि पत्नी) माना जाता है बहुत ही प्रतिभाशाली सितारनावाज़ थी ,ने सितार सदा के लिए छोड दिया .आह,इश्क फ़ना का नाम है …और एक कहानी सब- कांटीनेंट कि मशहूर पत्रकार जाहिदा हिना (जिनकी पाकिस्तान डायरी देनिक भास्कर के रसरंग अंक में ,मैं चाव से पढता हूँ)और सब-कांटीनेंट बड़े शायर जॉन एलिया के बीच घटी है .वही दुखद अंजाम जोन साब बहुत टूटे हुए हाल में जहान छोड गए.ह्रषिदा तो मानस सम्वेदना के मास्टर थे उन्होंने , चूँकि हमारी फिल्मों में दुखद अंजाम जनता कि पसंद नहीं इस लिए अभिमान का फैसला सूखी सी मुस्कान पर ला कर छोड दिया है .अन्यथा अधिकाश इगो जनित प्रॉब्लम्स का अंजाम दुखद ही होता देखा है. फिल्म में लाता जी के गाये गीत सदाबहार हैं .चलते चलते आपको कोट करने का जी चाह रहा है – पति-पत्नी जैसे रिश्ते से व्यक्तिगत अहंकार को जहाँ तक हो सके दूर ही रखना चाहिये वरना जीवन में बड़ी हानि उठानी पड़ सकती है।

  2. Jahanpanah says:

    ये फ़िल्म अगर आज-कल बनती तो निश्चित रूप से उमा वापस सुबीर के पास लौट कर नहीं आती. :D

  3. Rakesh says:

    आलम साहब,

    अन्नपूर्णा जी ने सुरबहार, सितार और संगीत नहीं छोड़ा, देश के बहुत सारे संगीतज्ञों ने उन्ही से संगीत की शिक्षा प्राप्त की है। अपनी कला की व्यवसायिक प्रस्तुती शायद उन्होने कभी भी खुले मंच से नहीं की न शादी से पहले, न शादी के बाद और न ही तलाक के बाद। एक दो अव्यवसायिक प्रस्तुती के जिक्र जरुर मिलते हैं।
    वे मुम्बई में रहती रही हैं और अपने फ्लैट की चारदीवारी के अंदर से ही संगीत की साधना और सेवा करती रही हैं। केवल चौदह साल की आयु में इक्कीस साल के रवि शंकर से विवाह करना। वे शायद ही मैहर से कहीं बाहर गयी होंगी और पण्डित जी यूरोप समेत दुनिया के कई देशों की यात्रा कर चुके थे।
    पण्डित जी के लिये भी विवाह के बाद के बीस पच्चीस साल संघर्ष से भरे थे और चालीस के दशक के अंत में निराशा में उन्होने आत्महत्या करने की योजना भी बना ली थी।
    दोनों का वैवाहिक जीवन उथल पुथल से भरपूर रहा ही होगा। फिर उनके बेटे का निधन, बाबा अलाउद्दीन खाँ का निधन, कितने ही तत्व रहे होंगे उन दोनों के अलगाव के पीछे। रविशंकर शायद विवाह के लिये उपयुक्त्त न रहे हों उस समय। अलगाव के बाद दोनों ने ही अलग अलग शादियाँ भी कीं। अन्नपूर्णा जी ने भी अस्सी के दशक में अपने एक शिष्य से विवाह कर लिया था।
    विवाह अलगाव वगैरह तो अपनी जगह हैं पर अन्न्पूर्णा जी को अपनी नायाब कला को यूँ छिपा कर नहीं रखना चाहिये था। वे तो बहुत सारे प्रसिद्ध संगीतकारों से ज्यादा बड़ी संगीतज्ञ हैं।
    उनके द्वारा दी गयी प्रस्तुतियों को सुनें नीचे दिये गये लिंक्स के द्वारा

    Annpoorna Devi – 1

    Annpoorna Devi – 2

  4. Rakesh says:

    जहाँपनाह,
    शायद। और शायद नहीं क्योंकि उमा की तरफ से तो अहं का टकराव है नहीं। विवाहेत्तर संबंध वाला मामला भी नहीं है जैसा कि अर्थ में या उससे पहले भूमिका में था और सत्तर के दशक की कुछ अन्य फिल्मों में था और जहाँ नायिका अंत में स्वतंत्र रुप से रहने का निर्णय लेती है।
    अकेले हम अकेले तुम भी नब्बे के दशक की अभिमान जैसी ही है और आमिर- मनीषा अंत में साथ रहने का निर्णय लेते ही हैं। हाँलाकि यह Kramer Vs Kramer का हिन्दी रुपान्तरण थी।
    उमा सुबीर के पास वापिस नहीं आती दिखाने के लिये कहानी में काफी फेर बदल करने पड़ते। फिर उमा के स्वस्थ होने वाला पूरा एंगल ही बदल जाता।

  5. Rakesh says:

    आलम साहब,

    मोहतरमा जाहिदा हिना और शायर जॉन एलिया के दैनिक भास्कर में छपे किस्से का ऑनलाइन लिंक है क्या आपके पास। अगर हो तो कृपया भेजने का कष्ट करें।
    धन्यवाद

  6. Jahanpanah says:

    सुबीर स्त्री और पुरुष के मध्य दोस्ती कैसी
    मुझे ‘मैंने प्यार किया’ का यह संवाद याद आता है ‘लड़का और लड़की कभी दोस्त नहीं हो सकते’| क्या यह केवल पुरातन विचारधारा है? मुझे अनुभव तो नहीं है परन्तु अपने अवलोकन के आधार पर कुछ हद तक इस कथन से सहमत दीखता हूँ.

  7. Rakesh says:

    जहाँपनाह,
    अब तो हम लोग उस युग में हैं जहाँ स्त्री-स्त्री या पुरुष-पुरुष की दोस्ती को भी शारीरिक दृष्टि से देखा जाता है। आपको याद है किन्ही महान आत्माओं ने Teletubbies की दोस्ती पर भी सवाल उठाये थे।
    रिश्ते कई स्तरों पर कार्य करते हैं और मानव के तो कई स्तर हैं ही।
    जाकी रही भावना जैसी प्रभू देखी तिन मूरत वैसी।
    कुछ गलत नहीं है किसी किसी की पूरी बनावट ही ऐसी है कि शारीरिक स्तर से उठने में उन्हे शायद साठ साल लग जायें
    सो वे हरेक रिश्ते को उस ढ़ंग से देखेंगे। कुछ के लिये एक चेतना तीस में ही आ जाती है।
    तो एक तो समाज द्वारा दी गयी कंडीशनिंग है जिसके तहत व्यक्ति सोचने लगता है वैसा जैसा कि सामान्य रुप से प्रचलन में है। दूसरा है व्यक्ति की अपनी प्रकृति।
    अगर ढ़ंग से विश्लेषण करेंगे तो पहले 12-14 और अब तकरीबन 9-11 साल से पहले की अवस्था को क्या कहेंगे।
    उस उम्र से पहले प्राकृतिक तौर पर (अगर बड़े लोग बच्चों को अपनी समझ न दें, नियंत्रित न करें) क्या कोई भेद लड़के लड़्कियाँ रखते हैं दोस्ती के मुद्दे पर? वे नहीं करते पर बड़े उन्हे प्रदुषित करते हैं।
    फिर गहराई से सोचेंगे तो रिश्तों का अतिक्रमण हर जगह हरेक स्तर पर होता है। मानव मन निरंतर शोधन चाहता है क्योंकि इसकी प्रकृति या प्रवृति के लिये प्रदुषित होना आसान है। नीचे गिरना अपने आप हो जाता है, ऊपर उठने के लिये प्रयास चाहियें।
    परिस्थितियाँ जरुर नियंत्रित करती हैं।
    एक तो स्थिति Blue Lagoon वाली है। पर अगर वहीं उन्ही परिस्थितियों में दस बच्चे छूट जायें तो रिश्ते कई तरह की संभावना लिये हुये पनपेंगे।
    फिल्म का संवाद एक स्तरीय है और बहुत छोटे सरोकार रखता है, इसका प्रभावी क्षेत्र बहुत सीमित है। जैसे कि यह कहना कि स्त्री-पुरुष के मध्य सिर्फ दोस्ती ही हो सकती है- भी छोटे सरोकार वाला बयान है।
    मानव जीवन में असीमित सम्भावनायें हैं। कोई एक परिभाषा कोई एक मॉडल तो सबको सम्भाल नहीं सकता।
    आदर्श स्थितियाँ हैं और व्यवहारिक स्थितियाँ हैं समाज की कंडिशनिंग है।
    बहुत कुछ व्यक्तियों के ऊपर भी है, अतिक्रमण न करना चाहें तो बहुत कुछ सम्भव है। एक ही व्यक्ति अलग अलग समय पर अलग अलग अनुभव और अलग अलग परिभाषा में यकीन करने वाले भाव से गुजर सकता है।
    कोई एक ही बात सच नहीं हो सकती, कभी नहीं हुयी।
    इसी फिल्म के संदर्भ में देखें तो चित्रा और सुबीर अतिक्रमण नहीं करते रिश्तों का और दोस्ती बनी रहती है।
    आप राजेंद्र यादव का एक था शैलेन्द्र जरुर पढ़ें।
    डा भारती के गुनाहों का देवता का इसी दृष्टिकोण से विश्लेषण करेंगे तो कई बातें साफ होंगी।
    चंदर और सुधा की कालेज वाली मित्र के बीच अतिक्रमण होने की संभावनायें कम हैं।

  8. rafat alam says:

    राकेश सब.पहली बात ,आपकी अन्न्पूर्णा जी के बारे में खोजपूर्ण जानकारी देने के लिए बहुत थैंक्स.जहाँ तक मुझे धयान है दोनों ने इक कॉन्सर्ट में मंच भी शेयर किया था. दूसरी बात मैंने जाहिदा हिना साहिबा की भास्कर में पाकिस्तान डायरी मेरे द्वारा शोक से पढ़ने का निवेदन किया था श्याद आप ने गोर नहीं किया .उनके और जॉन साब के बीच दीअवोर्स की बात विकिपीडिया आदि पर उपलब्ध है.

  9. Rakesh says:

    जी आलम साहब,
    माफ कीजिये, चूँकि जॉन एलिया साहब, उनके जीवन और उनकी शायरी से पहले कोई परिचय नहीं था, आपके लिंक्स के द्वारा ही इस खजाने से परिचय हो पाया। अतः ऐसा अर्थ निकाल लिया कि शायद जाहिदा जी अपनी पाकिस्तान डायरी में उनके बारे में भी लिख रही हैं। यही भ्रम था बस.
    आपके द्वारा लिंक देने के बाद तो उनके कई वीडियो देखे और कुछ पढ़ा भी उनके बारे में।
    आपको बहुत बहुत धन्यवाद उनसे परिचय करवाने के लिये। उन्हे, उनके जीवन को और शायरी को तो सिनेमा को कवर करना चाहिये।

  10. rafat alam says:

    Rakesh ji,mein aksar sarsari pathak hoon.Is liye bharmit hone per YA KOI TOKDENE PER hi thoda net per jata hoon. half an hour ki google per try se jo thoda nikla -indian express.com,notes from behind a locked door. sun.may 16 aur bhi sambandit matter hai.ye link adi mein itna nahi samajhta maf karen jo mila apko copy kar bhej raha hoon
    Annapurna eventually returned to her husband in Mumbai but the following years were equally turbulent. “By 1956, there were many problems in our marriage and in January there was a serious breakdown,” writes Shankar. They divorced in 1962, when Annapurna retreated into her Mumbai flat to teach a handful of students. “Baba had told me, that if ever the need arose, I would be able to earn my living through music and be economically independent,” she writes.

    Barring a few performances with Panditji, she refused to play for the public or record her music. Only a couple of grainy videos of her performing float around on YouTube. There are a handful of rare recordings with a few collectors. “Personally I did not enjoy performing… For me music has always been my offering to God. I never felt comfortable recording it,” she says.
    About Jon saab- also edited Urdu literary magazine “Insha”, where he came to know of another prolific Urdu writer Zahida Hina, and finally married her. Zahida Hina, a progressive intellectual in her own right, still writes for dailies, Jang and Express, on current political and social issues. He had 2 daughters and a son with her. Jaun and Zahida were divorced in mid 1980s. This left Jaun devastated and alone. He became alcoholic and depressed.
    Rakesh ji ap to serious scholar hain kuch aur nikle to please muje bhi batane ka kast karen.Waise shyad jeet ghoshit greats ki hi hoti hai .jo gaye unka kya.
    rafat

  11. Rakesh says:

    जी आलम साहब,
    अब तो कुछ मिलने लगा है अन्नपूर्णा जी के जीवन के ऊपर।
    ये लेख आपको पसंद आयेगा।

    http://adagio.calarts.edu/~bansuri/pages/anapurna_article.html

    एक जीवनी भी आयी है।
    http://www.sawf.org/newedit/edit09052005/bookreview.asp

    नीचे दिये लिंक में उनकी रवि शंकर जी के साथ की जुगलबंदी का ऑडियो भी है।

    http://indianraga.blogspot.com/2009/11/annapurna-devi-genius-who-chose-to-be.html

  12. rafat alam says:

    राकेश साब ,adagio… मैं पढ़ आया था.विकिपीडिया में भी उल्लेख है.खेर बात अभिमान फिल्म से चली थी और मुख्य खरी बात यही है की इगो सब कुछ मार सकती है.

  13. Jahanpanah says:

    राकेश जी,
    आपने सही कहा परन्तु मैं विशेष परिस्थितियों की बात न करके सामान्य परिस्थितियों की बात कर रहा था. और क्या यह ज़रूरी है की दोस्ती किसी रिश्ते में परिणित हो? बालक ज़रूर बाल्यावस्था में आपस में कोई भेद नहीं रखते परन्तु अगर बड़ों का हस्तक्षेप न भी हो तो भी उनमें एक समय पश्चात वो निश्छलता नहीं रह पाएगी यहाँ पर एक बार फिर मैं सामान्य परिस्थितियों के परिपेक्ष्य में बात कर रहा हूँ हालांकि इससे कुछ deviations हो सकते हैं.
    मेरे कुछ सहपाठी Friends सीरियल के काफी शौक़ीन थे. मैंने कभी नहीं पसंद किया और तमाम कारणों में एक कारण यह भी था कि Rachel (Jennifer Aniston ) अपना प्रेम कभी Joey (Matt LeBlanc ) तो कभी Ross (David Schwimmer ) में तलाश रही थी. हाँ यह कह सकते हैं कि वहां पर दो और किरदार थे लेकिन वे तो पहले से विवाहित थे. अतः उनकी आपसी दोस्ती एक ही स्तर तक सीमित रह सकती थी (हालांकि संभावनाएं हो सकती थीं) हाँ वहां Phoebe (Lisa Kurdow ) का किरदार कुछ अलग था लेकिन वहां भी बाकी पुरुष किरदारों से दोस्ती और प्रेम के बीच में ही बात अटकी थी. तो यहाँ पर मैं यही समझता हूँ कि अगर किसी को प्रेम कि तलाश है तो वह सबसे पहले अपने विपरीत लिंग मित्रों कि तरफ ही देखेगा वहां बात न बनने पर आगे बढ़ेगा. पर क्या उसके बाद दोस्ती में वही बात रह जाती है? ले देके यह दोस्ती और प्रेम के बीच में ही अटकी रहती है. गौरतलब है कि मैंने यह बातें औसत तौर पर कही हैं और इससे इतर भी चीज़ें होती हैं.
    काफी लम्बे समय तक मैं यह मानता रहा था कि girlfriend का तात्पर्य ऐसे मित्र से होता है जो कि महिला हो और मित्र हो. काफ़ी बाद में जाकर पता लगा कि इसका मतलब प्रेमिका (भी) होता है. मैं सिरे से इसे अभी भी स्वीकार नहीं कर पाया हूँ शायद इसलिए कि मुझे गर्लफ्रेंड काफी भौतिकवादी शब्द लगता है उसमें प्रेमिका शब्द कि गहराई नहीं है. :)

  14. Jahanpanah says:

    कला उनके पास भी है और वे चाहें तो उसमे और निखार ला सकते हैं
    परन्तु, नैतिकता के आधार पर तो अंतर्मन ये भी स्वीकार नहीं कर सकता क्यूंकि उसे लगेगा की वे अपनी हे पत्नी से प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं. ‘इर्ष्या तू न गयी मेरे मन से’ | ईर्ष्या तो ऐसे ही कब घुसपैठ करके बैठ जाती है, पता ही नहीं चलता. एक ही क्षेत्र में होने के कारण मानदंड निर्धारित करना आसान हो जाता है. यहाँ पर अगर हम ये मानकर चलें की सुबीर और उमा की शादी न हुई होती और उमा सुबीर से अधिक प्रसिद्द गायिका होतीं तो उनमें प्यार होना ही मुश्किल था. प्रेम unconditional नहीं होता जैसा की फिल्मों में दिखाते हैं इसकी भी सीमाएं निर्धारित होती हैं. मुझे अमिताभ की ही एक और फ़िल्म याद आ रही है संजोग. उसमें भी मैं सोच रहा था की क्या पति और पत्नी एक ही ऑफिस में काम कर सकते हैं जबकि पत्नी ऊंचे पद पर हो. ठीक है अगर तार्किक ढंग से सोचा जाए तो क्यूँ नहीं, लेकिन फिर भी न चाहते हुए भी उनमें एक अजीब सी दूरी जन्म ले लेगी (in general ). आप इसे पुरुषप्रधान मानसिकता कहकर खारिज कर सकते हैं परन्तु स्त्रियों की तरफ से कुछ भी ऐसा ही है. ये प्रवृत्ति दरअसल प्रकृति, समाज और संस्कृति का सम्मिलित रूप है और इनका विकास सैकड़ों वर्षों से होता आया है जिसे हम अपने तर्कों द्वारा एक दिन में खारिज नहीं कर सकते. मैंने शायद पढ़ या सुन रखा है या जैसा प्रचलित है कि पुरुष का कार्य धर्म-पालन है और स्त्रियों का कार्य उनके धर्म-पालन में सहायता करना है. इस तरह से वे पूरक होते हैं या स्त्रियाँ सहचर कहलाई जाती हैं. शायद इन्हीं के फलस्वरूप शायद ये बात हो गयी है कि जहाँ पुरुष सहचर हो जाते हैं वे रिश्ते उतने निर्बाध तरीके से नहीं चल पाते.

  15. Rakesh says:

    जहाँपनाह,

    प्रचलित परिभाषायें जरुरी नहीं सच भी हों या सच के करीब भी हों। हमारा समाज शरीर से आक्रांत समाज है। बिना किसी प्रतिबद्धता के एड्वेंचर्स वाले मामले या देखा देखी किसी बात को अपनाने के मामले को छोड़ दें तो जहाँ किशोर/युवा सहशिक्षा पद्यति में पढ़ते हैं वहाँ ऐसा नहीं हो सकता कि एक लड़के या एक लड़की को सबसे प्रेम हो जाये। ऐसा भी हो सकता है और होता है कि पूरे स्कूल या कॉलेज में किसी से भी प्रेम नहीं होता और मन को कोई बाहरी ही भाता है। जबरदस्ती केवल दिखाने के लिये बॉयफ्रेंड या गर्लफ्रेंड बनाना और बात है। इन बातों को भी सामान्य स्थितियाँ मानना गलत होगा ये भी फैशन की तरह बदलती रहती हैं। आज ऐसा प्रचलन है कल शायद न रहे।
    अमेरिकी टीवी सीरियल फ्रेंडस का तो सेट-अप ही अलग था। बहुत से ऐसे साथी भी होंगे अपके साथ जो उसे हॉस्टल में देखना तो पसंद करते होंगे पर छुट्टियों में घर जाने पर चाहते होंगे कि छोटे भाई बहन न देखें उस चाव से जैसे वे देखते रहे हैं। साथियों में फन-कोशंट के नाते बहुत सारी ऐसी चीजें पसंद की जाती हैं जिन्हे वे सामन्य स्थितियों में अपना समर्थन नहीं देंगे। फ्रेंडस का लक्ष्य अमेरिकी समाज था और वहाँ अलग सामाजिक परिभाषायें चलती हैं।
    वहाँ युवाओं को अजीब लगता है कि कैसे भारतीय युवा ऐसे व्यक्तियों से शादी कर सकते हैं जिन्हे वे व्यक्तिगत रुप से ज्यादा जानते नहीं हैं और उनके अभिभावक उनके लिये वर या वधू का चुनाव करते हैं। वहीं भारतीय अभिभावक अभी तक तनाव में जीते हैं कि कैसे उनके बच्चे अपने आप अपने लिये जीवन साथी चुन सकते हैं अभी तो इन्हे यह नहीं आता वह नहीं आता और बहुत से लोगों को यह डर भी है कि अगर सभी युवा अपने आप ही जीवनसाथी का चुनाव करने लगे तो उनकी भूमिका का क्या होगा।
    वास्तव में कोई भी पद्यति फूल प्रूफ तो है नहीं। हरेक के अपने अपने फायदे नुकसान हैं। अंत में तो एक अकेले व्यक्ति पर ही बात आकर ठहर जाती है।

  16. Rakesh says:

    जहाँपनाह,
    जहाँ तक कला और प्रतिस्पर्धा, जलन और नैतिकता वाली आपकी बात है तो विचार के स्तर की अशुद्धि को रोक पाना शुरु में संभव नहीं होता। दुनियावी व्यक्ति के दिमाग में कैसा भी विचार आ सकता है। यह अब व्यक्ति की प्रकृति के ऊपर है कि वह शोधन करके प्रदुषित विचार से ऊपर उठना चाहता है या उस जैसे विचारों को पकाता जाता है और पतन की ओर अग्रसर हो जाता है।
    संजोग में अमिताभ के पिता के लालच के कारण अमिताभ और माला सिन्हा का अलगाव हो चुका है। जिंदगी उनके व्यव्सायिक रोल्स बदल चुकी है। उनमें तो वैसे भी एक हिचक होनी है।
    पति-पत्नी स्पर्धा में बहुत ज्यादा हाथ समाज का है जो ऊट्पटाँग बातें स्त्री और पुरुष के ऊपर थोपता है।
    विकसित पश्चिमी देशों में ऐसा कम है और पत्नी पति से ऊँचे ओहदे पर काम करती होती है।
    आधुनिक युग में तो क्षेत्र भी महत्व रखता है। नब्बे के दशक के मध्य के बाद ऐसा हुआ है भारत में भी कि उच्च शिक्षा प्राप्त पति से ज्यादा वेतन उससे कम पढ़ी लिखी पत्नी को मिला है क्योंकि उसने कम्प्यूटर में कोई व्यवसायिक कोर्स किया हुआ था और इस क्षेत्र की धूम थी हर तरफ।
    बहुत सारे युवा दम्पति ऐसे मिल जायेंगे जहाँ पति एम.बी.ए आदि के कारण नौकरी छोड़ चुका है और तैयारी में लगा है और पत्नी घर चला रही है। या इस वैश्विक मंदी के दौर में पति की नौकरी चली गयी है और पत्नी की नौकरी से काम चलाना पड़ रहा है।
    समय अपने आप ढ़ाल देता है मनुष्य को सही सांचे में।
    और अगर मनुष्य में जीने का माद्दा है तो उसे झूठे अहंकार और झूठी परिभाषाओं के घेरे से निकलना ही पड़ता है।
    कही कहीं अहंकार आड़े आता है और हमारे सामने अमृता प्रीतम और इमरोज़ जैसे भी उदाहरण हैं जहाँ दोनो एक दूसरे को प्रोत्साहन देते रहे।
    आधुनिक युग में जैविक अंतर जैसी बात बहुत मायने नहीं रखती। भारत के छोटे स्थान अभी कूपमंडूक वाली स्थितियों में जी रहे हैं पर उन्हे बाहर निकलना ही पड़ेगा अगर जीना है तो।
    संतान अभिभावकों से आगे निकल जाती है तो क्या अभिभावकों के अहंकार को ठेस लगती है? सब कुछ तो मन में ही है। अगर स्वस्थ होकर सोचना चाहें तो समाधान हैं लोगों के पास।

  17. Jahanpanah says:

    हाँ मैं ये मानता हूँ की परिस्थितियां और समय अधिक बलवान होती हैं परन्तु मैं सामान्य समय और परिस्थितियों की बात कर रहा था. जैसा की आपने एक उदहारण दिया, मान लीजिये अगर पुरुष नौकरी न ही कर रहा हो और पत्नी नौकरीशुदा है तो क्या उनमें विवाह के अवसर हैं? विवाह के उपरान्त क्या होता है ये अलग बात है. आपने सही कहा की पश्चिमी देशों में ऐसे उदहारण मिल जायेंगे परन्तु भारत जैसे देशों में मुश्किल है. क्या यहाँ पर दोगलापन नहीं हुआ?

  18. Jahanpanah says:

    पुरुषों को दी जाने वाली सामंतवादी समझ – कि पुरुष हर मामले में स्त्री से श्रेष्ठ है
    आखिर ये समझ देता कौन है. मैंने अपने प्रारंभिक दिनों में जो कुछ भी पढ़ा या जाना था उनके आधार पर स्त्री की जो छवि बनी थी वो भौतिकता से परे अध्यात्मिक थी और उन्हें मैं पुरुषों से अधिक महत्त्वपूर्ण मानकर चलता था. परन्तु ये केवल कल्पनाओं की ही उड़ान थी और वास्तविकता से सामना होने पर ये छवि धूमिल पड़ने लगी. फिर तो मैंने उस तरफ से अपनी आँखें ही बंद कर लीं. लेकिन सत्य का सामना तो करना ही होगा.

  19. Jahanpanah says:

    राकेशजी एक चीज़ मैंने नोटिस की आपने Friends सीरियल को अमरीकी समाज केन्द्रित कहा और दूसरी टिप्पणी में पश्चिमी देशों में क्या प्रचलन है इसका उदहारण दिया. अब मैं यहाँ पर ये सोच रहा हूँ किस पॉइंट पर आकर हम किसी चीज़ को अपना और दूसरा कहकर नकार देते हैं और किन स्तिथियों में हम दूसरी चीज़ को अपना कहकर उसे अपना लेते हैं? वैश्वीकरण के इस दौर में अपने और पराये का भेद है क्या? और अगर है तो किस सीमा तक या किन परिस्थितियों में. मुझे तो कुछ भी स्पष्ट नज़र नहीं आता.

  20. Jahanpanah says:

    उन्हें कूपमंडूक की स्थिति कहना जायज नहीं मानता. यह इस बात पर निर्भर करता है की व्यक्ति समाजोन्मुखी है या आत्ममुखी. एक समाज में व्यक्ति विशेष की भूमिका निर्धारित होती है, आप जो छोटे शहरों की बात कर रहे हैं वहां अभी भी वही सामाजिक व्यवस्था चलती है. यहाँ पर हम दो तरह की व्यवस्थाएं मान सकते हैं, एक तो वह है जो कि प्रजातंत्र और पूँजीवाद के फलस्वरूप जन्मी है जिसमें संयुक्त रूप से समाज को महत्त्वपूर्ण न मानकर व्यक्ति विशेष को अहमियत दी जाती है और दूसरी वह जिसका उल्लेख मैंने ऊपर किया. यह ठीक है पहली व्यवस्था के फलस्वरूप किसी तरह कि भिन्नता का कोई स्थान नहीं है, व्यक्ति विशेष ही सर्वेसर्वा है और उसका उत्तरदायित्व स्वयं उसी के प्रति है परन्तु यह दूसरी व्यवस्था में नहीं है यहाँ समाज और परिवार के प्रति व्यक्ति उत्तरदायी है. एक व्यवस्था दूसरे से अच्छी है यह मैं नहीं कह रहा हूँ, अपने-अपने नजरिये के ऊपर है. हाँ यह बात ज़रूर है कि आजकल पहली व्यवस्था का ही प्रचलन है, विकास की आंधी उसी दिशा में चल रही है. ठीक है यह मुख्यतः बड़े शहरों में देखने को मिल जायेगी. आजकल समाज और परिवार के अर्थ बहुत सीमित हो गए हैं जिनमें केवल पति-पत्नी और उनके बच्चे ही आते हैं. व्यक्ति अपने जीवन के २५-३० साल अपनी ज़िन्दगी संवारने में और बाकी जीवन बच्चों की ज़िन्दगी में लगा देता है ये भी शायद इसलिए है कि अभी भी लोग एक व्यवस्था से दोसरे में पूरी तरह स्थानांतरित नहीं हो पाए हैं और बीच का मार्ग तलाश रहे हैं. आगे चलकर लोग और भी आत्मकेंद्रित होते जायेंगे और तब वे अपने बच्चों को भी एक समय पश्चात मुक्त कर देंगे जैसा कि पश्चिमी देशों में होता है. आपने लेकिन ये बात सही कही कि अगर उन्हें जीना है तो बदलना होगा क्यूंकि आज के प्रचलन के फलस्वरूप विकास का मार्ग उधर से ही होकर जाता है.
    मैं कभी-कभी सोचता हूँ कि विवाह का आखिर औचित्य क्या है? खासकर वहां पर जहाँ पर प्रेम नाम कि चीज़ पहले से न हो जैसा कि भारतीय परिवारों में arrange marriage का प्रचलन है. विवाह इत्यादि भी दूसरी व्यवस्था के ही प्रतीक हैं जहाँ प्रेम से अधिक महत्त्वपूर्ण हैं समाज और परिवार के प्रति दायित्व का निर्वाहन, यह दायित्व पुरुष अकेले पूरा नहीं कर सकता इसलिए उसे अर्धांगिनी की आवश्यकता होती है. live in relationship जैसी चीज़ें यहाँ कारगर नहीं हैं, ये पहली व्यवस्था के अंतर्गत आती हैं. और अगर कोई उसी (पहली) के अंतर्गत ही जीना चाहता है तो मैं इसे जायज भी मानता हूँ.
    यहाँ पर मैंने जो भी कहा वे extreme cases माने जा सकते हैं और इनके कई मध्यम मार्ग हो सकते हैं. मैं कुछ समय पहले धोनी के विवाह के पश्चात एक प्रचलित वेबसाइट पर विवाहित खिलाडियों के बारे में देख रहा था तो वहां पर किसी ने विश्वनाथन आनंद की पत्नी की आलोचना की थी कि वे खुद कोई काम नहीं करतीं वहीं किसी और ने अंजलि तेंदुलकर की सराहना की थी कि उन्होंने अपना पेशा छोड़ दिया. आखिर दोनों महिलाएं एक ही पॉइंट पर आयीं न. मुझे ये समझ में नहीं आया कि लोगों को चाहिए क्या? यहाँ पर ये केस भी मैं मध्यम मार्ग वाला ही मानता हूँ. ठीक है मैं जानता हूँ कि सभी को खुश करना मुश्किल है. अभी कुछ समय पहले Hindu में एक लेख पढ़ा था ‘http://www.thehindu.com/opinion/open-page/article600579.ece ‘ और इसके बारे में मैंने लेखिका मोहतरमा को एक मेल भी भेजा था. इस लेख का निचोड़ है कि ओग शुरूआती वर्षों में जैविक अंतर न करते हुए भी बाद में क्यूँ करने लगते हैं. यहाँ पर भी ये केसेस माध्यम मार्ग अपनाने वाले ही हैं जो कि कारगर सिद्ध नहीं होते दीखते और शायद इसलिए ऐसे लेख पढने को मिलते हैं. तो यहाँ पर फैसला ये करना होगा कि हमें चाहिए क्या? विकास जितनी तेजी से हो रहा है उतनी तेजी से मानसिकता नहीं बदल रही है, पूंजीवादी व्यवस्था में सफलता का एकमात्र मानदंड पैसा है और शायद इसीलिए दिल्ली जैसे बड़े शहरों में ‘save the girl child ‘ जैसे बोर्ड आम हैं जो कि छोटे शहरों में नहीं दीखते.
    आप कह सकते हैं कि परिस्थितियां बदलती रहती हैं और इसलिए एक ही व्यवस्था सदैव नहीं चल सकती. ठीक है मानता हूँ परन्तु परिस्थितियों को वश में करना काफी हद तक मनुष्य के हाथ में है. अभी हिंदी दिवस पर एक लेख पढ़ा था जिसमें ये चिंता व्यक्त की गयी थी आजकल रोमन में लिखने का प्रचलन इतना अधिक है कि हिंदी के पारंपरिक देवनागरी वाले स्वरुप को खतरा हो गया है. क्या यहाँ भी हम सबकुछ नियति और परिस्थितियों पर छोड़ दें? परिस्थितियां तो प्रतिकूल ही हैं उन्हें अनुकूल बनाना होगा. शास्त्रीय संगीत में सभागार में बैठे हुए लोगों में से आधे से ज्यादा लोग रूचि नहीं ले रहे हैं फिर भी बैठना उनकी मजबूरी है, ऐसे लोग दूरदर्शन पर यही कार्यक्रम देखना पसंद नहीं करेंगे और चैनल बदल देंगे. ऐसे लोगों को फिर जबरन ही जोड़ना पड़ता है और इनमें से अगर कुछ भी लोग रूचि लेने लगेंगे तो यह सफलता ही होगी. या फिर हम आजकल के प्रचलित नारे ‘we are free to do anything ‘ कि तर्ज़ पर चलें और सारा choice व्यक्ति विशेष के ही ऊपर छोड़ दें ? खैर मैं समझता हूँ कि ये दौर covert imperialism का है अतः खतरा सामने-सामने नहीं दीखता और जो २०० वर्षों के ब्रिटिश शासनकाल में संभव नहीं हुआ वो शायद अब हो जाए.
    P . S . यहाँ पर मैंने वही बातें लिखीं है जैसा कि मैंने महसूस की हैं, ये सत्यता से परे भी हो सकती हैं.

  21. Rakesh says:

    जहाँपनाह,
    भारत में भी ऐसे विवाह होते रहे हैं जहाँ स्त्री तो अच्छे पद पर नौकरी कर रही है और पुरुष या तो उससे कमतर पद पर है या नौकरी नहीं कर रहा है। कुछ प्रैक्टीकल किस्म के माता-पिता अपनी उच्च शिक्षा प्राप्त बेहद योग्य पुत्री के लिये ऐसे वर ढूँढ़ते रहे हैं। पर यह भी विवाह के स्थायित्व को मद्देनज़र रख कर किया जाता है। जैसा कि फिल्म में भी दिखाया और जैसा ऊपर टिप्पणी में रफत आलम साहब ने प.रवि शंकर और उनकी प्रथम पत्नी अन्न्पूर्णा जी का उदाहरण दिया और आपने भी इंगित किया, मुख्य दिक्कत प्रतिस्पर्धा आदि की तब आती है जब दोनों एक ही क्षेत्र में कार्यरत हों।
    ये समस्यायें अन्य बहुत सारी समस्याओं की भाँति ही अलग अलग व्यक्तियों के लिये अलग रुप लेकर आती हैं और उनके समाधान भी अलग अलग ही होते हैं।

  22. Rakesh says:

    जहाँपनाह,
    दोगलापन ही नहीं भारतीय समाज में हिपोक्रेसी हर स्तर पर मौजूद है। कई स्तरों पर समाज घिसट रहा है।
    केवल सिद्धांत के स्तर पर ही नहीं बल्कि समाज का एक बड़ा हिस्सा व्यवहार के स्तर पर भी यही सूबूत बच्चों को देता रहता है कि पुरुष नारी से श्रेष्ठ है।
    अगर नारी पुरुष में बराबर की प्रतिस्पर्धा हो तो पुरुष के लिये बहुत आसान है नारी की उपलब्धि को प्रदुषित मानना या घोषित कर देना। नारी को शारीरिक दृष्टि से परिभाषित किया जाता है।
    फिल्म तो नहीं बात करती पर लता मंगेशकर का ही उदाहरण लें तो हजारों किस्से उनके बारे में फैला रखे हैं कि उन्होने इसे गाने के क्षेत्र में आने से रोका, या उस संगीतकार से उनकी अदावत रही। रफी, किशोर, मुकेश, मन्ना डे भी दशकों हिन्दी फिल्म संगीत में उपस्थित रहे हैं। और कितने ही नये गायकों को इसलिये बढ़ावा नहीं मिला होगा क्योंकि उनसे ज्यादा सधे सुर वाले स्थापित गायक इन लोगों के रुप में मौजूद थे। बाजार तो स्थापित नाम देखता है।
    पर पुरुष गायक सामान्यतः इस आरोप से बच जाते हैं और लता को घेर लिया जाता है। अपनी भरपूर सनक के बावजूद ओ पी नैयर ठनक से याद किये जाते हैं पर लता द्वारा युवावस्था में किये गये व्यवसायिक व्यवहार को मुद्दा बनाकर उन्हे खलनायिका बनाने की चेष्टायें दशकों से चली आ रही हैं। उनका बड़ा नाम था और अगर उन्होने सुपर स्टार जैसा व्यवहार किया होगा तो उन्हे और उनके किस्सों को ऐसे ही देखना चाहिये जैसे हिन्दी फिल्म उद्योग के तमाम अन्य पुरुष सुपर स्टार्स के स्टारडम के कारण किये गये सनकी किस्सों को देखा जाता है।
    इंदिरा गांधी पर लांछन लगाने का प्रयास करने वाले उनकी अपनी पार्टी में भी थे जिन्हे तकलीफ थी कि कैसे एक स्त्री उनसे ऊँचे पद पर नियुक्त्त हो सकती है?
    जो आपने महिला की आदर्शवादी छवि और व्यवाहरिक छवि की बात की तो यह आदर्शवादी छवि भी पुरुष ने ही गढ़ी थी। अच्छाई और बुराई जैविक अंतर की मोहताज तो है नहीं। स्त्री में भी वे तमाम अवगुण पाये जाते हैं जो पुरुष में। किसी भी स्त्री पुरुष को बिल्कुल सामान्य मनुष्य मानकर चलने से ही सुलझापन आ सकता है। बाकी तो जिसका जैसा व्य्वहार होगा, प्रकृति होगी, प्रवृति होगी वह सामने आने ही लगती है।
    फ्रेंडस सीरियल या पश्चिमी अवधारणा को नकारने वाली बात नहीं थी। बात थी इस प्रकार के कॉमेडी सीरियल को हॉस्टल आदि में ज्यादा देखे जाने की प्रवृति की। ऐसे तमाम सिनेज्ञाता हैं जो दूसरे देश से आयी फिल्मों को किसी भी प्रकार के खुलेपन के साथ देखते हैं सराहते हैं बल्कि बहुमत तो विदेशी फिल्मों को खुलेपन के कारण ही देखता है, पर राज कपूर उनके लिये अश्लील हो जाते हैं जब वे सत्यम शिवम सुन्दरम के द्वारा कुछ कहना चाहते हैं।
    तो दो चश्में तो ऊपर से लेकर नीचे तक भारतीय समाज में प्रदुषण फैला रहे हैं।
    उनके अपने लिये पश्चिमी समाज में जो कुछ भी है वह खुला हुआ है। हाँ जब पश्चिमी समाज बाहर वालों से एक ग्रुप के रुप में डील करते हैं तो उनका दबा-छिपा पन नज़र आने लगता है परंतु एकल स्तर पर सामान्य मामलों में वे स्पष्ट रहते हैं।
    उदाहरण के लिये किसी भी मामले में भारतीय या एशियन बहाने बनाते हैं क्योंकि उन्हे लगता है कि वे अपने अंग्रेज साथी को मना कैसे कर सकते हैं किसी बात के लिये, परंतु वे स्पष्ट अपनी भावना प्रकट कर देते हैं। अगर उन्हे कोई चीज नहीं आती, या उनके पास समय नहीं है तो वे स्पष्ट मना कर देंगे परंतु किसी भारतीय या एशियन से ऐसा करने की उम्मीद करना भी मूर्खता है क्योंकि वे प्रदर्शन में जीते हैं और विकासशील देश के होने के कारण सर्वाइवल का प्रश्न उन्हे हमेशा घेरे रहता है।

  23. Rakesh says:

    जहाँपनाह,
    जहाँ तक अनुभव बताता है समाजोन्मुखी व्यक्ति वही है जिसमें अंदर से नेता बनने की इच्छा है फिर भले ही बात अपनी गली के नेता बनने की हो।
    यहाँ हदय से संत प्रुरुषों की बात नहीं हो रही जो करुणावश समाज और लोगों को राह दिखाने के लिये प्रेरित हैं। नेतागिरी भारत में एक ग्लैमराइज्ड कैरियर है जैसे कि फैशन, फिल्में और मॉडलिंग आदि।
    और व्यवहार में यह भी देखा गया है कि इन स्वयंभू नेताओं मे से समाज की बात करने वाले तो बहुत लोग हैं पर वे उसी समाज का हिस्सा बनना नहीं चाहते और वहाँ ये हद दर्जे की निजता चाहते हैं ताकि इनके कर्म जनता के सामने न आयें।
    आत्मोन्मुखी व्यक्ति तो बहुत अच्छी बात है।
    जब छोटे शहर आदि की बात की तो यह विचारना जरुरी है कि बड़े शहर में व्यक्तियों के मध्य ज्यादा स्पेस होने से वैयक्तिक स्वतंत्रता भी है। और छोटे शहर बड़े शहरों की तमाम बुराइयाँ तो एकदम से अपना लेते हैं पर जो थोड़ी बहुत अच्छाइयाँ हैं उन्हे अपनाने से गुरेज करते हैं। छोटे शहर ऐसे अच्छे बदलाव के प्रति बहुत हद तक कठोर होते हैं और जाति, धर्म, ऊँचनीच आदि सामाजिक बुराइयाँ सबसे अंत में छोटे शहरों, कस्बों और गाँवों से जाती हैं क्योंकि वहाँ हर आदमी आपस में परिचित है अत: व्यक्तिगत बुराइयाँ अपने केन्द्रित रुप में वहाँ बसती हैं। आज के गाँव फिल्मों में सामान्यीकरण किये हुये झूठे तरीके से दिखाये जाने वाले गाँव नहीं हैं। वहाँ बहुत ज्यादा दिक्कते हैं। जलन ज्यादा है। षडयंत्र ज्यादा हैं।
    धन आज की सबसे बड़ी सच्चाई है। कम पैसे वाले परिवार हंसी खुशी इकट्ठे रहते हैं बिना किसी मन मुटाव के – ये सब अस्सी तक बनी हिन्दी फिल्मों में दिखाये जाने वाले परिवारों के लिये ही सत्य था। व्यवहार में बिल्कुल उल्टा होता है। अगर किसी संस्कारी परिवार के पास समुचित मात्रा में धन है जिससे कि सभी लोग न्यायोचित ढ़ंग से सम्मानजनक जीवन जी सकें तो आपस में प्यार आदि बने रहने के अवसर हैं पर अगर जीवन को जीने का ही संघर्ष बना हुआ है तो कोरे और थोपे या ओढ़े हुये संस्कार, जलन आदि भाव को नहीं रोक पाते। किसी में बेहद श्रद्धा हो अपने सिद्धांतो के प्रति तो बात अलग है, पर ऐसी बातें अपवाद स्वरुप ही देखने को मिल सकती हैं।
    चाहे पूँजीवाद हो या समाजवाद या साम्यवाद, हर तरह का समाज व्यक्ति के खिलाफ है, वह चाहता है कि व्यक्ति अपना न सोचकर समाज का गुलाम बन कर रहे। दुनिया में बड़े बड़े अमानवीय अपराध लोगों से समाज ने करवाये हैं उन्हे इस बात से सम्मोहित करके कि वे समाज हित में बहुत बड़े काम करने जा रहे हैं। पर उन कर्मों के परिणाम मानवता के खिलाफ गये हैं।
    वैयक्तिक स्वतंत्रता में ही संभावना बनती है व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास की अन्यथा समूह में रहने और काम करने वाला व्यक्ति किसी और ही के सपने पूरा करता रहता है। वह लगभग अंधा बनकर कार्य करता है।
    किसी बात को खाली सिद्धांत के स्तर पर मानने में और उसी बात को खुद से जीकर और गहरायी से जानकर मानने में बड़ा फर्क होता है।

    विवाह ही क्यों ज्यादातर सम्बंध ऐसे ही होते हैं कि यदि उनमें ईमानदारी से आहुति नहीं दी जाती तो वे गहरायी नहीं पा पाते और एक सीमा के बाद दिखावट और बनावट अपना रंग दिखाने लगती हैं।
    विवाह आदि गठबंधन सामाजिक नियम हैं। इनका विकल्प भी जरुर ही हो सकता है और है। अमृता प्रीतम और इमरोज़ ने विवाह नहीं किया, उनके सम्बंध को लिव-इन ही मानेंगे पर वे विवाहितों से ज्यादा नजदीक रहे। प्रेमियों के झगड़े को छोड़ दें तो उन्होने प्रेम से जीवन जिआ। और पति-पत्नी अगर अदालत में न भी पहुँचें तो भी मन ही मन अलगाव के साथ समय गुजारते हैं।
    यह जरुर है कि विवाह यह स्पेस तो देता ही है कि अगर थोड़ा बहुत अलगाव है तो इस रिश्ते की खातिर दोनों सोच समझ सकते हैं और ईमानदारी से रिश्ते में वापसी कर सकते हैं।
    घुम फिरकर बात स्त्री-पुरुष की बराबरी पर आ जाती है रिश्ते ज्यादा स्वस्थ होंगे उस समाज में जहाँ सम्मान, बेइज्जती आदि जैसे शब्दों की परिभाषायें स्त्री और पुरुष के लिये एक ही होगी। जिस काम से स्त्री बदनामी पाती है अगर वही परिभाषा पुरुष पर भी लागू होती है तो स्त्री-पुरुष सम्बंधों में स्वस्थता आयेगी। पर दुर्भाग्य से भारतीय समाज में ऐसा नहीं है इसीलिये इतनी भ्रामक स्थितियाँ भी हैं स्त्री-पुरुषों को लेकर।
    नारी के प्रति बहुत सारे अपराध उसे मजा चखाने के लिये किये जाते हैं।
    किसी की पत्नी काम करे न करे, इस पर वरडिक्ट देने वाली भीड़ कुछ सोच समझ कर नहीं बोलती है। यह सब दिमाग की खुजली शांत करने और समय बिताने के धंधे हैं। एक आदमी कैसे जान सकता है कि जिसे वह व्यक्तिगत स्तर पर नहीं जानता उसके जीवन की सच्चई क्या है?
    वाला लेख पढ़ा नहीं है पर आपने जो जिक्र किया कि ऐसा मुद्दा उठाया गया है कि पहले पहल जैविक अंतर की बात नहीं मानते बहुत सारे लोग लेकिन बाद में मानने लगते हैं। ऐसा इसलिये होता है कि ये लोग सिर्फ सैधांतिक स्तर पर ही इन बातों में विश्वास करते हैं। जैसे जैसे उनका व्यक्तिगत जीवन प्रभावित होने लगता है स्त्री की उपस्थिति से उनके क्षेत्र में वे उनके विरोधी होने लगते हैं। अगर उन्हे खुद पर भरोसा हो तो वे समानता के बिंदु पर डटे रहेंगे। यह मामला कुछ कुछ दहेज जैसा ही है कॉलेज में बहुत सारे युवा बढ़ चढ़ कर इस प्रथा के खिलाफ बोलते हैं पर अपनी शादी के समय लालच सारे आदर्श पीछे ढ़केल देता है और तब उन्हे लगता है कि कौन घर, गाड़ी आदि के इंतजाम में अपने बेहतरीन साल बर्बाद करेगा, एक बार ये सब चीजें अपने पास आ जायें तो जीवन शांति से कटेगा। प्रशासनिक सेवा में जाने वालों को खुलेआम बात करते हुये देखा जा सकता है कि उन्हे इतना दहेज तो चाहिये ही।
    लड़कियाँ खुद देखी गयी हैं अपने होने वाले पति को प्रेरित करती हुयी कि इतना माँग लो, इस समय शर्माने से लुटिया डूब जायेगी।
    दूसरा पहलू यह भी है कि बचपन से लड़की की शादी होने तक उस पर जान छिड़कने वाले भाई कुछ सालों बाद पैतृक सम्पत्ति में से अपनी बहन को कुछ भी देना नहीं चाहते। उनकी पत्नियाँ खुद नहीं चाहेंगी ऐसा होने देना। भारतीय समाज बहुत ज्यादा जटिल है।
    इसमें ढ़ेरों बुराइयाँ बहुत गहरे से समायी हुयी हैं। कुछ अच्छे लोगों के जीवन के उदाहरण से हम लोग रीति रिवाजों की बुराइयों पर से पर्दा उठाने में आलस करते हैं।

  24. Jahanpanah says:

    कुछ प्रैक्टीकल किस्म के माता-पिता अपनी उच्च शिक्षा प्राप्त बेहद योग्य पुत्री के लिये ऐसे वर ढूँढ़ते रहे हैं।
    हूँ , मैं ऐसे ही किसी परिवार की तलाश कर रहा हूँ ;)

  25. Jahanpanah says:

    आत्मकेंद्रिता और आत्मोन्मुखी निश्चित रूप से दो तरह की चीज़ें हैं या अगर ये एक ही हैं तो ये दो प्रकार की हैं. आप जिस आत्मोन्मुखी स्वभाव की वकालत कर रहे हैं वो फक्कडपन वाला है, जहाँ मानव सारे सांसारिक संबंधों से विमुक्त होकर एकमात्र सम्बन्ध ईश्वर से रखता है. आध्यात्मिकता से प्रेरित आत्मोन्मुखी स्वभाव यही है. ऐसे में तो कोई सीमाएं मान्य नहीं, सारी लिखी, कही सुनी बातें बेमानी हैं. हम यहाँ पर सिनेमा से सम्बंधित बहस क्यूँ कर रहे हैं? वे भी केवल इन्द्रियों को सुख प्रदान करती हैं? इस तरह का आत्मोन्मुखी होना आध्यात्म की तरफ जाना हो सकता है. परन्तु यहाँ पर मुझे महाराज जनक जैसों का उदहारण स्मरण आ रहा है. वे आतंरिक रूप से विमुख होते हुए भी बाह्य रूप से सांसारिक कार्यों में ही लिप्त रहे, क्या उन्हें मैं अपनी प्रजा और तत्कालीन समाज से विमुख कह सकता हूँ? मैंने जिस आत्मकेंद्रिता की बात की थी वह भौतिकता से प्रेरित थी, माया के चमक से चकाचौंध मानव की आत्मकेंद्रिता. ठीक है परन्तु यहाँ पर मैं यह सोच रहा हूँ कि फिर आप प्रेमचंद्र की समाजोन्मुख रचनाओं को आप क्या कहेंगे? या फिर पचास और साठ के दशक में बनी फिल्मों को? और यदि कोई उन्हें उनके premise और scope और उन्ही के सन्दर्भ में रखकर उसकी प्रसंशा या आलोचना करता है तो मैं समझता हूँ कि वो खोखली प्रसंशा या आलोचना है. एक बार गजानन माधव मुक्तिबोध का लेख पढ़ा था जिसमें उन्होंने लिखा था कि व्यक्ति जितना बौद्धिक होता जायेगा उतना ही आत्मकेंद्रिता बढती जायेगी उसके मानवोचित गुण (क्षमा, करुना इत्यादि) कम होते जायेंगे. यहाँ पर मैं ये समझने की चेष्टा कर रहा हूँ की वे किस आत्मकेंद्रिता की बात कर रहे हैं. निश्चित रूप से आध्यात्मिक वाली नहीं.

  26. Jahanpanah says:

    दहेज़ के बारे में आपने ठीक कहा. ये निबंध वाली बात का जिक्र एक बार कहीं और मैंने भी किया था. मुझे याद है कॉलेज के प्रथम वर्ष में आते ही किसी सीनिअर ने सलाह दी थी की प्रेम विवाह मत करना वरना दहेज़ नहीं मिलेगा. :D
    ये कुछ कुछ vicious circle भी बन जाती है मेरे एक रांची के मित्र ने कहा था कि चूंकि छोटी बहन की शादी में उन्हें दहेज़ देना पड़ेगा इसलिए उसकी खुद की शादी में लेना मजबूरी है. ठीक है आप कह सकते हैं कि उसे लेने कि ज़रुरत नहीं इत्यादि परन्तु लोग मानसिक स्तर पर इतने मजबूत नहीं हैं, और इसलिए हो सकता है कि न लेने की बात बाद में कचोटे.

  27. Rakesh says:

    जहाँपनाह,
    क्षमा करें, व्यस्तताओं की धमा-चौकड़ी के मध्य आपकी टिप्पणियाँ पढ़ पाने का अवसर नहीं मिला पिछले दिनों। शीघ्र ही आपकी टिप्पणियों का उत्तर देने की कोशिश करुंगा।

  28. jayanti jain says:

    u deal in great details, great truth of society and life which men will not accept easily

  29. Rakesh says:

    धन्यवाद जयंती जी

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