अभिनेत्रियाँ तो स्मिता पाटिल से पहले भी बहुत आयीं और बाद में भी पर भारतीय सिनेमा में सबसे ज्यादा कमी किसी अभिनेत्री की खलती है तो वह स्मिता पाटिल ही हैं।
नवम्बर 1985 में हिन्दी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री कृष्ण बिहारी ने भारतीय सिनेमा की अदभुत अभिनेत्री स्मिता पाटिल से गैंगटोक में हुयी अपनी मुलाकातों के आधार पर यह संस्मरण लिखा था। श्री कृष्ण बिहारी जी कहते हैं कि इस संस्मरण को लिखते समय मुझे कहाँ मालूम था कि ठीक एक साल बाद विलक्षण स्मिता समूचे भारत को स्तब्ध छोड़कर इस दुनिया से चली जायेंगी और उनका जाना भारतीय सिनेमा को गरीब कर जायेगा।
गैंगटोक के स्टार सिनेमा की तरफ जाने वाली सड़क पर हरी स्टोर के सामने खड़ा मैं राज बब्बर से बातें कर रहा था। हम दोनों को घेरे हुये भीड़ अचरज भरी निगाहों से हमें देख रही थी। हमारी बातचीत के दौरान ही एक लड़की भीड़ में से अपनी जगह बनाती हुयी राज बब्बर के पास आकर चुपचाप खड़ी हो गयी। हमारी बात समाप्त होते ही उसने राज बब्बर से कुछ कहा तो उसकी दंतपंक्त्ति ने मेरा ध्यान बरबस खींच लिया…
और मैंने पूछा,: आप स्मिता पाटिल?”
हाँ… एक संक्षिप्त जवाब उसने दिया।
सिनेमा के परदे पर दिखायी देने वाली अभिनेत्री स्मिता पाटिल और बगैर मेकअप के आँखों के सामने खड़ी स्मिता पाटिल में बहुत फर्क दिखता है। परदे से बाहर की स्मिता सामान्य सी लगने वाली लड़की है जिसकी तरफ अपने आप ध्यान नहीं जाता। गहरा सांवला रंग, खामोश चेहरा और सामान्य पहनावा। कहीं से भी कुछ विशिष्ट नहीं दिखता। यही कारण था कि राज बब्बर से बातें करने के दौरान जितनी देर भी वह जब तक वहाँ खड़ी रही मैं उसे तुरंत पहचान नहीं पाया जबकि मैंने उसकी सभी फिल्में देख रखी हैं।
राज बब्बर ने स्मिता से मेरा परिचय कराया और फिर तो लगभग एक सप्ताह तक हम तीनों बराबर मिलते रहे और उन हफ़्तों में स्मिता के बारे में जितना जान सका, वह यह कि -
स्मिता कम बोलती है … स्मिता खूब बोलती है और जब नहीं बोलती है तो उसकी आँखें बोलती हैं। उसके होठ थरथराते हैं तो सामने वाले में एक कश्मकश के हालत पैदा कर देते हैं। बहरहाल, स्मिता जब बोलती है तब भी और जब नहीं बोलती तब भी, दोनों हालात में प्रखर बुद्धिजीवी होने का अहसास बखूबी करा देती है और वह अहसास जबरदस्ती से उत्पन्न कराया हुआ नहीं होता बल्कि यह खुद मानना पड़ता है कि स्मिता तीव्र बुद्धि की स्वामिनी है और समय के साथ है। सामान्य लड़कियों की भाँति उसे साड़ियों एवम लिपिस्टिक की चर्चा के साथ किसी की निंदा करते रहने और फालतू के दिखावटी रुप को ढ़ोते रहने में कोई रुचि नहीं है। कला और साहित्य के साथ साथ देश की राजनीति में क्या परिवर्तन हो रहे हैं और इन परिवर्तनों के साथ औरतों का भविष्य किस हद तह जुड़ा है, इन सब बातों के प्रति वह पूरी तरह से जागरुक दिखायी देती है।
फिल्मी दुनिया में स्मिता की बोल्डनेस को लेकर चर्चायें हैं। सामान्य दर्शकों में सेक्स की वह तलाश जो उनमें स्मिता के नाम से उभरती है, स्मिता के बारे में जो अफवाहें हैं, उसकी फिल्मों के बारे में फिल्मी पत्रकारों की जो आलोचनायें हैं – इन सबके संबंध में जब मैंने उससे बातें की तो उसने बगैर हिचकिचाहट के, जो कुछ बताया वह उसी रुप में पाठकों के सामने प्रस्तुत है -कृष्ण बिहारी – फिल्मी दुनिया में जगह बनाने के लिये क्या आपको नहीं लगता कि आपने अंग प्रदर्शन का अत्याधिक सहारा लिया?
स्मिता पाटिल – अंग प्रदर्शन से आप क्या समझते हैं? अगर अंग प्रदर्शन से ही जगह मिलती है तो सैंकड़ों लड़कियाँ अपने आपको पूरी तरह एक्सपोज़ करने के लिये बम्बई के चक्कर लगा रही हैं… उन सबको फिल्मी दुनिया में जगह क्यों नहीं मिल जाती? स्मिता के चेहरे पर तनाव स्पष्ट था।
कृष्ण बिहारी – आपका कहना ठीक हो सकता है फिर भी आक्रोश और चक्र में तो यही लगता है कि संभोग और नहाने के दृष्यों ने ही फिल्म को चर्चा का विषय बना दिया।
स्मिता पाटिल – आक्रोश में लगभग एक मिनट का वो दृष्य था जिसकी बहुत गलत ढ़ंग से पब्लिसिटी हुयी। जहाँ तक सीन की बात है वह कहानी की डिमांड थी। इंटेलेक्चुअल क्लास शब्दों की भाषा समझ सकता है लेकिन आक्रोश की कहानी का मेरा चरित्र जिस वर्ग का था उसके लोग केवल ’फिजीकल’ होने को ही सही अर्थों में समझ पाते हैं। उस वर्ग के मर्द अपनी औरतों के साथ जितना कड़ा व्यवहार करते हैं वह उन औरतों को तनिक भी कड़ा नहीं लगता जबकि वैसा व्यवहार प्रबुद्ध वर्ग में टकराव और बिखराव उत्पन्न कर सकता है। वह वर्ग शरीर की माँग को बिना बनावटी हुये जीना ही जीवन के तनावों को दूर करने का रास्ता समझता है। वही उसका इण्टरटेनमेंट है। चाहे आपस में किसी तरह का झगड़ा क्यों न हुआ हो, कितनी भी नोंच-खसोट हुयी हो फिर भी उस वर्ग का मर्द अपनी आउरत के साथ शारीरिक संबंध अपनी इच्छानुसार करता है। वहाँ औरत की इच्छा का कोई महत्व नहीं है। आदिवासी कबीलों की सी हरकत अनपढ़ों के बीच आज भी जिंदा है। आक्रोश में मेरे मर्द का रोल ओम पुरी ने जैसा किया था… उससे उसकी मानसिक पीड़ा का अंदाजा लगाया जा सकता है। उसने अपना तनाव जिस तरह निकाला… उसे परदे पर दिखाना जरुरी था। उसके बिना कहानी में वह बात ही नहीं आ पाती जो डायरेक्टर का उद्देश्य था। … रही बात चक्र की तो वहाँ क्या सेक्स था? नहाने का वह सीन फिल्म में इण्टरवेल के बाद शुरु होता है और तीस सेकेण्ड तक चलता है जब तक दर्शक हॉल में आते हैं सीन खत्म हो जाता है और वैसे दृष्य तो आम जिन्दगी में सड़क चलते रोज दिखायी पड़ते हैं। उन्हे चोरी चोरी राह चलते लोग देखते हैं लेकिन वे दृष्य अश्लील नहीं कहे जाते। दोहरी नैतिकता जीने वाले अकेले में जिन घटनाओं को देखते रहना चाहते हैं, सार्वजनिक रुप से उन्ही की निंदा करते हैं… और रही फिल्म की बात तो यदि केवल एक-एक मिनट के दृष्य के लिये मेरी ये फिल्में चलीं तो इस तरह सत्यम शिवम सुन्दरम को सिनेमाघरों से उतरना ही नहीं चाहिये था उसमें तो जीनत को…।
स्मिता साँस लेने के लिये रुकी तो यह प्रकरण भी रुका।
कृष्ण बिहारी – अभी तक आपने ऐसी कोई फिल्म नहीं दी जो आपको उतना चर्चित बना दे जितना रेखा को उमराव जान ने बना दिया।
स्मिता पाटिल – हाँ अब तक ऐसी फिल्म नहीं आयी लेकिन मेरी सभी फिल्में चर्चा का विषय रही हैं। निशांत, मंथन ने भी मुझे प्रतिष्ठा दी है और ’सुबह’ में जो रोल मेरा है, निश्चित ही मैं दावे से कह सकती हूँ कि जब तक मैं किसी खास मुकाम पर नहीं पहुंचती, वह मेरी सर्वश्रेष्ठ फिल्म कही जायेगी। उसमें मेरा ही प्रधान चरित्र है जिसके इर्द गिर्द कहानी घूमती है और यह प्रमाणित करती है कि औरत के अस्तित्व को नकारना अब इतना आसान नहीं रहा। वह स्वतंत्र निर्णय ले सकती है।
कृष्ण बिहारी – औरत का शोषण तो अब भी हर जगह हो रहा है। खास तौर से फिल्मी दुनिया में तो तथाकथित पढ़ी लिखी लड़कियों के साथ भी आये दिन वह सब कुछ होता रहता है…।
स्मिता पाटिल – देखिये… आपकी बात इसलिये सही है कि औरत बुद्धु होती हैं…(हँसी के बीच) यह इसलिये कि वे दिमाग के बजाय दिल से फैसले करती हैं। दिल के फैसले में फायदा-नुकसान का ध्यान नहीं रहता….फिल्मी दुनिया में काम पाने के लिये आयी बहुत सी लड़कियों के साथ वह सब कुछ होता है जो नहीं होना चाहिये… एक बात बता दूँ … फिल्मी दुनिया में उसी के लिये जगह है जिसमें प्रतिभा है वरना कोई लड़की चाहे अपनी इज्जत तक दाँव पर लगाती फिरे… एकाध फिल्मों में काम तो पा सकती है लेकिन अपनी जगह नहीं बना सकती। यहाँ काम की तलाश में घर छोड़कर आने वाली लड़कियों को यह बात अच्छी तरह जानकर आना चाहिये कि उनमें कितनी प्रतिभा है…और… एक बात और कि यदि किसी लड़की में प्रतिभा है और उसे जगह बनाने के लिये किसी तरह का समझौता करना पड़ रहा है तो इसमें कोई बुराई नहीं है।
कृष्ण बिहारी – इसका मतलब आप किसी भी तरह के समझौते को जायज समझती हैं… यह तो एक्स्प्लायटेशन हुआ।
स्मिता पाटिल – देखिये यह आपके हालात पर निर्भर है कि आपका कितना शोषण हो रहा है। यदि आज कोई चाहे कि मेरा शोषण कराये संभव नहीं लेकिन कल को मेरे हालात बुरे हो जायें तो मेरे साथ कुछ भी हो सकता है…।
कृष्ण बिहारी – राजनीति के प्रति आपका दृष्टिकोण?
स्मिता पाटिल – मेरा परिवार राजनीति से जुड़ा रहा। फिलहाल अभी तो मैं सामाजिक कार्यों में रुचि ले रही हूँ… इसके लिये कई सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से सुधारवादी कार्य हुये जा रहे हैं… आगे राजनीति में जाऊँगी या नहीं , यह हालात पर निर्भर करता है।
कृष्ण बिहारी – स्मिता के बारे में फैली उन अफवाहों के बारे में स्मिता को खुद क्या कहना है?
स्मिता पाटिल – (मुक्त्त हँसी के साथ) कुछ तो आपका नजरिया होगा … आप अपनी तरफ से ही मेरे बारे में लिखिये कि मैं कैसी लगती हूँ… खुद क्या कहूँ?
सचमुच खुद अपने बारे में कुछ कहना अपना बचाव करना होता है और स्मिता ने वैसा नहीं किया। जहाँ तक स्मिता के घमंडी और अव्यवहारिक होने की बात कही जाती है, वह मुझे कहीं से भी नजर नहीं आयी। 
इन हफ्तों के साथ के दौरान मुझे कहीं से भी यह अहसास स्मिता ने नहीं होने दिया कि वह एक प्रसिद्ध और सम्मान प्राप्त नायिका है, बल्कि हमेशा यह लगा कि परिचितों के साथ वह अपना बड़्प्पन बांटकर उनके बराबर हो जाती है और उसे करीब से देखने तथा उसकी सफल फिल्मों में उसके द्वारा निभाये किरदारों को गहराई से महसूसने के बाद यह नहीं लगता कि फिल्मी दुनिया ने उसे काम देकर कोई अहसान किया है! सच्चाई तो यह है कि उसे पाकर सिने जगत गौरान्वित हुआ है।
….
13 दिसम्बर 1986 को स्मिता पाटिल की असमय मृत्यु के बाद उनकी याद में इस लम्बी कविता का जन्म हुआ था जो उन जैसी महान अभिनेत्री और एक बहुत अच्छी इंसान को मेरी तरफ से श्रद्धांजलि अर्पित करने की चेष्टा भी थी।
तुम्हारे बाद स्मिता …
स्मिता !
कैसी मजबूरी है
कि आज जब मैं यह लिख रहा हूँ
तुम सो गयी हो।
तुम्हारा शरीर सो चुका है
तुम सिर्फ शरीर रह गई हो…
दुनिया में इस वक्त्त जिसे लोग
लाश कहते होंगे।
तुम्हारे आस-पास जमघट होगा
जिससे तुम्हे नफरत थी।
फिर भी बिना प्रतिवाद के बगैर किसी खीज के
आज तुम जमघट के
चारों तरफ मुस्कुराती हुई पूछ रही होगी
कि मुझसे कोई शिकायत तो नहीं रही…
कोई भी…कभी भी…या फिर अब…?काश !
मेरे स्वर, मेरे शब्द ताकतवर होते और
मेरा शोर तुम्हे जगा पाता
नींद से !
तुम्हारी मौत एक हादसा है मेरे लिये
अखबार में छपी
इस ख़बर पर आँखें फाड़े, दिल थामे
यकीन करना होगा…जबरन !
क्योंकि हादसे
सच्चाई के सिवा और कुछ नहीं होते
और सच पर जल्दी यकीन नहीं होता।हर किसी की आँख के
खुलने और बंद होने का
दुनिया की गतिविधि पर
कुदरत की धड़कन पर
कोई फर्क नहीं पड़ता
लेकिन कुछ पलकों पर नींद का छा जाना
पल भर के लिये ही सही
दुनिया को वजनी बना जाता है
धरती की गति हो जाती है मद्धम।
शायद… इसीलिये कभी-कभी दिन हो जाते हैं बड़े !
लोग कहते हैं कि यह वक्त्त भारी होता है
ऐसे दिन आसानी से नहीं कटते।
तुम्हारी मौत की ख़बर ने
सुबह से मेरा दिन बढ़ा दिया है।लगता है … जल्दी मुरझाने वाले खुश्बूदार फूलों की तरह
तुममें भी धैर्य नहीं था
या फिर … एक-एक सीढ़ी चढ़कर
ऊपर पहुँचने में ही
सारा धीरज चुक गया।
तुम जिस जगह पहुँची थी…
वहाँ से हर ऊँचाई साफ नज़र आती थी।
कुछ देर ठहरना था उस ऊँचाई पर
दुनिया की हकीकत
ऐसी जगहों से ही पकड़ में आती है
जहाँ से दृष्टि निर्बाध
हर तरफ जाती है।स्मिता !
इस बढ़े दिन को मैं
तुम्हारे नाम करता हूँ…
सिर्फ तुम्हारे नाम
और सोचना चाहता हूँ सिर्फ तुम्हारे बारे में।पलों के साथ ने
किस कदर तुम्हारे करीब कर दिया है मुझे
यह पास आना भी कितना कष्टदायक है
सारा जीवन निरर्थकता को जीते हुये लोग
पास आने की कोशिश में कितना दूर हो जाते हैं!
और-
कभी -कभी कुछ पल…कुछ घड़ियाँ
दूरस्थ लोगों को कितना करीब कर जाती हैं।याद है वह शाम…वह रात…
वह बादलों से ढ़की दोपहर
और भीगता मौसम…बातें…बातें…और बातें
मित्र और मैं…और तुम…और तुम्हारा मित्र राज बब्बर
सब कुछ याद है मुझे
क्योंकि अब इस याद को ही तो मेरे साथ रहना है…
जिस्म का क्या है
उसे तो धुआं – धुआं होना है
चटक – चटक जलना है।
{कृष्ण बिहारी}
© Krishna Bihari
[...] This post was mentioned on Twitter by Rakesh, Cinemanthan. Cinemanthan said: स्मिता पाटिल दोहरी नैतिकता के मुखौटे के पीछे छिपने की मोहताज नहीं थीं -श्रद्धांजलि http://www.cinemanthan.info/index.php/2010/12/smitapatil/ [...]
महोदय ,स्मिता जी मेरी पसंदीदा अदाकारा थीं मेरी क्या यथार्थवादी सिनेमा के सभी चाहने वालों की भी शायद .उनका असमयिक निधन सभी को हिला गया था .आज यह पोस्ट पढकर फिर आँख नम है .ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे .