chalo Dilli : इंडिया भारत भ्रमण पर

chalo Dilli : इंडिया भारत भ्रमण पर

एक समय तक भारत के हरेक विद्यार्थी को सामान्य ज्ञान की परीक्षाओं में भारत के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े दो प्रश्न काफी परेशान करते थे (शायद अभी भी करते हों)। सवाल थे -

दिल्ली चलो का नारा किसने दिया था।

करो या मरो का नारा किसने दिया था।

अगर किसी ने पढ़ा हुआ न हो और वह नारों की प्रकृत्ति से अनुमान लगा कर उत्तर देना चाहे तो बहुत से लोग पहले नारे को महात्मा गाँधी, और दूसरे को नेताजी सुभाष बोस से जोड़ते थे। पर है बिल्कुल उल्टा। दिल्ली चलो का नारा नेताजी ने दिया था और करो या मरो का नारा गाँधी जी ने।

आजादी के बाद अब दिल्ली दूर नहीं जैसी फिल्म भी बनी और ऐसे नारे भी नेता लोग गाहे-बेगाहे दोहराते रहे हैं। अब जाकर किसी ने दिल्ली चलो नारे की सुध ली है और शब्दों का क्रम बदल कर चलो दिल्ली नामक फिल्म बना दी गयी है।

पर चलो दिल्ली का कोई भी सम्बंध भारत के स्वतंत्रता संग्राम से नहीं है। यह तो एक यात्रा आधारित फिल्म है।

एक यात्रा जो शुरु तो मुम्बई से हवाईजहाज में सवारी करने से होती है और बाद में यात्री, फिल्म के मुख्य पात्र, टैक्सी, ट्रक, ऊँटगाड़ी, ट्रैक्टर, और ट्रेन में सवारी करते हुये त्राहीमाम करते दिल्ली पहुँचते हैं।

मिहिका बनर्जी (लारा दत्ता) 300 करोड़ टर्नओवर वाला व्यापार चलाने वाली आधुनिक महिला हैं जो शादी के पाँच साल बाद भी संतान की जिम्मेदारी संभालने के लिये तैयार नहीं हैं। जब वे दस साल की थीं तभी उन्होने बम्बई से इलाहाबाद तक की यात्रा ट्रेन से की थी। अब वे हमेशा लक्ज़री एयरलाइन्स में सफर किया करती हैं। वे हमेशा फ्रेंच कम्पनी Evian का मिनरल वॉटर पीती हैं। लो केलोरी फूड खाती हैं। समय नष्ट करना उन्हे कतई पसंद नहीं। बातें वे नाप-तौल कर करती हैं। व्यस्त इतनी रहती हैं कि मुस्कुराना तो जैसे भूल ही गयी हैं।

उन्हे मुम्बई से दिल्ली जाना है और ट्रैफिक जाम के कारण उनके हवाईअडडे पर पहुँचने से पहले ही उनकी फ़्लाइट चली जाती है और न चाहते हुये भी मन मारकर उन्हे इकॉनिमिक श्रेणी की उड़ान में सीट लेनी पड़ती है।

उनके सहयात्री हैं, पुरानी दिल्ली के निवासी मनु गुप्ता (विनय पाठक) जिनकी करोलबाग में साड़ियों की दुकान है। मनु हद दर्जे के बातूनी हैं और शक्ल से ही वे लापरवाह लगते हैं। “इसमें कौन सी बड़ी बात हो गयी” उनका जीवन दर्शन है। वे हर पल हँसते ही रहते हैं और उन्हे देखकर ऐसा लगता है कि न तो उनके जीवन में कोई समस्या है और न ही वे कभी गंभीर हुये होंगे।

वे अजनबी से भी इस तरह घुलमिल कर बातें करना शुरु कर देते हैं मानो इन व्यक्तियों से उनका सालों का परिचय हो।

मुम्बई हवाईअडडे पर एक पुस्तक विक्रेता से वे एक फिल्मी पत्रिका के कवर पेज पर छपी सैफ अली खान और करीना कपूर की तस्वीर को देखकर पूछते हैं,”क्या ख्याल है, इनकी शादी हो जायेगी”।
विक्रेता कहता है,” मुझे क्या पता, पत्रिका खरीदोगे?”

“जब पता नहीं तो क्यों खरीदूँ”।

तनाव तो ये महाश्य लेते ही नहीं।

स्थितियाँ ऐसी बनती हैं कि दिल्ली जाने के बजाय मिहिका और मनु जयपुर पहुँच जाते हैं। और वहां से दिल्ली पहुँचने की जद्दोजहद खासे मनोरंजन से भरी हुयी है। मिहिका और मनु एकदम उलट व्यक्त्तित्व के मालिक हैं और यह विरोधाभास एक संतुलन बनाये रखता है और फिल्म को रोचक बनाये रखता है।

मिहिका को मनु की हरेक हरकत से चिढ़ होती है पर वह विवश है उसके साथ बने रहने के लिये। मिहिका इंडिया की सोसायटी के सबसे उच्च तबके का प्रतिनिधित्व करती हैं और मनु भारत के निम्न मध्यवर्गीय समूह से आते हैं। उनमें सभ्यताओं का अंतर लगता है।

मनु पर तो किसी बात का कोई असर नहीं होता पर वे अंजाने में ही मिहिका को जरुर धीरे-धीरे नये रंग में रंगते चले जाते हैं।

जीवन में पहली बार लगभग सड़क पर रात व्यतीत करने वाली मिहिका जीवन में पहली बार खुले आसमान के नीचे खड़े होकर सूर्योदय देखती है और उसके सौंदर्य से अभिभूत हो जाती है।

मनु-मिहिका की साथ साथ की जाने वाली यात्रा की रोचकता की लय पटरी से हटती है कुछ देर के लिये जब मिहिका और मनु को थाने ले जाया जाता है। पर इस अध्याय के समाप्त होते ही फिल्म पुनः रोचकता की ओर बढ़ जाती है।

फिल्म के अंत में मनु के जीवन के कुछ और पहलू दिखायी देते हैं और उनके जीवन की वास्तविकता को जानकर मिहिका जीवन के नये पहलुओं को समझने लगती हैं और जीवन को भरपूर ढ़ंग से जीने की प्रेरणा लेती हैं।

गाँधी जब दक्षिण अफ्रीका से भारत वापिस आये तो गोखले ने उन्हे भारत भ्रमण की सलाह दी थी ताकि राजनीतिक राह पर चलने से पूर्व वे देश को अच्छी तरह से जान लें। एक खास तरह की उच्चवर्गीय जीवन शैली जी रही मिहिका भी अपनी मुम्बई से दिल्ली तक की यात्रा में इंडिया से भारत तक की यात्रा करती हैं। वे पहली बार जान पाती हैं कि इस देश में एक भारत भी है और वहाँ लोग कैसी कैसी बदतर स्थितियों में रहते हैं और तब भी जीते हैं, एक दूसरे की सहायता करते हैं। वे उस तरह से सभ्य नहीं हैं जैसे सबसे धनी वर्ग के लोग लगते हैं पर गरीबी के बावजूद वे जीते हैं, हंसते हैं और जीवन का लुत्फ उठाते हैं।

हॉलीवुड में 1987 में बनी John Hughes की कॉमेडी फिल्म Planes, Trains and Automobiles से प्रेरित चलो दिल्ली मूल अंग्रेजी फिल्म जितनी अच्छी नहीं है पर फिर भी एक मनोरंजक फिल्म है।

विनय पाठक ऐसी भूमिकाओं में आसानी से अपने अभिनय के रंग जमा जाते हैं।

धनी वर्ग की महिला के रुप में लारा दत्ता भी विश्वसनीय काम कर गयी हैं।

संगीत में लैला मैं लैला का रिमिक्स मूल गाने के स्वभाव और उसकी गुणवत्ता के साथ छेड़छाड़ करता ही नज़र आता है।

लारा दत्ता के प्रोड्क्शन हाऊस भीगी बसंती एंटर्टेनमैंट के बैनर तले बनी पहली ही फिल्म है और लारा दत्ता ने आगाज तो औसत से ऊपर का ही किया है। भविष्य में और अच्छे प्रयासों की अपेक्षा की जा सकती है।

दस्विदानिया के बाद निर्देशक शशांत सिंह की यह दूसरी फिल्म है, पर इसमें पहली फिल्म जैसी निरंतरता वे साध नहीं पाये हैं। अगर वे अच्छा संगीत प्रस्तुत करने और फिल्म में रोचकता की निरंतरता साधे रखने में सफलता प्राप्त कर लेते तो फिल्म और अच्छी बन सकती थी।

…[राकेश]

5 Responsesto “chalo Dilli : इंडिया भारत भ्रमण पर”

  1. बेहतरीन समीक्षा की है आपने एक निवेदन है कि पूर्वी उत्तरप्रदेश मेँ तो आम आदमी नई फिल्मेँ पाइरेटेड सीडी/डीवीडी पर ही देखता है इस पाइरेसी को कैसे समाप्त किया जा सकता है इस पर भी आप कुछ लिखेँ, नकली डीवीडी मेँ अच्छी फिल्मोँ को मनमाना काट कर कबाड़ा कर दिया जाता है क्या विकसित देशोँ मेँ भी पायरेसी होती है?

  2. प्लीज ‘शोर इन द सिटि’ पर भी अवश्य लिखिये

  3. प्लीज ‘शोर इन द सिटि’ पर भी अवश्य लिखिये यह भी प्रायोगिक फिल्म है

  4. Rakesh says:

    प्रभाकर जी,
    धन्यवाद,
    ‘शोर इन सिटी’ देखते ही लिखने का प्रयास रहेगा।

  5. Rakesh says:

    विकसित देशों में कानून का पालन सख्ती से होता है अतः हॉलीवुड की फिल्मों की पायरेसी इतनी आसान नहीं है। फिर वहाँ सिनेमा जीवन का ऐसा आवश्यक अंग नहीं है जैसा कि भारत में है। जिन्हे थियेटर में नहीं देखनी उन सिनेमा रसिकों के लिये डीवीडी सही कीमत पर कुछ समय बाद उपलब्ध हो जाती है।
    वैसे भारतीय फिल्मों की पायरेटेड डीवीडी विकसित देशों में धड़ल्ले से भारतीयों द्वारा चलायी जा रही दुकानों पर मिल जाती हैं। और ऐसा उन देशों में भी है जहाँ कुछ हिन्दी फिल्में भारत के साथ साथ ही रिलीज भी होती हैं। वहाँ की पायरेसी रोकने के लिये डीवीडी रिलीज करने वाली कम्पनियों द्वारा एक दीर्घकालीन और उचित किस्म की योजना बनाये जाने की जरुरत है। पुरानी फिल्मों की डीवीडी वे नहीं भेजते बाहर सो उनकी पायरेसी बहुत आसानी से हो जाती है। नयी फिल्मं अगर किन्ही देशों में रिलीज न हो तो वहाँ के लोग इन पायरेटेड डीवीडी को खरीदने में हिचक भी महसूस नहीं करेंगे।

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