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Haat The weekly Bazaar : सामंतवादी छलिया पुरुष समाज में नग्न होती स्त्री शक्त्ति की विजय गाथा

औरत ने जनम दिया मरदों को, मरदों ने उसे बाज़ार दिया जब जी चाहा मसला कुचला, जब जी चाहा धुत्कार दिया तुलती है कही दिनारो में,...

Life Goes on (2010) : याद ना जाये बीते दिनों की

किसी भी परिवार के मुखिया की पत्नी उस घर की धुरी बन जाती है। मुखिया, उसकी संताने सभी लोग उस एक महिला के कारण आपस में जुड़ाव...

धरम(2007) : दिल मंदिर-मस्जिद-गिरजा-गुरद्वारा कुछ भी नहीं

अदब आमोज़ है मयखाने का जर्रा-जर्रा सैंकड़ों तरह से आ जाता है सिजदा करना इश्क पाबंदे वफा है न कि पाबंदे रसूम सर झुकाने को...

कांजीवरम : सिल्क के रेशों के खुरदरेपन से घायल ज़िन्दगी

कवि धूमिल की अंतिम कविता – लोहे का स्वाद- एक तरह से करोड़ों शोषितों की चुप्पी को जुबान देती है। प्रियदर्शन की फिल्म...

दबंग : सलमान का जलवा और हुड़दंग

दबंग को होली जैसे उत्सव, जब लोग सब तरह की मर्यादायें तोड़ कर हुड़दंग मचाने में लग जाते हैं, के माहौल वाली फिल्म कह सकते...

माया(2001) : गलत इरादों के तेजाब से गली एक फिल्म

सिनेमा एक बेहद सशक्त्त माध्यम है और बिल्कुल अनपढ़ किस्म के व्यक्ति भी इस माध्यम के द्वारा संदेश ग्रहण कर सकते हैं और...

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