मुसाफ़िर (1957) : एक सफ़र की शुरुआत

मुसाफ़िर (1957) : एक सफ़र की शुरुआत

सुधांशु याद कर रहे हैं ह्रषिकेश मुखर्जी की निर्देशक के रुप मे बनायी गयी प्रथम फिल्म मुसाफ़िर को जो सन 1957 में प्रदर्शित हुयी थी।

हृषिकेश मुख़र्जी भारतीय फिल्म जगत के एक चमकते हुए सितारे रहे हैं, इसमें दो राय नहीं हो सकतीं। वास्तव में यह एक जीर्ण कथन ही है जिसे मैं यहाँ पर दोहरा रहा हूँ।

सन् 1957 से मुसाफ़िर फ़िल्म से निर्देशन के सफ़र की शुरुआत करने वाले हृषिदा ने इस सफ़र के दौरान कई बेहतरीन फिल्में दीं जो कि हिंदी फ़िल्मों के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुई हैं। भिन्न-भिन्न विषयों और फ़िल्मी शैली के साथ ही साथ उनकी फ़िल्मों में गाम्भीर्यता और हास्य का अद्दभुत मिश्रण होता था।

मुसाफ़िर भी इन गुणों से अछूती नहीं है। यह प्रयोगात्मक फ़िल्म अपनी अनूठे कथानक और विचित्र शैली के कारण विशेष रूप से उल्लेखनीय है। हृषिदा की पहली फ़िल्म होने के अतिरिक्त इस फ़िल्म की अन्य विशेषताएं भी हैं जैसे कि इसकी पटकथा को लिखने में माने हुए फ़िल्मकार ऋत्विक घटक ने भी अपना योगदान दिया और इसमें दिलीप कुमार ने किसी भी पार्श्व-गायक की सहायता न लेते हुये लता मंगेशकर के साथ एक गीत खुद ही गाया।

मुसाफ़िर फ़िल्म की कहानी तीन कड़ियों में पूरी होती है। इन तीनों कड़ियों में भूमिका निभाने वाले किरदार अलग-अलग हैं। ये किरदार वस्तुतः एक मकान के किरायेदार हैं जो कि अपने जीवन की जटिलताओं और परेशानियों से जूझते हुए इस मकान में रहने आते हैं। उस मकान में रहते हुए उनके जीवन में क्या परिवर्तन आते हैं, यही फ़िल्म की कहानी है।

फिल्म की प्रथम कड़ी में एक प्रेमी-युगल के अपने अपने परिवार की अनुमति के बगैर अपने आप विवाह करने के उपरान्त उनके परिवार द्वारा उन्हे अपनाए जाने की कहानी है।

दूसरी कड़ी में आर्थिक संकट से जूझते एक परिवार की संघर्ष गाथा दिखायी गयी है जो परिवार के पुरुष सद्स्य को नौकरी मिलने के साथ समाप्त होती है।

तीसरी कड़ी में एक महिला के अपने पूर्व प्रेम को पाने और पुनः खोने की कहानी है।

फ़िल्म की प्रथम कड़ी साधारण है, पात्रों के आपसी संबंध भी स्पष्ट हैं परन्तु बाकी दो कड़ियों की कथा क्रमशः परिपक्व होती जाती है तथा पात्र, उनके परस्पर संबंध और परिस्थितियाँ भी जटिल होती जाती हैं। अंतिम कड़ी को छोड़कर पहली और दूसरी कड़ी का अंत भी सुखद है।

तीनों कथाओं तथा उनके पात्र अलग-अलग होने के बावजूद फ़िल्म को एक सूत्र में पिरोते हैं, फ़िल्म के कुछ विशेष तत्त्व जैसे कि फ़िल्म के अप्रधान पात्र, पात्रों से जुडी़ वस्तुएँ और परिस्थितियाँ. तीनों ही कहानियों में महिला पात्र क्रमशः शकुंतला (सुचित्रा सेन) , भाभीजी (निरूपा रॉय), और उमा (उषा किरन) मकान के प्रवेश की प्रथम रात्रि में खिड़की के पास खड़ी होती हैं और अपने दुः‌खों को पुरुष पात्रों क्रमश: अजय (शेखर), भानु (किशोर कुमार) और सुरेश (पॉल महेंद्र) से कहती हैं। इससे दर्शकों को पात्रों की तत्कालीन स्थिति तथा उनकी समस्याओं का ज्ञान होता है. इसके अतिरिक्त मकान के मालिक महादेव (डेविड), मकान के पड़ोस में रहने वाली महिला और उसकी बेटी, वायलिन बजाने वाला राजा बाबू , चाय देने वाला एक किशोर और एक पोस्टमैन तीनों ही कहानियों में उपस्थित रहते हैं।

फ़िल्म में मकान का किरदार अहम् है। यह मकान महज एक निर्जीव वस्तु न होकर एक दृष्टा के रूप में उपस्थित है जिसके समक्ष सभी घटनाएँ घटित होती हैं। यह मकान ही तीनों कड़ियों को जोड़ने वाला सबसे बड़ा सूत्र है।

हृषिदा ने फ़िल्म के प्रारम्भ में ही मकान की स्थिति और उसके आस-पास के क्षेत्र की प्रकृति और स्थितियाँ सुनिश्चित कर दी हैं। वहाँ आस-पास मिलावटी चीज़ें मिलती हैं ये भी उन्होंने प्रथम भाग में ही दर्शा दिया है अतः जब इसी मिलावट के कारण दूसरे भाग में जहर पीने के बावजूद भानु की जान बच जाती है क्योंकि जहर तक मिलावटी है, तो कुछ भी अप्रत्याशित नहीं लगता।

एक निर्देशक के रूप में हृषिदा ने अपनी छाप जगह-जगह छोड़ी है। वे कहीं-कहीं दर्शकों को विस्मित भी करते हैं जैसे कि पहली दो कहानियों में नेपथ्य में रहने वाला राजा बाबू (दिलीप कुमार) तीसरी कहानी में सामने आ जाता है और एक अहम् किरदार बन जाता है।

शकुंतला का मकान के सामने पौधा लगाना और मकान मालिक का हर बार ‘TO LET ‘ के बोर्ड को चित और पट करना एक सामान्य सी ही बात लगती है लेकिन ये दोनों बातें फ़िल्म के अंत में महत्त्वपूर्ण हो जाती हैं।

फ़िल्म के आखिर में हृषिदा ने दोनों ही चीज़ों का उपयोग जीवन और मृत्यु के लिए प्रतीकात्मक रूप में किया है। जहाँ नव-प्रभात में एक कली के स्फुटित होने के साथ एक बच्चा – राजा (डेज़ी ईरानी), नवजीवन पाता है वहीं एक दूसरे राजा की आत्मा ने उसका शरीर रुपी मकान छोड़ दिया है, शायद एक नया शरीर धारण करने के लिए, और पास ही ‘TO LET ‘ का बोर्ड अपने स्थान से टूटा हुआ गिरा पड़ा है।

इस फ़िल्म में दिलीप कुमार का किरदार कुछ हद तक उनकी देवदास फ़िल्म से मेल खाता है जिसकी वजह यह हो सकती है कि बिमल रॉय की देवदास फ़िल्म में बतौर सहायक निर्देशक काम करने के पश्चात हृषिदा को दिलीप साब के लिए राजा बाबू की भूमिका ही उपयुक्त लगी होगी। एक प्रश्न यह भी है कि क्या इस फ़िल्म की विषयवस्तु और उसका प्रस्तुतीकरण उस समय पूरी तरह से नवीन था? इस बारे में थोड़ा संदेह ही है और मैं अपने साधारण फ़िल्मी ज्ञान के आधार पर कुछ कह भी नहीं सकता परन्तु इतना तो ज़रूर है कि भारतीय फिल्मों के सन्दर्भ में हृषिदा का यह प्रयास अद्वितीय तथा सराहनीय था।

(सुधांशु)

6 Responsesto “मुसाफ़िर (1957) : एक सफ़र की शुरुआत”

  1. Anwar Husain says:

    It was Dilip Kumar who was instrumental in convicing Hrishikesh Mukherji to become a director. HKM told him if he acts in the film he will direct. When DK heard the story he told him nobody will understand this and will be flopped but he agreed.

  2. Rakesh says:

    मुसाफिर ह्रषिदा का बहुत अच्छा प्रयास था। कथानक और इसके प्रस्तुतीकरण दोनों में गुणवत्ता थी। और इसका महत्व इसलिये भी बढ़ जाता है कि यह उनकी पहली ही फिल्म थी एक निर्देशक के तौर पर।
    दिलीप कुमार, सुचित्रा सेन, किशोर कुमार, डेविड, नाज़िर हुसैन, आदि का बेहतरीन अभिनय, सलिल चौधरी का मधुर संगीत, कमल बोस की सिनेमेटोग्राफी, ऋत्विक घटक की कहानी और राजेंद्र सिंह बेदी के संवाद आदि बहुत सारे आकर्षण इस फिल्म में मौजूद हैं।
    दिलीप कुमार की पहले दो भागों में वायलिन की धुन के सहारे उपस्थिति और तीसरे भाग में एक पात्र के रुप मे उपस्थिति बहुत आकर्षक तत्व है फिल्म का।
    एक मकान को एक स्थिर पात्र बनाकर उसके इर्द गिर्द चलित पात्रों की अलग अलग ज़िंदगियाँ तीन अलग अलग कालखण्डों के माध्यम से एक रोचक तानाबाना बुनती हैं। बीजारोपण, अंकुरण और फूल का खिलना बड़े अच्छे रुपक हैं फिल्म में।
    जैसा कि अनवर जी ने बताया दिलीप साब ने बिमल रॉय के उस समय के सहायक निर्देशक और सम्पादक ह्रषिकेश मुखर्जी को प्रेरित किया था निर्देशक बनने के लिये।

  3. Sudhanshu says:

    अनवर हुसैन और राकेश साहब धन्यवाद. आपने सही कहा, ये दिलीप साहब की ही प्रेरणा थी कि हृषिदा फिल्म निर्देशन के क्षेत्र में आये.

  4. rafat alam says:

    फिल्म मुसाफ़िर देखी नहीं है .पर हर बार की तरह आज भी CINE manthan पर मेरी जानकारी में इजाफा हुवा है जिसमें दिलीप साब द्वारा इस फिल्म में गीत गाया जाना ओर हृषिदा की यह पहली फिल्म है मेरे लिए नए जानकारी है.सुदांशु जी ने संशिप्त स्थान लेकर पूरी फिल्म की कहानी समझाई जो सराहनीय है.

  5. Sudhanshu says:

    आलम साहब प्रशंसा और उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद. :)

  6. Uday says:

    वाह क्या बात है …..

  7. [...] हैं। ह्रषिकेश मुकर्जी की पहली फिल्म, ’मुसाफिर’, और राजिंदर सिंह बेदी की ’दस्तक’ की [...]

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