एक सौ सोलह चाँद की रातें : खुद चाँद भी नहीं लौटा पायेगा

एक सौ सोलह चाँद की रातें : खुद चाँद भी नहीं लौटा पायेगा

फिक्र तौसवीं ने क्या कभी सोचा होगा कि उनकी कृति प्याज के छिलके का शीर्षक एक फिल्मी गीत के लिये एक रुपक का काम करेगा?

पर ऐसा तो सदियों से सिद्ध होता रहा है कि

जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे कवि

कवियों को कुछ खर्चा तो करना पड़ता है नहीं कहीं पहुँचने के लिये। सिद्ध योगियों को भी सूक्ष्म शरीर की यात्रा करने के लिये बरसों घोर तपस्या करनी पड़ती है तब भी लाखों में से किसी एक बिरले को ऐसा सौभाग्य मिलता है पर कवि तो कहीं भी, कभी भी कैसे भी, पहुँच जाते हैं।

इजाज़त के गीत – ” मेरा कुछ सामान …” में ” एक सौ सोलह चाँद की रातें एक तेरे काँधे का तिल ” वाली पंक्त्ति पर बहुत सारे श्रोता अटके रह गये हैं कि इस पंक्त्ति का अर्थ क्या है और क्यों गुलज़ार साब ने ये पंक्त्ति लिखी?

इजाज़त पर पिछला लेख (Ijaazat (1987) : चाँदनी में जमीं से उठते सायों की स्मृतियाँ) पढ़ कर एक पुराने मित्र ने फोन पर चर्चा छेड़ दी। उन्होने कहा कि एक सौ सोलह चाँद की रातें वाला मुद्दा लेख में शामिल होने से रह गया है। पहली बार इजाज़त हम लोगों ने साथ ही देखी थी और वे भी इस फिल्म और इसके संगीत के बरसों से मुरीद रहे हैं।

मित्र की इजाज़त से उसी बातचीत से लिये हुये कुछ अंश नीचे प्रस्तुत किये गये हैं।

मित्र ने शुरुआत की:

“बॉस, मैने कहीं पढ़ा है कि एक सौ सोलह वह संख्या है जितने दिन/रात माया महेंद्र के साथ रहती है”

“कब महेंद्र की शादी से पहले”?

“शायद”

“पर तब भी क्या कवि हृदय माया, जो कि एक बेतरतीब इंसान है और जो किसी योजना पर अमल करके जीने में विश्वास नहीं करती, एक मिनट में इतनी केलकुलेटिव हो जायेगी कि इतनी सटीक संख्या लिख भेजेगी महेन्द्र को? यह बात तो माया के चरित्र से मेल खाती नहीं और न ही माया द्वारा महेन्द्र को लिखी कविता नुमा पाती की प्रकृति और प्रवृत्ति से मेल खाती है। कहाँ तो सारी पाती उन बातों का जिक्र करती है जो सिर्फ अहसास हैं और जिन्हे सिर्फ उन्हे जीने वाला ही याद कर सकता है। तो फिर ऐसे कवित्त भाव वाली पाती में कहाँ से एकदम व्यवसायी प्रकृत्ति घुसपैठ कर जायेगी कि माया बैंक के चैक की तरह एक खरी खाँटी संख्या एक सौ सोलह वापस माँगने लगेगी। जमी नहीं यह बात”

मित्र कुछ देर चुप रहे फिर सहसा उत्साह और ऊर्जा से भरकर मैदान में आ गये,”बॉस मुझे याद आ रहा है कि कहीं नेट पर ही पढ़ा था कि जब सुधा चली जाती है महेन्द्र को छोड़कर तब माया महेन्द्र के साथ चार महीने रहती है और चार महीनो के होते हैं एक सौ बीस दिन/रात और उसमें से चार अमावस्या की रातें निकाल दो तो बच जाती हैं एक सौ सोलह चाँद की रातें। बोलो हिसाब सही बैठता है कि नहीं”

“मित्रवर यह तो आपने पहले से भी ज्यादा विचित्र हिसाब किताब बता दिया जिसका कोई भी सम्बंध कम से कम गुलज़ार वाली इजाज़त से तो दिखायी नहीं ही देता”

“क्यों क्या गलती है इस हिसाब में”। मित्र कुछ आवेश में बोले।

“पहला ऑब्जेक्शन तो यह है महोदय कि फिल्म कहीं भी यह नहीं दिखाती कि माया महेन्द्र के साथ चार महीने रहती है। महेन्द्र ही सुधा को रेलवे प्लेटफार्म पर लगे बैंच पर बैठे बैठे सुधा को बताते हैं कि दिल का दौरा पड़ने के एक माह बाद माया उनके पास आयी थी और कुछ दिन वहीं रही देखभाल करने के लिये। सुधा की माँ दादा जी को बताती हैं कि सुधा दो महीने से महेन्द्र को छोड़कर यहाँ आकर बैठी हुयी है। सुधा, दीना पाठक को भी यही बताती है कि दो महीने से महेन्द्र ने उनसे कोई सम्पर्क नहीं किया है और कुछ दिन पहले उन्होने ही फोन किया था जो माया ने उठाया था। इन सब घटनाओं से से माया की मृत्यु होने तक माया महेन्द्र के साथ चार महीने रहती है, इस बात का कोई जिक्र फिल्म नहीं करती… आप मुझे भी लिंक भेजें…। ऐसी थ्योरी के लेखक महोदय भी तो इजाज़त प्रेमी ही होंगे, इसी बहाने एक अन्य इजाज़त प्रेमी से परिचय हो जायेगा”

बात को पूरी होने से पहले ही मित्र बोल पड़े,” पर फिर यह भी तो हो सकता है कि माया महेन्द्र के साथ चार ही महीने रही हो”

“बिल्कुल हो सकता है, पर फिल्म ऐसा दिखाती नहीं है और दर्शक अपने मन से तो कल्पना कर नहीं लेगा, और अभी असली आपत्ति तो सुन लो इस थ्योरी के ऊपर”

“असली वाली भी बता दो”

“मान्यवर पिछले बीस सालों में आपने इजाज़त कम से कम सात-आठ बार तो देखी ही होगी। अपने दिमाग को थोड़ा सा कष्ट देंगे तो आप याद कर पायेंगे कि कब इस गीत वाली पाती महेन्द्र को मिलती है?”

मित्र चुप रहे।

“आपकी चुप्पी बता रही है कि आपको बखूबी याद आ रहा है कि यह पाती महेन्द्र को मिलती है सुधा से शादी करने के कुछ समय बाद ही, जब सुधा महेन्द्र से कहती हैं कि वे माया की चीजें उसके पास पहुँचवा दें और सामान भेजने के बाद महेन्द्र को तार मिलता है जिसमें कविता- “मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है” लिखी हुयी है। तो माया द्वारा महेन्द्र के दिल के दौरे के बाद उनके साथ बिताये गये समय की बात तो आप भूल ही जाओ। इस घटना से बहुत पहले का वाक्या है इस कविता का जन्म। यह तो सुधा और महेन्द्र के हनीमून पर कुद्रेमुख पर जाने से भी पहले की घटना है”।

मित्र ने हथियार डाल दिये और गहरी साँस लेकर वे बोले,” एक थ्योरी हाथ लगी थी तुमने उसमें पंक्चर कर दिया। अब नतीजा वही ढ़ाक के तीन पात।”

“अगर आप ढ़ंग से मेरा कुछ सामान सुनें तो उसमें तो माया उनकी और महेन्द्र की सांझी विरासत की बातें कर रही हैं। वे तो हवलदार से मिली अठन्नी में से भी अपने हिस्से की चवन्नी ही माँग रही हैं। जो कुछ भी साझा था उनके और महेन्द्र के बीच वे उसमें से आधा माँग रही हैं। अगर माया व्यापारी की तरह एक सौ सोलह चाँद की रातों को माँगेंगी तो ऐसा तब ही हो सकता है जब उन्हे पता हो पक्के तौर पर कि उन्होने और महेन्द्र ने दौ सौ बत्तीस चाँद की रातें साझे रुप से साथ साथ व्यतीत की हैं। पर फिल्म तो ऐसा कुछ नहीं दिखाती या बताती। जब गुलज़ार साब ने ही फिल्म के कथानक में ऐसी कोई तयशुदा बात नहीं दिखायी तो दर्शक कैसे अपनी तरफ से कल्पना कर सकता है कि बस यही वह संख्या है जितनी रातें माया और महेंद्र साथ रहे हैं।”

“तो गुत्थी तो उलझी ही रह गयी ना”

” अरे भाई, गुत्थी क्या है इसमें एक सौ सोलह चाँद की रातें एक ऐसे ही वर्णित की हुयी संख्या है। ऐसी कल्पनाओं का समावेश अपनी रचनाओं में करके दर्शकों और श्रोताओं को जाग्रतावस्था में रखने की कलाकारी तो गुलज़ार साब शुरु से ही करते रहे हैं, फिर चाहे उनकी बनायी फिल्में हों, या उनके लिखे संवाद और गीत।

दो दिन पहले मित्र को निम्नलिखित मेल भेज दिया।

प्रश्न : गुलज़ार साब, इजाज़त के गीत, मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है, उसमें एक पंक्ति आपने लिखी है, एक सौ सोलह चाँद की रातें एक तुम्हारे काँधे का तिल, उसमें कँधे का तिल तो समझ में आता है, पर ये “एक सौ सोलह चाँद की रातें” जैसी गिनती किस बात का प्रतिनिधित्व करती है?

गुलज़ार: आइ डोंट नो, इट वाज जस्ट ऐ रेंडम नम्बर।

प्रश्न: पर … लोग कितने सालों से इसकी व्याख्या करते आ रहे हैं। कुछ तो अर्थ होगा इस संख्या का?

गुलज़ार : कोई विशेष अर्थ तो याद नहीं आता। कोई संख्या लेनी थी सो ऐसे ही एक सौ सोलह आ टपकी दिमाग में। अब एक सौ सोलह कितनी अच्छी संख्या है। जोड़ो तीनों अंको को तो निकल के आता है आठ और आठ में एक शून्य के ऊपर दूसरा शून्य टिका है, बड़ी जादुई संख्या है शून्य। पहले जोड़ दो किसी संख्या के तो एकदम से उसके शेयर डाऊन हो जाते हैं और बाद में जोड़ दो तो गुणात्मक वृद्धि हो जाती है संख्या की कीमत में।

प्रश्न: जैसे चाँद साल भर में अपनी कलायें बदलता रहता है तो क्या एक सौ सोलह वह संख्या हो सकती है जितनी बार चाँद अपनी कला बदलता है एक साल में।

गुलज़ार : हो सकता है, बिल्कुल हो सकता है। हो सकता है कभी ऐसा पढ़ा हो और मेरे अवचेतन में ऐसा बैठा रह गया हो और जब चाँद की रातें लिखने की बारी आयी तो एक सौ सोलह अपने आप दिमाग में से बाहर आकर खिल गयी। ***

*** विशेष नोट : मेरी जानकारी में गुलज़ार साब ने ऐसा किसी से कहा नहीं है परन्तु मेरा विश्वास है कि जब वे किसी को इस गीत के ऊपर साक्षात्कार देने और अपने आप को खोलने के लिये राज़ी हो जायेंगे तो ऐसी ही कुछ बातें कहेंगे।

खैर, इस ” एक सौ सोलह चाँद की रातें ” वाली बात, जो कि लोगों ने बिना मतलब ही एक गुत्थी बना डाली है, से इतर गीत बेहद आकर्षक है।

गुलज़ार ने बहुत अच्छे विम्ब इस गीत में रचे हैं, और आशा भोसले ने बहुत ही मधुर तरीके से गीत को गाया है। पंचम ने ऐसी कमाल की धुन बनायी है कि न केवल बनाने में प्रयुक्त्त धैर्य दिखायी देता है बल्कि गीत अपने असर से धैर्य को बिखेरता चला जाता है और व्याकुलता को साफ करता जाता है। श्रोता प्रेम, दुख और भावनाओं के सागर से रुबरु तो होता है पर कहीं भी किसी भी क्षण किसी भी शब्द पर उसका दिमाग उत्तेजित नहीं होता है।

गुलज़ार ने ही बरसों पहले पंक्त्तियाँ लिखी थीं :-

सिर्फ अहसास है ये दूर से महसूस करो, प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो।

प्यार के अनछुये अभौतिक अहसास की बातें इजाज़त के “मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है” में भी हैं।

सावन के कुछ भीगे दिन, ख़त में लिपटी रात ” भौतिक रुप से देखने समझने की चीजें या बाते नहीं है और उन्हे सिर्फ अहसासों में ही जिआ और महसूस किया जा सकता है।

पतझड़ में कुछ पत्तों के गिरने की आहट / कानों में एक बार पहन के लौट आयी थी / पतझड़ की वो शाख अभी तक काँप रही है वो शाख गिरा दो / मेरा वो सामान लौटा दो

ऐसी विम्बीय कल्पनायें और तुलनायें व्याख्या करने के लिये नहीं होती। इन्हे जैसे का तैसा ही स्वीकार किया जा सकता है। गुलज़ार खुद चाहें तो वे भी इन पंक्तियों की व्याख्या नहीं कर पायेंगे।

पेड़ों की फैली शाखाओं एवम उन शाखाओं पर बसते पत्तों से हवा के टकराने से उत्पन्न हुयी आवाज को सिर्फ वही समझ/याद कर सकता है जिसने वास्तविक ज़िन्दगी में ऐसा अपनी आँखों से देखा है और कानों से सुना है।

हवा सांय सांय चल रही थी पढ़ कर ही इस बात का पूरा अस्तित्व नहीं जाना जा सकता।

कुछ बातें अनुभूतियों के दायरे में ही पनपती हैं और यह गीत तो पूरा का पूरा अनुभूतियों के अस्तित्व के सहारे ही रचा गया है और इसी भरोसे इस गीत का अस्तित्व भी है कि जानने वाले इस गीत और इसके शब्दों और भावों को पहचान लेंगे।

जब एक अकेली छतरी में दो प्रेमी चलेंगे तो प्रेम करने वाले चाहेंगे कि उनका प्रेमी कम से कम भीगे और दोनों के ऐसा प्रयास करने से ही उनका स्पर्शित और जुड़ा हुआ हिस्सा तो सूखा रहेगा पर बाहर के हिस्से जो नितांत अलग हैं वे ही भीगेंगे। माया कहती है कि जो कुछ जुड़ा हुआ था वह उसके साथ आ गये हैं क्योंकि वह अकेली है, उसकी यादों की सांद्रता और तीव्रता ज्यादा है महेन्द्र से। वह जितनी शिद्दत से पुरानी यादों को महसूस कर सकती है उतनी गुंजाइश महेन्द्र के साथ नहीं है। सुधा से विवाह के कारण महेन्द्र के जीवन में परिवर्तन आ गये हैं और नये परिवर्तन बहुत कुछ बदल देते हैं। अगर महेन्द्र के पास अभी भी माया की यादें बची हैं तो उन्हे माया माँगती है, गीले मन के बहाने।

ये माँगे माया के अकेलेपन और कवि मन की पैदाइश हैं और जरुरी नहीं कि अगर माया महेन्द्र से साक्षात मिले तो भी वह ऐसा ही महसूस करे या मांगे। कल्पना वास्तविकता से अलग न हो उसे कल्पना ही क्यों कहा जाये?

एक सौ सोलह चाँद की रातें / एक तुम्हारे काँधे का तिल / गीली मेंहदी की खुशबु / झूठ मूठ के शिकवे कुछ / झूठ मूठ के वादे भी सब याद करा दूँ / सब भिजवा दो / मेरा वो सामान लौटा दो।

माया-महेन्द्र के प्रेम सम्बंध में नजदीकी से उत्पन्न कितनी ही यादें माया के साथ विचरती हैं जो माया को गुदगुदाती होंगी, और कभी खुशी तो कभी गम दे जाती होंगीं। कुछ ऐसी बातें होंगी जो माया और महेन्द्र प्रेम के नितांत नजदीकी क्षणों में पसंद करते होंगे और ऐसे ही क्षणों में की गयी बातें और हरकतें क्या वापिस की जा सकती हैं? माया इन्ही असंभव संभावनाओं को माँग रही है। प्रेमी प्रेम पत्र तो लौटा सकते हैं पर उन प्रेम पत्रों ने उन पर जो असर छोड़ा था उसे वे कैसे लौटायेंगे?

नजदीकी के क्षणों में प्रेमी एक ही साथ वयस्क भी हो जाते हैं और उसी समय वे बालमन भी रखते हैं। वे जानते हैं कि सब गिले शिकवे झूठे हैं पर तब भी इस अभिनय में रस लेते हैं।

भावावेश में किये वादों की असलियत वे वादे करते समय भी जानते हैं पर तब भी वे ऐसे वादे करते हैं जिन्हे वे कभी भी पूरा नहीं कर पायेंगे। वे जानते हैं यह सब पर तब भी करते हैं। प्रेममयी क्षणों में भावनाओं के वशीभूत किये गये वादे आदर्श स्थितियों में कहीं गयी आकाशीय बातें होती हैं जिनका धरती के वास्तविक धरातल की सच्चाई से कम ही वास्ता होता है। और प्रेम के क्षण बीत जाने पर उन वादों का कम ही मतलब बचता है। माया उन्ही क्षणों, और ऐसे ही समय किये खिलवाड़ के अहसासों को महेन्द्र को याद रही हैं और उन्हे अहसास दिला रही हैं कि जब ऐसे किसी भी अहसास को वापिस नहीं कर सकते तो उन भौतिक महत्व की चीजों को वापिस करने का क्या मतलब है?

और जिस दिन महेन्द्र ऐसे अहसास भी लौटाने में कामयाब हो जायेंगे उस दिन के लिये माया माँग रही हैं कि यदि उनसे भी ऐसी ही अपेक्षा रखी गयी कि वे भी उन अहसासों को दफना दें तो उन्हे इजाज़त मिलनी चाहिये कि उन प्रेम भरे अहसासों के विलोपीकरण के साथ वे खुद भी विलीन हो जायें।

माया तो महेन्द्र को नहीं माँग रही हैं अपने लिये वे तो उस प्रेम का सम्मान रखने की बात कर रही हैं जो उनके और महेन्द्र के मध्य पनपा था और जिसने अविस्मरणीय तरीके से विस्तार और गहराई पायी थी।

…[राकेश]

15 Responsesto “एक सौ सोलह चाँद की रातें : खुद चाँद भी नहीं लौटा पायेगा”

  1. Pavan Jha says:

    4 Mahina was a Joke… Infact first time I met Gulzar saab many years back, it was my first ever question to him.. Rather wanted to have that dimaag ka fitoor, mathematical assessment of four months (minus four Amavasya’s =116) to get acknowledged (even knowing there is not exact ref to 4 months of stay together)..
    but he, as he is, laughed on this interpretation and then told me.. I know Ginati (counting) only upto 116.

    The formula caught up on the net when people copied pasted a lot of discussions from gulzarfans forum..

  2. Rakesh says:

    पवन,
    क्या वाकई आपने शुरुआत की थी इस चार महीने चार अमावस्या के सिद्धांत की?

    ये तो वही मिसाल हो गयी कि

    “जिसे ढ़ूँढ़ा गली गली
    वह घर के पिछवाड़े मिली” :)

    गुलज़ार साब ज्यादा मज़ाक के मूड में नहीं होंगे जब आपने उनके सामने यह हिसाब रखा होगा वरना वे जरुर कहते कि चार महीनों में दो महीने तो ३१ दिन वाले होते हैं तो उस लिहाज से चार महीने मतलब = १२२ दिन और तब एक सौ सोलह का गणित नहीं बैठता।
    और अगर उन चार महीनों में फरवरी भी शामिल हो तो? :)

    चलिये इस एक मज़ाक से एक बात तो फिर से सिद्ध हो गयी कि भारत में अफवाह फैलाना सबसे सरल काम है।

    किसी ने आपकी साइट से बात को बिना पूरा समझे ऐसे ही उठाकर बिना संदर्भ को जाने कहीं और चस्पा कर दिया और वहाँ से किसी और ने किसी और जगह बात को बढ़ा दिया होगा। आपके चुटकले वाली बात तो वे समझ नहीं पाये होंगे। पूरा लेख और संदर्भ पढ़ा ही नहीं होगा उन्होने और एक मजाकिया किस्से को अफसाना बना दिया। सिनेमा के ऐसे स्वयंभू धुरंधरों की कमी तो है नहीं जो तोते की तरह कहीं से सुनी सुनायी दोहराते रहते हैं।

    अच्छा मोड़ दे दिया आपने सारे मामले को लोगों की आँखें बंद करके कापी पेस्ट करने की आदत के इस खुलासे से :)

  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति…
    जन्माष्टमी पर्व के शुभ अवसर पर हार्दिक शुभकामनाये…
    आज आपकी एक लाइना चिट्ठी चर्चा समयचक्र पर
    जय श्रीकृष्ण

  4. Rakesh says:

    महेन्द्र जी,
    धन्यवाद!
    आपको भी जन्माष्टमी के शुभ अवसर पर ढ़ेर सारी शुभकामनायें

  5. Pavan Jha says:

    बिल्कुल राकेश…
    मुझे आज भी याद है कि हंसे थे वो इस थ्योरी पर..
    बोले ये तो फिर भी ठीक है, मगर एक सज्जन उनसे पूछ बैठे कि ये कान्धे क़ातिल कैसे हो सकते हैं .. वो सुन रहे थे “एक सो सोलह चाँद की रातें, एक तुम्हारे कान्धे क़ातिल″

    वैसे उनसे उसके बाद पूछा कि सर इसका मतलब तो बता दें.. तो बोले खुद ही बूझो.. “The beauty lies in the eyes of the beholder so as the interpretation”.. वो दिन और आज का दिन, आजतक उनसे फिर किसी गीत का मतलब पूछने की हिम्मत नहीं हुई.. हाँ कभी कभी संगीत के शोर में किसी गीत में कोई शब्द पकड़ में नहीं आता है तो शब्द ज़रूर पूछ लेता हूं!

    मैनें उसके बाद 8-9 साल पहले एक इन्तेर्प्रेटेशन डाला था.. वो शयर करता हूं अभी!

  6. rafat alam says:

    भाई साब .जन्माष्टमी शुभ आपको और सारे देश को.एक सौ सोलह चाँद की रातें. दिमाग उलझ गया जी.चलो यही कहा जाये जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे कवि.मेरे जेसे किसी से तंग आकर ही ग़ालिब साब ने कहा होगा .गर नहीं मेरे अशआर में मानी ना सही .

  7. Rakesh says:

    पवन,
    एक तुम्हारे कान्धे क़ातिल!…

    जितनी हँसी इस जुमले ने उत्पन्न की है आज किसी और बात से उत्पन्न होनी मुश्किल है।

    इसने मुसीबत भी कर दी है। खाँसी से पीड़ित होने के कारण हँसी और खाँसी की जुगलबंदी ने गले से ऐसे स्वर निकाले हैं जिन्हे ध्वनि विज्ञान को समझने के लिये शोध करना पड़ेगा।

    ये तो बहुत ही शानदार बात बतायी आपने।

    इसी से एक वाक्या याद आ रहा है। ग्रेजुऐशन के प्रथम वर्ष में एक साथी ने किशोर दा का गाना गाया “रात कली एक ख्वाब में आयी”|

    समारोह देर रात समाप्त हुआ। सुबह जब स्नानगृह में जाना हुआ तो एक कक्ष से निकल कर एक बड़ी तेज और खासी बेसुरी आवाज सब तरह फैल रही थी। एक शख्स गा रहे थे
    ” रात कली एक ख्वाब में आयी और गले का आहार हुयी ”
    उन्होने जीवन में पहली बार पिछली रात के समारोह में ही यह गीत सुना था, खाने के बेहद शौकीन होने के कारण उन्हे “हार” का “आहार” सुनायी दिया और उनके पेट से नियंत्रित मन ने इसे ऐसा ही मान लिया :)

  8. Vinay says:

    Rakesh:

    I asked him the question here:
    http://www.rediff.co.in/chat/gulzcha.htm (search for ‘ek sau solah’)

    Strangely his responses have been removed from the transcript on the site. I found it elsewhere though. Here’s what he said:
    ===
    Gulzar (Sat Jul 17 1999 3:54 IST)
    Vinay: It’s not the number which is important, it’s important that somebody
    kept the count of the moonlit nights of which they spent together.
    ===

    Curious days were those.

  9. Rakesh says:

    पवन,
    आपकी हिम्मत रही होगी उस समय, गुलज़ार साब की सौम्य मगर धीर-गम्भीर उपस्थिति के सामने उनकी किसी रचना का अर्थ पूछने के लिये बड़ा साहस चाहिये और पास बैठकर उनकी विशिष्ट आवाज सुनने के बाद तो यह और भी कठिन है। मतलब ऐसा सोचने में तो बहुत कठिन लगता है। :)
    ये सब लिखते समय किसी अनसमझे कारण से सहसा उनकी “किनारा” बहुत याद आने लगी है।

  10. Rakesh says:

    वाह आलम साहब,

    [ .गर नहीं मेरे अशआर में मानी ना सही ]

    यही शेर तो एकदम मौजूं बैठता है।

    बहुत बहुत धन्यवाद आपका
    आपको भी जन्माष्टमी की बहुत सारी शुभकामनायें

  11. Rakesh says:

    Vinay,

    [It’s not the number which is important, it’s important that somebody
    kept the count of the moonlit nights of which they spent together.]

    Thanks a lot.

    Yes these are the words which justify the existence of that line.

    Jai ho Gulzar Saab!

    and Thanks again

  12. Pavan Jha says:

    Vinay,

    The entire transcript is available here.. (though Rediff seems to have removed it, but not gulzaronline)

    http://gulzaronline.com/gulzarchat.htm

  13. Rakesh says:

    Found this link where Gulzar Saab talks about an interesting point that as per record he has written 116 songs for Pancham.

    “In one of Pancham’s most beloved songs, Mera kuch saamaan tumhare paas pada hai in the movie Ijaazat, I had written ek sau solah chaand ki raatein, ek tumhaare kaandhe ka til.
    “When these two anthologists Vishwas Nerurkar and Biswanath Chatterjee got together to prepare this anthology Qatrah Qatrah for Sangeet Kala Kendra, they realised that exactly 116 of my songs were set to music by Pancham. I unconsciously wrote about it in the song,” the lyricist recalled.

    Indian classical literature incidentally lists 116 phases of the moon.

    http://www.hindustantimes.com/Ijaazat-song-was-prophetic-for-RD-Burman–and-me-Gulzar/Article1-282745.aspx

  14. Jahanpanah says:

    अब जब गुलज़ार स़ाब खुद ही कई प्रेरणास्रोत बता रहे हैं और कई स्पष्टीकरण दे रहे हैं, तो मामला और जटिल हो जाता है.
    उपर्युक्त लिंक (अगर वह सही वाकया है तो) सबसे फिट बैठता है. मैं गुलज़ार स़ाब जैसे कवि हृदय व्यक्ति से यह उम्मीद नहीं करता कि वे एक एक गाने का हिस़ाब रखेंगे और उसे किसी और गाने में पेश करेंगे. यह जानकार प्रसन्नता हुई कि हिस़ाब किसी और ने रखा है. गुलज़ार स़ाब के मस्तिष्क के किसी कोने में ११६ संख्या रही होगी और उसे उन्होंने प्रयोग कर लिया. हो सकता है कि शायद इसीलिए वे उसे अकस्मात् यूँ ही ज़ेहन में उत्पन्न संख्या मानते हों.

    खैर, मुख्य विषय से इतर, काँधे क़ातिल और होस्टल का वाकया मज़ेदार रहा.

  15. Rakesh says:

    जहाँपनाह,

    एक सौ सोलह संख्या तो रेंडमली ली गयी संख्या है और माया की ओर से कोई भी संख्या गुलज़ार साब कहलवा/लिखवा सकते थे। इस बात की पूरी पूरी संभावना है कि चाँद की एक सौ सोलह कलायें होती हैं इस बात को कभी गुलज़ार साब ने पढ़ा होगा और इस गीत के समय वह संख्या ही उनकी रचनात्मक चेतना को सूझ गयी। चेतन रुप से जरुर उन्हे उस समय याद नहीं रही होगी ये चाँद की कलाओं वाली बात।
    पंचम द्वारा उनके एक सौ सोलह गानों को अपनी धुनों से सजाने वाली बात तो एक संयोग मात्र है।
    निस्संदेह गुलज़ार साब के पास तो इतना समय और ऐसा रुख मौजूद हो नहीं सकता कि वे इन आँकड़ो में ऊर्जा लगा सकें।

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