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	<title>Cine Manthan</title>
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	<description>Churning Cinema - Cinema Ka Manthan</description>
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		<title>लिखा है तेरी आँखों में किसका अफसाना (Teen Deviyan 1965) : किशोर कुमार के अद्भुत दौर की शुरुआत</title>
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		<pubDate>Tue, 15 May 2012 10:46:29 +0000</pubDate>
		<dc:creator>CINE manthan</dc:creator>
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		<description><![CDATA[इस गीत से किशोर कुमार हिन्दी फिल्मों में गायन की अपनी दूसरी एवं आधुनिक पारी के श्रीगणेश का शंखनाद करते हैं&#124; हालांकि किशोर कुमार की गायिकी के आधुनिक काल में प्रवेश की झलक Mr. X in Bombay (1964) के गीत &#8221; मेरे महबूब क़यामत होगी&#8220;, जिसे आनंद बक्शी ने लिखा था और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>इस गीत से <strong>किशोर कुमार</strong> हिन्दी फिल्मों में गायन की अपनी दूसरी एवं आधुनिक पारी के श्रीगणेश का शंखनाद करते हैं| हालांकि <strong>किशोर कुमार</strong> की गायिकी के आधुनिक काल में प्रवेश की झलक <strong>Mr. X in Bombay</strong> (1964) के गीत &#8221; <strong>मेरे महबूब क़यामत होगी</strong>&#8220;, जिसे <strong>आनंद बक्शी</strong> ने लिखा था और <strong>लक्ष्मीकांत प्यारेलाल</strong> ने संगीत से सजाया था, में भी मिलाती है पर उनकी गायिकी के नए दौर में पहुँच जाने के सबसे निश्चित प्रमाण के रूप में <a href="http://www.cinemanthan.info/index.php/2011/09/teendevian/">&#8220;<strong>तीन देवियाँ</strong>&#8220;</a> का यही गीत- <strong>लिखा है तेरी आँखों में</strong>, प्रमुखता से सामने आया प्रतीत होता है|  </p>
<p>साठ के दशक में हिन्दी फिल्मों का संगीत पचास के दशक के संगीत से अलग हो चला था और सभी बड़े गायकों ने भी अपने गाने के तौर तरीकों में मुनासिब बदलाव कर लिए थे|</p>
<p>पचास के दशक में <strong>किशोर कुमार</strong> द्वारा गाये गीत और अंदाज़ में गाये गीत हैं और जहां उनकी आवाज़ और गाने का अंदाज़ दोनों ही अलग किस्म के थे। <strong>सचिन देव बर्मन</strong> के संगीत निर्देशन में ही <strong>किशोर कुमार </strong>को पचास के दशक में इस तरीके के गीत गाने को मिले जिनमें से अगर योडलिंग तत्व को निकाल दिया जाये तो उनके सभी गीत <strong>हेमंत कुमार</strong> भी गा सकते थे पर साठ के दशक में &#8221; <strong>तीन देवियाँ</strong>&#8221; के गीत ऐसा उद्घोष करते हैं कि अब  <strong>किशोर कुमार</strong> के गाने का अंदाज़ इस कदर बदल गया था कि उनके गीतों को उसी अंदाज़ में <strong>हेमंत कुमार</strong> नहीं गा सकते थे। अब <strong>किशोर कुमार</strong> बेहद खुले गले से गायन करने लगे थे, उनका अंदाज़ आधुक दौर में प्रवेश कर गया था| परदे पर आधुनिक और तत्कालीन चरित्रों के लिए उनकी गायन शैली बेहद माफिक बैठने लगी थी|</p>
<p>गायिकी में <strong>लता</strong> अपने स्तर का सर्वश्रेष्ठ मुकाम पचास के दशक में ही हासिल कर चुकी थीं| और पचास और साठ के दशकों के दौर के उनके गायन में हर तरह से उत्कृष्टता दिखाई देती है और उनके गाये हुए अच्छे गीत बेहद आनंद प्रदान करने वाले हैं| पार्श्व गायक के क्षेत्र में <strong>लता</strong> की गायिकी एक तरह से मानक सिद्ध होने लगी थीं| </p>
<p>इस गीत &#8211; &#8221; <strong>लिखा है तेरी आँखों में</strong> &#8221; में <strong>किशोर कुमार </strong>ने स्वर दर स्वर एंड नोट दर नोट लता की गायिकी से अपनी गायिकी मिलाई है अब चाहे वह बोलों को गाने का मसला हो या फिर वातावरण में चारों तरफ &#8221; अरे&#8230;ओ&#8230;ओ&#8230;ओ &#8221; की गूंजती हुयी तान का सुर मिलाने का मसला हो, और इसीलिये <strong>किशोर</strong> की गायिकी इस गीत के द्वारा यह सत्यता बखूबी स्थापित करती है कि एक गायक के तौर पर वे भी अपना सर्वश्रेष्ठ स्तर इस गीत को गाने के दौरान पा चुके थे और बाद में वे इस मुकाम को बरकरार रखने में भरपूर कामयाब रहे और उन्होंने <strong>तीन देवियाँ</strong> के बाद एक से बढकर एक गीत संगीत संसार को दिए|</p>
<p>भले ही <strong>आराधना </strong>के गीत &#8221; <strong>मेरे सपनों की रानी कब आयेगी तू</strong> &#8221; और अन्य गीतों ने उन्हें सुपर स्टार गायक का दर्जा ला दिया हो पर एक गायक के नाते गायिकी में आधुनिकता के नए बदले माहौल वे इनके बराबर या इनसे अधिक गुणवत्ता के गीत कुछ बरस पहले<strong> तीन देवियाँ</strong> में गा चुके थे|  </p>
<p>पार्श्व गायन के क्षेत्र में <strong>किशोर कुमार</strong> की संगीत यात्रा के एक बेहद महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में उभर कर आये इस युगल गीत की फ़िल्म में भी बेहद महत्वपूर्ण उपस्थिति है|</p>
<p>देव (<strong>देव आनंद</strong>) के जीवन में आने वाली सबसे पहली युवती नंदा (<strong>नंदा</strong>) जो उसके जीवन में तब से है जब वह एक बेरोजगार युवक के रूप में बम्बई में उसी लॉज में ठहरा था जहा नंदा पहले से ठहरी हुयी थी|<br />
 देव और नंदा में समय के साथ नजदीकियां बढ़ने लगती हैं पर इसी के साथ साथ देव की पहचान दो अन्य युवतियों, कल्पना (<strong>कल्पना</strong>) और सिमी (<strong>सिमी ग्रेवाल</strong>) से भी हो जाती है और वे दोनों भी देव के बेहद करीब आ जाती हैं| देव तीनों के ही नजदीक है पर उसका ध्यान एक कवि के रूप में अपने को स्थापित करने में ज्यादा है जबकि तीनों ही युवतियां चाहती हैं कि देव उनसे प्रेम-निवेदन करे| </p>
<p>आर्थिक रूप से नंदा ही सबसे कमजोर है और वह यही समझती रही है कि उसी जैसी आर्थिक पृष्ठभूमि वाला देव उसी से प्रेम करता है और उसे ऐसा भी कोई संकेत नहीं मिलता देव से कि उसका ऐसा सोचना गलत है| वह देव के प्रेम निवेदन न करने से परेशान हो जाती है और व्याकुलता में एक पिकनिक पर देव के साथ जाती है यह सोचकर कि वहाँ तो देव उसके प्रति प्रेम का इजहार कर ही देगा|</p>
<p>देव से वह किसी न किसी बहाने से उसके दिल की बात पूछना चाहती है और जब बातचीत में देव अपने दिल की बात नंदा से नहीं कहता तब यह गीत शुरू होता है जिसमें नंदा पूछ रही है कि देव के मन में किसी के प्रति प्रेम है तो सही और यह उसकी आँखों से झलकता है पर वह कौन है जो उसके मन और आँखों में बसी हुयी है|</p>
<blockquote><p><strong>लिखा है तेरी आँखों में किसका अफसाना</strong></p></blockquote>
<p>देव, नंदा की इस बात को इस तरह से मजाक के रूप में बदल देता है जैसे उसके लिए भी यह एक नयी खबर हो और वह भी गाता है कि अगर नंदा को पता चल जाए तो वह उसे भी बता दे|</p>
<blockquote><p><strong>अगर इसे समझ सको मुझे भी समझाना</strong></p></blockquote>
<p>नंदा हार न मानते हुए फिर से देव को सत्य दिखाना चाहती है कि उसके अंदर कुछ है पर दिक्कत यही है कि अंदर किसी के बसे होने का आभास तो मिलता है पर अभी वह भी पूरा पूरा देख नहीं पा रही है| भुट्टा खाते और नज़र बचाते देव को छेड़ते हुए नंदा गाती है </p>
<blockquote><p><strong>जवां बसा किसी तमन्ना का, लिखा तो है अधूरा सा</strong></p></blockquote>
<p>देव फिर से इस नए आक्रमण को भी खुद को ऐसा ही आधा-अधूरा बताते हुए टाल जाता है| </p>
<blockquote><p><strong>कैसे न हो मेरी हर बात अधूरी अभी हूँ आधा दीवाना</strong>
</p></blockquote>
<p>अभी भी इथालाकर चलटी नंदा के दुपट्टे के एक सिरे को अपनी पैंट की जेब में खोंस कर चलने में देव को कोई गुरेज नहीं है और देव की ऐसी ही भरमाने वाली हरकतें देख नंदा का धैर्य कुछ चूकता नज़र आता है और वह बात को सीधे सीधे व्यक्तिगत बनाकर पूछ ही लेती ही कि अगर देव के मन में नंदा के लिए कोई भावनाएँ नहीं हैं तो वह फिर क्यों उसके करीब बना रहता है और क्यों उससे नजदीकियां बनाए रखता है? </p>
<blockquote><p><strong>जो कुछ नहीं तो ये इशारे क्यों ठहर गये मेरे सहारे क्यों</strong></p></blockquote>
<p>ऐसा गाते गाते वह देव को अपने दुपट्टे को पूरी तरह से देव के इर्द-गिर्द लपेट देती है और उसके दुपट्टे में खुशी खुशी लिपटा हुआ देव अभी भी बात को नंदा के साथ विशेष होने से बचाता है और उसके दुपट्टे के पीछे अपने मुख को छिपाते हुए अभी भी मजाक के स्वर में ऐसा करने को अपने व्यक्तित्व का एक साधारण तत्व बताते हुए कहता है कि ऐसा करना उसकी आदत में शुमार है और उसका ऐसा व्यवहार सिर्फ नंदा के ही साथ नहीं है | </p>
<blockquote><p><strong>थोड़ा सा हसीनों का सहारा लेकर चलना है मेरी आदत रोज़ाना<br />
</strong></p></blockquote>
<p>नंदा इससे आगे शायद नहीं बढ़ सकती और अब जब वह पहले से हलके स्वर में एक तरह से अंतिम डाव के रूप में देव से पूछती है कि उसकी आँखों में किसका अफसाना लिखा हुआ है तो देव उससे दूर जाती नंदा का दुपट्टा उसके पास फेंककर वही चुनौती भरा राग अलापता है कि अगर नंदा को पता चले तो वह उसे भी बताए| </p>
<p>पास से दौडकर जाते घोड़े के पीछे नंदा चली जाती है तो अकेला रह गया देव अपने भीतर के भाव को कुछ कुछ बाहर लेकर आता है और पहली बार गीत में अपने आप ही सक्रियता दिखाता है| </p>
<p>उसके अंदर से हल्की सी उदासी लिए भाव उमड़ते हैं इस बात की गवाही देते हुए कि उसके अंतर्मन में भी इस प्रेम वाले मसाले को लेकर मंथन चलता रहता है| पर बहुत शीघ्र ही वह संभल जाता है और अपने दिल को आवारा की तरह से इधर उधर भटकने वाला बता कर वह तुरंत ही उसे निर्दोष रूप से बेचारा दर्शाता है|</p>
<blockquote><p><strong>यहाँ वहाँ फिज़ां में आवारा अभी तलक ये दिल है बेचारा</strong></p></blockquote>
<p>इस पंक्ति के बाद <strong>किशोर कुमार</strong> ने अरे &#8230; ओ &#8230;ओ &#8230;ओ की जो गूंजती हुयी तान साधी है वह उनके उस समय तक सारे गायन की सर्वश्रेष्ठ और हर लिहाज से अद्भुत गायिकी का उदाहरण है| इस तान को बेहद सधा हुआ सुरीला गला ही गा सकता है और यही घोषणा कर देता है कि एक परिपक्व और उच्चतम श्रेणी के गायक के रूप में <strong>किशोर कुमार</strong> का आगमन हो चुका है|   </p>
<p>नंदा भविष्य के किसी और क्षण पर बात को टालते हुए बात को संभालती है यह कह कर कि उसके इस यहाँ वहाँ विचरण करते दिल को समझना बहुत मुश्किल है वह तो बस उसे जानती है और पहचानती है|</p>
<blockquote><p><strong>दिल को तेरे हम खाक न समझे तुझी को हमने पहचाना</strong>
</p></blockquote>
<p><strong>सचिन देब बर्मन</strong> ने जैसा वाद्य यंत्रों के सयोजन का प्रयोग इस गीत में किया है वह काबिलेतारीफ है| विभिन्न वाद्य यंत्र और विशेष रूप से ढोलक, तबला और ड्रम परिवार के सदस्य जब- तब और गीत में यहाँ वहाँ बजते हुए एक गजब का उर्जावान संगीतमयी माहौल गीत में जन्मा देते हैं| </p>
<p><strong>सचिन देब बर्मन</strong> &#8220;<strong>तीन देवियाँ</strong>&#8221; के संगीत के साथ न केवल अपने संगीत को बल्कि हिन्दी फिल्म संगीत को पचास के दशक के संगीत संसार से अलग ले जाकर एक नए युग में प्रवेश करा देते हैं|  </p>
<p><strong>मजरूह सुल्तानपुरी</strong> ने फ़िल्म की सिचुएशन पर एकदम फबने वाला गीत लिखा है|</p>
<p>इस गीत और तीन देवियाँ के अन्य गीतों के फिल्मीकरण को देखकर एक बात स्पष्ट होती है कि <strong>देव आनंद</strong> के <strong>नवकेतन</strong> की गीतों के फिल्मीकरण के मामले में गुणवत्ता का एक स्तर और तरीकों के बारे में सिद्धांत तय हो चला था और उन्ही बातों का पालन करते हुए गानो का फिल्मीकरण किया जाता था अब चाहे निर्देशक कोई भी हो| इस फ़िल्म के गीत कहीं से भी ऐसा संकेत नहीं देते कि निर्देशक की कुर्सी पर <strong>चेतन </strong>या <strong>विजय आनंद </strong>नहीं बैठे हुए हैं |</p>
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		<title>मेरा जूता है जापानी:बिगड़े दिल शहज़ादों की फक्कड़ ठसक</title>
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		<pubDate>Wed, 02 May 2012 08:28:11 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[“I do not want my house to be walled in on all sides and my windows to be stuffed. I want the cultures of all the lands to be blown about my house as freely as possible. But I refuse to be blown off my feet by any.” Mahatma Gandhi भारत को ब्रितानिया हुकूमत से [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p>“I do not want my house to be walled in on all sides and my windows to be stuffed. I want the cultures of all the lands to be blown about my house as freely as possible. But I refuse to be blown off my feet by any.” <strong>Mahatma Gandhi</strong> </p></blockquote>
<p>भारत को ब्रितानिया हुकूमत से राजनीतिक आजादी मिलने के तकरीबन आठ साल बाद <strong>राज कपूर</strong> की <strong>Shri 420 </strong>प्रदर्शित हुयी थी जो कि उनके निर्देशन में बनने वाली चौथी फ़िल्म थी| भारत का अपना संविधान लागू हुए भी पांच साल हो चुके थे| पहली पांच वर्षीय योजना के भी तीन साल पूरे हो चुके थे और देश में <strong>भाखडा नांगल</strong> और <strong>हीराकुड</strong> जैसे विशालकाय बाँध बनाए जाने के संकल्प पर कार्य चलने लगा था, पांच बड़े स्टील उधोगों की स्थापना का संकल्प ले लिया गया था| निकट भविष्य में देश भर में पांच <strong>आई.आई.टी</strong> खोले जाने की योजना भी ठोस रूप लेने लगी थी| <strong>यूजीसी</strong> का प्रारूप सामने आने लगा था| देश के सामने स्वप्न थे देश को आत्मनिर्भर, आधुनिक, एवं खुशहाल बनाने के| </p>
<p><strong>गांधी </strong>नहीं रहे थे और उनके पूर्ण स्वराज, ग्राम स्वराज और पूर्णतः स्वदेशी जैसे सपने भले ही पृष्ठभूमि में चले गए हों पर देश ने आत्मनिर्भर होने का सपना तो नहीं छोड़ा था| फिर <strong>शैलेन्द्र</strong> ने <strong>राज कपूर </strong>की इस बड़े फलक वाली समाजवादी स्वर वाली फ़िल्म के लिए यह क्या लिख दिया &#8211;   </p>
<blockquote><p>
मेरा जूता है जापानी,<br />
ये पतलून इंगलिस्तानी<br />
सर पे लाल टोपी रूसी,<br />
फिर भी दिल है हिंदुस्तानी
</p></blockquote>
<p>जबकि भारतीय जज्बा यही था कि सब कुछ स्वदेश में ही निर्मित हो और भारतीय लोग भारत में बने सामान को इस्तेमाल करने में फख्र महसूस करें तब जापानी जूते, अंगरेजी पतलून और रूसी टोपी आयात करके स्वाभिमान की रक्षा कैसे हो सकती थी?</p>
<p>क्या यह एक साधारण सा गीत है जिसे राज कपूर, <strong>चार्ली चैप्लिन</strong> सरीखे मस्ती भरे अंदाज़ में परदे पर प्रस्तुत करते हैं? या कि <strong>शैलेन्द्र </strong>और <strong>राज कपूर</strong> इस गीत के माध्यम से कुछ कहना चाहते थे उस समय के भारत से?</p>
<p>यह गीत फ़िल्म की शुरुआत होने के एकदम बाद ही परदे पर आ जाता है| एक लंबी सड़क पर चल रहे थकान से भरे हुए राज (<strong>राज कपूर</strong>) को कोई भी वाहन लिफ्ट नहीं देता और तब वह चालाकी से सेठ सोनाचंद धरमचंद (<strong>नीमो</strong>) की कार के सामने गिर पड़ता है और सेठ के आदेशानुसार कार में लाया जाता है पर हकीकत बयान करने पर राज को कार से बाहर कर दिया जाता है|</p>
<p>यह भूला नहीं जा सकता और न ही फ़िल्म यह बात भूलने ही देती है कि यह <strong>राज कपूर</strong> की फ़िल्म है जिनकी फ़िल्म में हर बात बामकसद ही मौजूद रह सकती है| हर दृश्य की कुछ सार्थकता है, पूरे कथानक से कुछ महत्वपूर्ण जुड़ाव है| बल्कि फ़िल्म के दृश्य आगे आने वाले दृश्यों के लिए उर्वरा भूमि तैयार करते रहते हैं और एक श्रंखला की महत्वपूर्ण कड़ियाँ बनते चले जाते हैं| </p>
<p>फ़िल्म में आगे ऐसा दिखाया भी जाता है कि सेठ सोनाचंद धरमचंद चुनाव लड़ रहा है  और चुनावी सभा को संबोधित कर रहा है और उसकी सभा के सामने ही राज भी दन्त मंजन बेचने के लिए मजमा लगाए खड़ा है|<br />
सेठ सोनाचंद धरमचंद बड़े फख्र से अपनी पोशाक का जिक्र करता है और कहता है सर से पाँव तक वह खादी के वस्त्र धारण किये हुए है और वह पूर्णतः स्वदेशी की बात छेडता है| दूसरी और राज जनता को अपनी लगभग फटेहाल वेशभूषा का परिचय गीत के मुखड़े के रूप में ही देता है| </p>
<blockquote><p>
मेरा जूता है जापानी,<br />
ये पतलून इंगलिस्तानी<br />
सर पे लाल टोपी रूसी,<br />
फिर भी दिल है हिंदुस्तानी
</p></blockquote>
<p>क्या <strong>शैलेन्द</strong> और <strong>राज कपूर</strong> ने सत्ता की तरफ लपकने वाले सदैव स्वहित की बात करने वाले अवसरवादी लोगों की तरफ इशारा किया जो अंगरेजी कला में तो खादी से नफ़रत करते थे अपर जब भारतीय राज की पुनर्स्थापना हुयी तो देश और जनता का मूड भांप कर वे खादी की बात करने लगे| खादी ने जो सम्मान हासिल किया था संघर्ष के दशकों में उसने उसे राजनेताओं के लिए एक सम्मानीय वेशभूषा बना दिया था और राजनीति में आने वालों के लिए एक तरह से सुरक्षित कवच का काम करने लगी थी| </p>
<p>बेहद अमीर सेठ सोनाचंद धरमचंद भी नेता बनने के लिए जनता में खादी की साख को भुनाना चाहता है, जबकि खादी की आड़ में वह जमाखोरी, काला बाजारी और तमाम तरह के काले धंधों में लिप्त रहता है| </p>
<p>गरीब बेरोजगार राज के लिए खाने पहनने का संकट है और फ़िल्म क्या यह बताने की कोशिश करती है कि वह पूर्णतः स्वदेशी की शुद्धतावादी प्रकृति, अगर वह मंहगी पड़ती है, पर निर्भर नहीं हो सकता?</p>
<p>या कि जापानी जूते, इंगलिस्तानी पतलून, और रूसी टोपी के रूपक के माध्यम से कुछ और सन्देश फ़िल्म देती है| </p>
<p>एक दशक पहले <strong>हिरोशिमा-नागासाकी</strong> की बर्बरता झेल कर अपनी कर्मठता और जुझारूपन के बलबूते जापानी लोग अपने देश को तरक्की की राह पर अग्रसर कर रहे थे और इस तथ्य को मद्देनज़र रखते हुए जूतों को, जिन्हें पहनकर मनुष्य कहीं से कहीं पहुँच जाता है, जापानी पहचान देना एक आकर्षक प्रयोग हो सकता था उस काल में | </p>
<p>गर्म जलवायु वाले और मिजाज से शांत देश भारत में रहने वाले लोग अधिकतर ढीले &#8211; ढाले वस्त्र ही पहनते रहे थे और यही स्वाभाविक भी था, पतलून पहनने वाले अंग्रेजों ने भारत पर लगभग दो सौ साल तक अपना राजीनतिक-सैन्य और आर्थिक कब्जा बनाए रखा| क्या इसी तथ्य को ध्यान में रखकर इंग्लिस्तानी पतलून की बात की गयी? </p>
<p>पचास के दशक से पहले ही भारत का रुझान समाजवाद की और था और साम्यवादी रूस से अच्छे तालुक्कात देश के बने हुए थे| भारत में भी साम्यवाद के लाल झंडे को फहराने की कोशिशे राजनीतिक स्वतंत्रता के बाद भी बंद नहीं हुयी थीं| फ़िल्म के लेखक <strong>ख्वाजा अहमद अब्बास</strong> घोषित रूप से साम्यवादी थे और <strong>शैलेन्द्र</strong> भी <strong>इप्टा </strong>के सक्रिय सदस्य थे और यह स्वाभाविक था उन दोनों के लिए कि वे अपने विचारों के सामाजिक और राजनीतिक रुझानों को अपने रचनात्मक कर्मों में ढालने की कोशिश करते|</p>
<p>या कि गीत का मुखडा शुरुआत में उद्घृत <strong>महात्मा गांधी </strong>की कही बात के सन्देश को प्रचारित करने की कोशिश करता है कि भारत किसी भी देश की अच्छी बातों को स्वीकार करने और अपनाने के लिए तैयार था और बाहर से बहुत कुछ अपनाने के बावजूद भी दिल हिन्दुस्तानी ही था! </p>
<p>हो सकता है कि <strong>ख्वाजा अहमद अब्बास</strong>, <strong>शैलेन्द्र</strong> और <strong>राज कपूर</strong> के दिमाग में ऐसी सभी संभावनाएं रही हों| </p>
<p>बहरहाल मुखड़े के उपरान्त अंतरों में गीत अपने अलग रंग में आ जाता है </p>
<blockquote><p>
निकल पड़े हैं खुली सड़क पर<br />
अपना सीना ताने<br />
मंज़िल कहाँ,<br />
कहाँ रुकना है<br />
ऊपर वाला जाने<br />
बढ़ते जायें हम सैलानी,<br />
जैसे एक दरिया तूफ़ानी<br />
सर पे लाल टोपी रूसी,<br />
फिर भी दिल है हिंदुस्तानी</p>
<p>ऊपर नीचे नीचे ऊपर<br />
लहर चले जीवन की<br />
नादाँ हैं जो बैठ किनारे<br />
पूछें राह वतन की<br />
चलना जीवन की कहानी,<br />
रुकना मौत की निशानी<br />
सर पे लाल टोपी रूसी,<br />
फिर भी दिल है हिंदुस्तानी</p>
</blockquote>
<p>गीत के उपरोक्त्त दोनों अंतरे जीवन में दर्शन के प्रभाव से भी बहुत प्रभावित दिखाई देते हैं| जीवन में उतारा-चढ़ाव् तो आयेंगे ही पर उनसे घबराकर रुक जाने से न केवल जीवन में प्रगति की राह बाधित हो सकती है बल्कि जीवन ही रुक सकता है| कहीं किसी खास मंजिल पर पहुँचने के लिए चलना तो शुरू करना ही पड़ता है| </p>
<p>अंतिम अंतरे में गीत एक तरह से व्यक्तिवादी हो जाता है| गीत अब भी एक तरह के बहुत सारे व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व करता है| </p>
<blockquote><p>
होंगे राजे राजकुँवर<br />
हम बिगड़े दिल शहज़ादे<br />
हम सिंहासन पर जा बैठे<br />
जब जब करें इरादे<br />
सूरत है जानी पहचानी,<br />
दुनिया वालों को हैरानी<br />
सर पे लाल टोपी रूसी,<br />
फिर भी दिल है हिंदुस्तानी</p></blockquote>
<p>अंतिम मुखडा लोकतंत्र की वकालत करता है और एक साधारण व्यक्ति के भी शीर्ष स्थान पर जा पहुँचने की संभावना की बात करता है| यह विरासत में धन- और सुख सुविधा पाकर सत्ता पर काबिज व्यक्तियों के विरुद्ध आम जन की शक्ति की बात करता है| यह साधारण व्यक्ति की ठसक है, यह स्वाभिमानी व्यक्ति का फक्कड़पन है, चाहे तो सिंहासन धुल कर दे या धुल की माफिक समझ ले और चाहे तो सताधारियों को सत्ताच्यूत करके सुशासन की स्थापना करने के लिए जनता का शासन ले आये|</p>
<p><strong>मुकेश</strong> ने गीत को इस सरल तरीके से गाया है कि गीत आसानी से श्रोता के अंदर प्रवेश कर जाता है| पर बोलों के लेखन के स्तर पर यह उतना साधारण और एक परत वाला गीत नहीं है बल्कि शैलेन्द्र गीत को गहराई वाली बातें और प्रभाव दे गए हैं|</p>
<p>गीत ने <strong>राजकपूर</strong> की पिछली फ़िल्म &#8211; <strong>आवारा</strong> के &#8221; आवारा हूँ &#8221; गीत की तर्ज पर ही अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्धि हासिल की| </p>
<p><iframe width="420" height="315" src="http://www.youtube.com/embed/5wjGc1zGWBc" frameborder="0" allowfullscreen></iframe></p>
<p>&#8230;[राकेश]</p>
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		<title>Kahaani (2012): कुछ पेंच</title>
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		<pubDate>Fri, 20 Apr 2012 19:43:29 +0000</pubDate>
		<dc:creator>CINE manthan</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<p>निर्देशक <strong><strong>सुजॉय घोष</strong></strong> की नयी फ़िल्म &#8216;<strong>कहानी</strong>&#8216; दर्शक की उत्सुकता को अंत तक बाँध कर रखने वाली थ्रिलर है| भले ही <strong>विद्या बालन</strong> के दृश्य से फ़िल्म शुरू न होती हो पर यह फ़िल्म शुरू से अंत तक उन्ही के बेहद मजबूत अभिनय प्रदर्शन के कारण ही अपनी सार्थकता पाती है| किसी और से ज्यादा यह <strong>विद्या बालन</strong> की फ़िल्म इस मायने में भी है कि फ़िल्म के अन्य विभागों को ज्यों का त्यों स्वीकार करने में किन्तु-परन्तु के संदेह से भरे भाव बीच में आ सकते हैं लेकिन <strong>विद्या बालन</strong> के अभिनय प्रदर्शन ने ऐसी कोई गुंजाइश छोड़ी ही नहीं है कि उसमें कहीं कोई कुछ छोटा-मोटा सा भी नुक्स निकाला जा सके| कमी हो सकती है उनके इर्द-गिर्द बुने गए दृश्य में पर उस दृश्य में भी उन्होंने पूरी तन्मयता के साथ अपनी भागीदारी की है| </p>
<p>अभिनेत्री <strong>विद्या बालन</strong> ने परदे पर अपने चरित्र विद्या बागची की आशा-निराशा, उसका संघर्ष, गायब हो चुके पति से मिलने की उसकी अनवरत खोज, उसका क्रोध, उसका रुदन, उसकी हंसी, उसका बदला, और उसकी रहस्यात्मकता आदि सभी कुछ को, इतने विश्वसनीय ढंग से प्रस्तुत किया है कि कुछ अविश्वस्नीय तत्वों के बावजूद फ़िल्म विश्वसनीय लगती हुयी आगे बढ़ती जाती है, और उनके चरित्र के भावों के साथ दर्शक &#8220;कहानी&#8221; के बहाव के साथ बहने में रोचकता पाने लगता है|</p>
<p>&#8216;<strong>कहानी</strong>&#8216; फ़िल्म शुरू होती है एक लेबोरेट्री में चूहों पर किसी विषैली गैस के प्रभाव की जांच करते किसी आदमी से जिसने अपने बचाव के लिए गैस-मास्क पहना हुआ है, अतः दर्शक केवल उसकी आँखें ही देख पाते हैं और चूंकि यह फिल्म का पहला ही दृश्य है सो जाहिर है कि साधारण दर्शक तो अलग, फ़िल्म विशेषज्ञ भी इस बात का भान नहीं ले पायेंगे कि इस व्यक्ति को ढंग से पहचाने जाने की जरुरत है| अगले ही क्षण कलकत्ता की मेट्रो रेल में एक आतंकवादी जहरीली गैस से सौ से ज्यादा लोगों की जान ले लेता है| </p>
<p>आतंक की इस त्रासद घटना के दो साल बाद एक गर्भवती स्त्री विद्या बागची (<strong>Vidya Balan</strong>) लन्दन से कलकत्ता आती है अपने खोये हुए पति को तलाशने| लगभग सात-आठ महीने की गर्भवती स्त्री जब विदेश से कलकत्ता आकर अपने खोये हुए पति की तलाश में दिन-रात एक करती है तो न केवल उसके संपर्क में आने वाले चरित्र बल्कि दर्शकगण भी उसके साथ सहानुभूति रखते हुए उसके साथ हो लेते हैं और यही फ़िल्म की दर्शकों को अपने साथ ले चलने की विधि भी है|   </p>
<p>पति को तलाश रही विद्या की यात्रा ही &#8216;कहानी&#8217; फ़िल्म की कहानी है और उसकी इसी यात्रा गति के साथ दर्शक को यात्रा करनी है और इसके पड़ावों के साथ रुकना है| विद्या की खोज जैसे जैसे आगे बढ़ती है दर्शक को बताया जाता है कि विद्या के पति की शक्ल एक अन्य व्यक्ति, मिलन दामजी, से मिलती है पर उस व्यक्ति के इर्द-गिर्द रहस्य के इतने बादल छाए हुए हैं और आगे भी छाते चले जाते हैं क्योंकि जिस-जिस से भी विद्या इस सन्दर्भ में मिलती है उसकी ह्त्या होती चली जाती है| हैरान-परेशान विद्या को दो संभावनाएं लगती हैं &#8211; या तो उसका पति और मिलन दामजी एक ही व्यक्ति के दो रूप हैं या फिर मिलन ने उसके पति के हमशकल होने का लाभ उठा कर उसे या तो कैद कर रखा है या मार दिया है| </p>
<p>इन सवालों का जवाब पाने के लिए विद्या का मिलन से मिलना बहुत जरूरी है, पर उसकी खोज के बीच में आ खड़ा होती है भारत की खुफिया एजेंसी आई.बी.| अक्खड़ और गुस्सैल आई. बी. अधिकारी खान (Nawazuddin Siddiqui) विद्या की जांच के बीच में आ खड़ा होता है| उसे भी मेट्रो में हुये आतंकवादी हमले के जिम्मेदार आतंकवादी की तलाश है| विद्या भी खान को चुनौती देती है कि उसके लाख विरोध के बावजूद वह अपने पति को खोज कर रहेगी|</p>
<p>विद्या का पति कौन था/है?<br />
उसका संदिग्ध आतंकवादी मिलन दामजी से क्या लेना देना है?<br />
क्या विद्या का पति जीवित है और अगर है तो क्या विद्या उससे मिलकर उसकी आँखों में आँखे डालकर अपने मन में उठा रहे संदेहों के समाधान कर पायेगी?</p>
<p>विद्या अंततः मिलन दामजी को विवश कर देती है कि वह खुद उससे मिलने के लिए उत्सुक हो जाए| वे दोनों मिलते हैं और उनकी भेंट होने के कुछ मिनट तक तो फ़िल्म रोचकता बनाए रखती है पर एक बहुत महत्वपूर्ण घटना होते ही फ़िल्म दम तोड़ जाती है और अंत के दस के लगभग मिनट जिसमे फ्लैशबैक में दिखाए दृश्य भी शामिल हैं, अब तक बीती फ़िल्म के किये कराये पर कमी का मुलम्मा चढ़ा देते हैं|</p>
<p>ऐसा नहीं है कि फ़िल्म एकदम मौलिक है| कहानी, दृश्यों से लेकर ट्रीटमेंट तक ऐसे विषयों और अन्य विषयों पर बनी फिल्मों की याद दिलाते रहेंगे|<br />
विद्या की खोज जहां <strong>Kill Bill </strong>जैसी फिल्मों की याद दिलाएगी वहीं फ़िल्म के सबसे महत्वपूर्ण भाग का ताना बाना <strong>Kiefer Sutherland</strong> की <strong>Angelina Jolie</strong> और <strong>Ethan Hawke </strong>अभिनीत <strong>Taking Lives </strong>से प्रेरित है| जिन्होंने वे फिल्मे देख रखी हैं जिनसे<strong> कहानी </strong>के कुछ भाग मिलते जुलते हैं उन्हें कुछ आभास हो ही जाता है कि आगे क्या होने वाला है पर यह भी सत्य है कि इन सब तथ्यों के साथ भी &#8220;<strong>कहानी</strong>&#8221; एक रोचक फ़िल्म है और पहली बार इस तरह की फ़िल्म देखने वाले के लिए तो यह बेहद तनावयुक्त रोचक दर्शन लेकर आयेगी|</p>
<p>विद्या बालन की तो फ़िल्म यह है ही पर यह देखना बेहद सुखद लगता है कि <strong>Nawazuddin Siddiqui </strong>को अंततः एक बड़ी भूमिका मिली निभाने के लिए| जहां <strong>Black Friday</strong> में उन्होंने स्वाभाविक अभिनय का प्रदर्शन किया था वहीं कहानी में उन्होंने अतिनाटकीयता से भरपूर अभिनय किया है, या कह लीजिए निर्देशक <strong>सुजॉय घोष</strong> ने उनके चरित्र को ऐसे ही रचा| पर उनका चरित्रचित्रण उनके चरित्र को अविश्वस्नीय बना देता है| आई. बी के नंबर दो अधिकारी जैसा चरित्र-चित्रण उन्हें नहीं मिला और उनके तौर तरीके इंस्पेक्टर स्तर के अधिकारी से ज्यादा के कतई नहीं लगते| ऐसा प्रतीत होता है कि निर्देशक या लेखक ने उनके चरित्र के बहाने अपनी कोई निजी राय उत्तर भारत से आने वाले केन्द्रीय अधिकारी के चरित्र पर थोप डाली है और इसे केन्द्र बनाम क्षेत्रीय रूप दे दिया है जो फ़िल्म को कमजोर बनाता है| अगर यह चरित्र ढंग से रचा जाता तो फ़िल्म को और ज्यादा तनाव, और ज्यादा विश्वसनीयता मिलती|</p>
<p>गिद्ध जैसी दृष्टि और लोमड़ी जैसी चालाक बुद्धि वाला अधिकारी खान, और जिसके पार हर तरह की सुविधा और पावर है, अपने अधिकारी से विद्या की पृष्ठभूमि की पूरी जांच करने का दावा करता है पर उसे यह बात नहीं खटकती कि इतने महीने की गर्भवती विद्या को किस एयरलाइन्स ने लन्दन से कलकत्ता आने दिया? दिल्ली में बैठे बैठे उसे तुरंत खबर मिल जाती है जब विद्या को उसके पति के हमशक्ल इंसान के बारे में बताने वाली महिला की ह्त्या हो जाती है, पर वह विद्या की पूरी प्रष्ठभूमि से अनभिज्ञ है| जितना खुर्राट अधिकारी खान को दिखाना चाहा गया है उनता वह लग नहीं पाता|</p>
<p> न ही विद्या के बारे में ये बातें मिलन दामजी के शातिर दिमाग में पनपती हैं|</p>
<p>आई. बी के उच्च स्तरीय नेतृत्व को जैसा दिखाया गया है वह विश्वसनीयता नहीं ला पाता|</p>
<p>ये फ़िल्म का कमजोर पहलू हैं| <strong>Kill Bill</strong>, और <strong>Taking Lives</strong> जैसे थ्रिलर्स में ऐसे बुनियादी कमजोर तत्व् नहीं मिलते हैं और कहानी की जबरदस्त सफलता के बावजूद इसके कमजोर पहलू यही घोषणा करते हैं कि इस वर्ग की फिल्मों में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आने के लिए भारतीय सिनेमा को अभी बहुत विकास करना बाकी है| </p>
<p>इन्स्पेक्टर सात्यिकी की भूमिका में <strong>Parambrata Chatterjee </strong>सहज और आकर्षक लगे हैं|</p>
<p>विद्या बालन के अलावा सबसे ज्यादा ध्यान खींचते हैं <strong>Saswata Chatterjee </strong>जिन्होंने बॉब विश्वास की भूमिका निभाई है| उनकी मुस्कान और उनकी शैतानियत का संगम एक आकर्षक स्क्रीन प्रेजेंस उत्पन्न करता है|</p>
<p>मिलन दामजी की सशक्त और रहस्यमयी भूमिका ऐसी थी कि एक सशक्त अभिनेता इस भूमिका को यादगार बनाकर फ़िल्म की गुणवत्ता और बढ़ा देता पर Indraneil Sengupta का औसत अभिनय प्रदर्शन इस भूमिका को फ़िल्म की अक बड़ी कमजोरी बना डालता है| </p>
<p>विद्या बालन के चरित्र के कन्धों पर ही फ़िल्म का दारोमदार टिका हुआ है पर उनके चरित्र को परदे पर तनाव देने वालों के चरित्र उतनी कुशलता से नहीं बुने गए हैं कि फ़िल्म जस की तस स्वीकार्य हो जाए| कहानी एक रोचक फ़िल्म है पर इसकी कमियां बाद में यही अहसास देती हैं कि यह और अच्छी हो सकती थी| </p>
<p>…[राकॆश]</p>
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		<title>वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी, वो बचपन, वो जगजीत सिंह: भुलाये नहीं भूल सकता है कोई</title>
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		<pubDate>Mon, 10 Oct 2011 17:30:08 +0000</pubDate>
		<dc:creator>CINE manthan</dc:creator>
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		<description><![CDATA[कई सितारों को मैं जानता हूँ बचपन से कहीं भी जाऊँ मेरे साथ-साथ चलते हैं (बशीर बद्र) बीसवी सदी के सातवें और आठवें दशक में जन्मने वाली पीढ़ियों के भारतीयों के लिये जगजीत सिंह वही सितारे थे जो उनके साथ हमेशा चलता रहा भले ही वे विश्व के किसी भी कोने में क्यों न चले [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><strong>कई सितारों को मैं जानता हूँ बचपन से<br />
कहीं भी जाऊँ मेरे साथ-साथ चलते हैं </strong>(<strong>बशीर बद्र</strong>)</p></blockquote>
<p>बीसवी सदी के सातवें और आठवें दशक में जन्मने वाली पीढ़ियों के भारतीयों के लिये <strong>जगजीत सिंह</strong> वही सितारे थे जो उनके साथ हमेशा चलता रहा भले ही वे विश्व के किसी भी कोने में क्यों न चले गये हों। जो आवाज बचपने से ऊँगली पकड़ कर संगीत की तहजीब देती रही हो वह सहसा चुप हो जाये तो निर्वात उत्पन्न हो जाता है, कानों में शून्यता भर जाती है। <strong>जगजीत सिंह</strong> का जाना घनीभूत पीड़ा के अहसास लेकर आया है। </p>
<p><strong>जगजीत सिंह</strong> एक गायक के रुप में किस गहराई से लोगों के जीवन का अभिन्न अंग रहे हैं, यह उनके देहावसन पर उपजे सामूहिक शोक से स्पष्ट है। अनगिनत लोगों को उनका जाना ऐसा लगा है जैसे किसी बेहद करीबी के जाने से उस रिश्ते की जगह एक रिक्तता आ गयी हो, एक शून्य स्थापित हो गया हो।</p>
<p>इस कथन में कतई अतिश्योक्त्ति नहीं है कि <strong>जगजीत सिंह</strong> न होते तो आठवें दशक में हिन्दी फिल्मों में शुरु हो गये ऊट-पटांग सगीत, जिसे शोर कहना ज्यादा मुनासिब होगा, को सुनने वाली पीढ़ी संगीत के क्षेत्र में अनपढ़ और अज्ञानी ही रह जाती। उनके कान यह जान ही न पाते कि अच्छा संगीत होता क्या है? फिल्मी संगीत से निराश होती जा रही पीढ़ी को <strong>जगजीत सिंह</strong> की मधुर गायिकी ने संगीत से जोड़े रखा और उन्हे संगीत की तहजीब से महरुम होने से बचा लिया। </p>
<p><strong>ग़ालिब</strong>, <strong>सुदर्शन फाकिर</strong>, <strong>बशीर बद्र</strong>, <strong>निदा फाजली</strong>, और <strong>गुलज़ार</strong> आदि श्रेष्ठ शायरों एवम कवियों की लेखनी से निकले शब्दों को वाजिब संगीतरुपी मानी दिये <strong>जगजीत सिंह</strong> की गायिकी ने। उनके द्वारा गायी गयी कृतियों के कारण काव्य की महिमा बनाये रखने में बहुत बड़ी सहायता मिली और श्रोताओं ने गीतों के शब्दों पर ध्यान देना कायम रखा और कुछ ने यह बात <strong>जगजीत सिंह</strong> के गीतों को सुनकर सीखी। एक <strong>गुलज़ार</strong> को छोड़ दें तो पिछले तीस सालों में गाहे बेगाहे ही किसी फिल्मी गीतकार ने गीतों को सार्थक और अच्छे किस्म के बोल प्रदान किये होंगे और धुन की बीट पर तुकबंदी ही ज्यादातर फिल्मी संगीत पर छाई रही है। तुकबंदी के ऐसे भयावह दौर में <strong>जगजीत सिंह</strong> द्वारा किये गये गीतों एवम गज़लों के चुनाव ने अच्छे काव्य को संगीत में ज़िंदा रखने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। उनके द्वारा चुने गये गीतों में उपस्थित काव्य जीवन को समृद्ध बनाता रहा है।</p>
<p>उनके द्वारा गाये और संगीत से संजोये गीतों ने अनगिनत लोगों के जीवन को गहराई से छुआ है। उनकी मखमली गायिकी ने कितने ही दिलों को राहत दी है, उन्हे कठिन दौर में सहारा दिया है। उनके हल्के फुल्के हास्य परिबोध की झलकियों से भरे गीतों ने लोगों को आनंदित किया है। गैर-फिल्मी संगीत में उन्होने एक विशाल फलक का दायरा तय किया है। </p>
<p>गीतों के बोल तो अपना संबंध बनाते ही हैं सुनने वाले के साथ पर अगर उन्ही बोलों को<strong> जगजीत सिंह</strong> जैसे गुणी और सुरीले गायक गायें तो मसला पहली नज़र के प्रेम वाला और उसके बाद चिर-स्थायी संबंध वाला हो जाता है।</p>
<p>गौर करेंगे तो ऐसा पाया जा सकता है कि ऐसा अनिवासी भारतीय ढूँढ़ पाना एक अजूबा होगा जिसका अंतर्मन भीग न गया हो जब-जब या जब कभी भी उसने <strong>जगजीत सिंह</strong> की सोज़ भरी गायिकी में <strong>निदा फाज़ली</strong> का दोहा- </p>
<blockquote><p><strong>मैं रोया परदेश में भीगा माँ का प्यार,<br />
दुख ने दुख से बात की बिन चिट्ठी बिन तार</strong></p></blockquote>
<p>सुना हो। </p>
<p><strong>निदा फाज़ली </strong>के ही दोहे &#8211; </p>
<blockquote><p><strong>छोटा करके देखिये जीवन का विस्तार,<br />
आँखों भर आकाश है बाहों भर संसार</strong></p></blockquote>
<p>को जब वे गाते हैं तो इस बात पर सहज ही विश्वास हो जाता है और यह केवल एक सैद्धांतिक बात ही नहीं रह जाती।</p>
<p>ऐसा श्रोता कहाँ होगा जिसके अंतर्मन के तारों को झंकृत करके उसे बीते जीवन की यादों में ले जाकर उसके मन को भीगा न गया हो. जब भी उसने <strong>वो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी</strong>, सुना हो?</p>
<p>इसी एक गीत को गाकर भी <strong>जगजीत सिंह </strong>अमर हो जाते। </p>
<p><strong>जगजीत सिंह</strong> ने एक से बढ़कर एक गीत संगीत संसार को दिये हैं और दिनों-दिन संगीत के प्रति योगदान के ऊपर लिखा जाये तो भी कम पड़ेगा।</p>
<p>आज जब उनके जाने का अहसास एकदम नया है और चारों तरफ स्तब्धता छायी प्रतीत होती है और शब्द सूझते नहीं है, उनके इस गीत को सुनने से पीड़ा कम हो सकती है। </p>
<p>यह गीत, श्रोता, चाहे वह किसी भी उम्र का क्यों न हो, को उसके जीवन में पीछे ले जाता है और उसकी स्मृतियों के ऊपर जमी पड़ी धूल झाड़ कर उसे स्वच्छ बना देता है और उसके अंदर भावनाओं की सरिता बहा देता है। बचपन में भले ही बड़ों को देखकर बच्चों के मन में जल्दी से बड़ा होने की उत्सुकता और इच्छा जन्मती हो पर एक बार बड़े होने के बाद बचपन जीवन का वह पड़ाव बन जाता है जिसकी ओर मन बार-बार लौटकर जाना/आना चाहता है। </p>
<p>कई मर्तबा पीछे बचपन में लौट जाने की इच्छा इतनी तीव्र होती है कि मानव का मन कुछ भी कीमत चुकाकर बस बचपन में लौट जाना चाहता है। <strong>सुदर्शन फाकिर</strong> ने इसी इच्छा और अहसास को बड़ी खूबसूरती से अपने शब्दों में ढ़ाला है और <strong>जगजीत सिंह</strong> ने शब्दों को भावनाओं की मखमली वेशभूषा पहनाकर प्रस्तुत किया है।</p>
<blockquote><p><strong>ये दौलत भी ले लो<br />
ये शोहरत भी ले लो<br />
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी<br />
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन<br />
वो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी</strong></p></blockquote>
<p>यह गीत अपने वर्णन में चित्रात्मक है, विम्बात्मक है और इसे सुनकर अलग अलग श्रोतागण के मन-मस्तिष्क में अलग-अलग विम्ब उभरते हैं उनकी अपनी स्मृतियों से मेल खाते हुये। यह गीत पूर्णतया कल्पना पर आधारित नहीं है बल्कि यह सुनने वाले की ज़िंदगी के बीत हुये का एक सच्चा हिस्सा बन कर उसका साथी बन जाता है। कहा ही नहीं जाता रहा है बल्कि माना भी जाता रहा है कि हरेक मानव के अंदर ताउम्र एक बच्चा जीवित रहता है और <strong>सुदर्शन फाकिर</strong> और <strong>जगजीत सिंह</strong> का यह संगीतमयी कारनामा प्रत्येक मानव के भीतर बैठे उसी बालमन से अपना संबंध जोड़ता है। अकसर कहा जाता है कि पसंद अपनी अपनी और ख्याल अपना अपना पर यह देखना रुचिकर होगा कि क्या यह उक्त्ति <strong>जगजीत सिह</strong> के इस गीत पर भी लागू हो सकती है? कोई ऐसा भी श्रोता हो सकता है जिसे इस गीत ने प्रभावित न किया हो, जिसे इस गीत ने उसकी बीती ज़िंदगी में लौटने और विचरने के लिये प्रेरित न किया हो?</p>
<blockquote><p><strong>मोहल्ले की सबसे पुरानी निशानी<br />
वो बुढ़िया जिसे बच्चे कहते थे नानी<br />
वो नानी की बातों में परियों का डेरा<br />
वो चेहरे की झुर्रियों में सदियों का फेरा<br />
भुलाये नहीं भूल सकता है कोई<br />
वो छोटी सी रातें<br />
वो लम्बी कहानी</strong></p></blockquote>
<p>गीत, बच्चों को सुनायी जाने वाली कथाओं, परी कथाओं की विरासत को बड़े खूबसूरत अंदाज़ में जीवित करता है और इस विरासत के लगातर खोते जाने के दुख के अहसास को गाढ़ा कर देता है। बुजुर्गियत और बालपन के मध्य एक अटूट रिश्ता हुआ करता था। बुजुर्ग भी जीवन के प्रतियोगी रुप से परे हटकर क्षण में जी सकते थे और बच्चे तो क्षण में ही जीते हैं, उनके लिये वर्तमान ही सब कुछ है। और इसी सामंजस्य के कारण बुजुर्ग और बालक एक साथ देखे जाते थे, पाये जाते थे, बुजुर्ग अपने अनुभव से बच्चों की कल्पना शक्त्ति को बढ़ावा दिया करते थे, उनके लिये नित नई नई कहानियाँ गढ़कर और सुनाकर। वह परम्परा लगभग समाप्त हो गई है। कहीं दूर दराज कोई दिया टिमटिमा रहा हो तो बात अलग है वरना बड़े स्तर पर इस विरासत को संजो नहीं पाये हैं भारतीय। <strong>जगजीत सिंह</strong> और <strong>सुदर्शन फाकिर </strong>मोहल्ले की सबसे बुजुर्ग चेहरे की याद करते हुये इस अनूठी विरासत की समाप्ति का मर्सिया पढ़ते हैं। इसी गीत से इस बात का अहसास होता है कि भारतीयों ने अपने बच्चों के जीवन से कितनी खूबसूरत परम्परा को गायब कर दिया है। इस खजाने का अभाव दरिद्रता का अहसास कराता है।</p>
<blockquote><p><strong>कड़ी धूप में अपने घर से निकलना<br />
वो चिड़िया वो बुलबुल वो तितली पकड़ना<br />
वो गुड़िया की शादी पे<br />
लड़ना झगड़ना<br />
वो झुलों से गिरना<br />
वो गिर के संभलना<br />
वो पीतल के छल्लों के प्यारे से तोहफे<br />
वो टूटी हुयी चूड़ियों की निशानी<br />
वो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी</strong></p></blockquote>
<p>बचपन में किये कृत्यों के विम्ब तमाम उम्र मन-मस्तिष्क से नहीं मिटते। बचपन में सिर्फ किये जा रहे कार्य में ही सारी ऊर्जा लगी रहती है इसलिये उन कार्यों की, उन खेलों की, उन शरारतों की और इन सबमें शामिल साथियों की स्मृतियाँ अमिट बन जाती है। उन्हे लौट कर फिर फिर देखना मानव जीवन का एक अभिन्न अंग होता है। </p>
<blockquote><p><strong>कभी रेत के ऊँचे टीलों पे जाना<br />
घरोंदे बनाना बना के मिटाना<br />
वो मासूम चाहत की तस्वीर अपनी<br />
वो ख्वाबों खिलौनों की जागीर अपनी<br />
ना दुनिया का ग़म था ना रिश्तों का बंधन<br />
बड़ी खूबसूरत थी वो ज़िंदगानी</strong></p></blockquote>
<p>कमोबेश हरेक मानव बचपन में इन सब कृत्यों और खेलों में शामिल रहता है और बचपन के इन विम्बों को बुलाया नहीं जा सकता और कहना फिजूल है कि <strong>सुदर्शन फाकिर</strong> और <strong>जगजीत सिंह</strong> के इस गीत को कभी नहीं भुलाया जा सकता।</p>
<p>ऑडियो संस्करण<br />
<iframe width="420" height="315" src="http://www.youtube.com/embed/ApDhdYfR5wI" frameborder="0" allowfullscreen></iframe></p>
<p>फिल्मी संस्करण जो <strong>महेश भट्ट</strong> की लगभग अज्ञात रह गयी फिल्म <strong>आज</strong> में प्रयुक्त किया गया था।</p>
<p><iframe width="420" height="315" src="http://www.youtube.com/embed/Ra_wL2EwOM0" frameborder="0" allowfullscreen></iframe></p>
<p>और इसी अनूठे गीत को श्रोताओं के सामने प्रस्तुत करते <strong>जगजीत सिंह</strong> </p>
<p><iframe width="420" height="315" src="http://www.youtube.com/embed/v-aQSbqTVaE" frameborder="0" allowfullscreen></iframe></p>
<p><strong>जगजीत सिंह</strong> भले ही देह छोड़ कर चले गये हों पर वे ऐसा इंतजाम कर गये हैं कि उनकी संगीत सम्पदा सदियों तक लोगों को उनके संगीत और उनके नाम से परिचित करवाये रखेगी।</p>
<p>&#8230;[राकेश]</p>
]]></content:encoded>
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		<title>तू कहाँ ये बता इस नशीली रात में [तेरे घर के सामने(1963)]: मधुशाला बसाता एक नशीला रोमांटिक गीत</title>
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		<pubDate>Wed, 28 Sep 2011 08:17:07 +0000</pubDate>
		<dc:creator>CINE manthan</dc:creator>
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		<description><![CDATA[विजय आनंद द्वारा निर्देशित फिल्म- तेरे घर के सामने, के नायक- राकेश (देव आनंद) और नायिका- सुलेखा (नूतन) द्वारा आपस में प्रेम में होने की आपसी समझ विकसित होने के बाद परस्पर प्रेम के शुरुआती दौर में जब नायिका अपनी माता जी (प्रतिमा देवी) के साथ दिल्ली से शिमला चली जाती है तो उसके वियोग [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>विजय आनंद</strong> द्वारा निर्देशित फिल्म- <strong>तेरे घर के सामने</strong>, के नायक- राकेश (<strong>देव आनंद</strong>) और नायिका- सुलेखा (<strong>नूतन</strong>) द्वारा आपस में प्रेम में होने की आपसी समझ विकसित होने के बाद परस्पर प्रेम के शुरुआती दौर में जब नायिका अपनी माता जी (<strong>प्रतिमा देवी</strong>) के साथ दिल्ली से शिमला चली जाती है तो उसके वियोग में नायक से समय काटे नहीं कटता, काम में मन नहीं लगता, और प्रेमिका को देखने, उससे मिलने और बातें करने की चाह इतनी गहन हो जाती है कि वह अपने दोपहिया स्कूटर पर ही सवार होकर दिल्ली से शिमला पहुँच जाता है। पर यह चाह दुख भरी न होकर प्रेम की गहनता की प्रसन्नता से भरी है।</p>
<p>अब शिमला की सर्द शाम में नायक कैसे नायिका को खोजे? शिमला पहुँच जाने से उसे अंदुरनी तौर पर खुशी भी है और उसका प्रेम और उसकी भावनायें दोनों ही उसे आनंदित भी कर रहे हैं। </p>
<p>प्रेमिका से मिल पाने की आस और प्रेमिका के लिये अपने अंदर उमड़ रहे प्रेम में सराबोर उसकी भावनायें मिलकर उसके अंदर ऐसी उथल-पुथल मचाते हैं कि उसके उदगार इस गीत के रुप में उभर आते हैं। गीत में विरह की पुकार तो है पर यह दुख से भरा विरह-गीत नहीं है। यह मूलतः एक प्रेमगीत के रुप में ही सामने आता है बल्कि इसे खुद से ही छेड़छाड़ करने वाला रोमांटिक गीत कहा जा सकता है। नायक की खुद की ही भावनायें उसके सथ अठखेलियाँ कर रही हैं और वह भी इन भावों का आनंद ले रहा है। </p>
<p>संगीतकार &#8211; <strong>एस.डी.बर्मन</strong>, गीतकार &#8211; <strong>हसरत जयपुरी</strong>, गायक &#8211; <strong>मोहम्मद रफी</strong>, अभिनेताओं &#8211; <strong>देव आनंद</strong>, और <strong>नूतन</strong>, निर्देशक &#8211; <strong>विजय आनंद</strong> और सिनेमेटोग्राफर &#8211; <strong>वी रात्रा</strong> के संयुक्त्त प्रयास ने इस गीत को एक सम्पूर्ण गीत बना दिया है। </p>
<p>प्रेमिका की तलाश कर रहे प्रेमी, जो कि अपने प्रेम के कारण और अपने द्वारा प्रेमिका की तलाश करने जैसे कठिन कार्य से खुश भी है, के भावों को जैसा हसरत जयपुरी ने व्यक्त्त किया है उसमें क्या जोड़ा या घटाया जा सकता है? </p>
<p>रफी ने जिस शिद्दत से इस गीत को गाया है उससे बेहतर और कौन गा सकता है? </p>
<p>जिस तरह से एस.डी बर्मन ने इस गीत के लिये संगीत रचा है उसमें क्या हेर-फेर करने की ढृष्ठता कौन कर सकता है?</p>
<p>देव आनंद से बेहतर भी क्या कोई इस गीत को परदे पर प्रस्तुत कर सकता था/है या कर पायेगा? </p>
<p>विजय आनंद और उनके सिनेमेटोग्राफर वी रात्रा से ज्यादा अच्छे ढ़ंग से निर्देशक और सिनेमेटोग्राफर की कोई अन्य जोड़ी इस गीत को दृष्यात्मक बना पायेगी?  </p>
<p>इस गीत में लेखन, संगीत संयोजन, गायन, और फिल्मांकन इस गहराई से आपस में जुड़े हुये हैं कि गीत के किसी एक विभाग को अलग कर के नहीं देखा जा सकता। इस गीत का आनंद इसकी सम्पूर्णता के साथ ही लिया जा सकता है।</p>
<p>गीत न केवल <strong>देव आंनद</strong> के चरित्र &#8211; राकेश की परिस्थितियों बल्कि उसके व्यक्त्तित्व पर ज़ेब देता है बल्कि यह <strong>देव आनंद</strong> के व्यक्तित्व से पूर्णतया मेल खाता गीत है। ऐसा लगता नहीं कि <strong>देव</strong> इस गीत में फिल्म के लिये अभिनय कर रहे हैं।</p>
<p>जैसे ही देव गाते हैं &#8211;    </p>
<blockquote><p><strong>तू कहाँ ये बता इस नशीली रात में</strong></p></blockquote>
<p>कैमरा उनसे दूर खिंचता चला जाता है और उन्हे ऊपर से आती सड़क और दायें मोड़ से नीचे की तरफ जाती सड़क के मुहाने पर खड़ा दिखा कर एक तरफ तो हिल स्टेशन पर होने का अहसास करा जाता है और दूसरी तरफ यह भी दिखा देता है कि प्रेमी नायक वाकई प्रेमिका की तलाश में तीराहे या चौराहे पर खड़ा है, जहाँ से उसे अटकल्पच्चू तय करना है कि किस दिशा में जाये प्रेमिका को खोजने के लिये।</p>
<blockquote><p><strong>तू कहाँ ये बता इस नशीली रात में<br />
माने न मेरा दिल दीवाना</strong></p></blockquote>
<p><strong>रफी</strong> की दिलकश गायिकी माहौल को वाकई एक नशे से भर देती है और ऊपर से <strong>एस.डी बर्मन</strong> ने गीत की रिकार्डिंग कुछ इस अंदाज़ में की है मानो <strong>रफी</strong> की आवाज़ किसी गहरी सुरंग से निकल कर चारों तरफ के स्पेस को अपनी गूँज से भरे दे रही हो। ऐसा असर ठीक भी है गीत में आखिरकार नायक के ह्रदय की गहराइयों से गीत का प्रसारण जगत में हो रहा है। </p>
<blockquote><p><strong>हे बड़ा नटखट है समां<br />
हर नज़ारा है जवां<br />
छा गया चारों तरफ<br />
मेरी आहों का धुआँ<br />
दिल मेरा, मेरी जां न जला<br />
तू कहाँ, तू कहाँ ये बता इस नशीली रात में</strong></p></blockquote>
<p><strong>देव आनंद</strong> अपने अभिनय से दर्शाते हैं कि नायक प्रेम में होने का पूरा पूरा आनंद उठा रहा है और इस अवस्था की छोटी से छोटी भावनाओं के प्रति चेतन लगता है। अपनी इस खुशी में भागीदारी करने के लिये भी उसका नायिका को देखना उससे मिलना जरुरी है। कहीं किसी घर में रोशनी दिखायी देती है तो नायक के अंदर उत्सुकता और आशा जन्म लेती हैं कि हो न हो वहीं उसकी प्रेमिका ठहरी हुयी है। किसी और के बाहर झाँकने पर वह शरारत से मुस्कुरा कर वहाँ से हट लेता है। वहाँ से हटता है तो राह में किसी और घर की रोशनी उसे आमंत्रित करने लगती है पर वहाँ से भी उसे ऋणात्मक उत्तर ही दिखायी देता है।</p>
<p>राह में युवा-युगल को देख नायक अपने चंचल मन के वशीभूत हो मुड़ कर उन्हे देखने के लोभ का संवरण नहीं कर पाता और निस्संदेह इस जोड़े को देखकर उसे प्रेमिका से दूरी का अहसास कुछ ज्यादा ही तीव्रता से सताने लगा होगा। जब युगल भी उसकी ओर देखता है तो वह शर्मा जाता है। </p>
<p>रात में नायक गाकर अपनी प्रेमिका को ढूँढ़ रहा है पर न तो गीत के बोलों में, न इसकी धुन और गायिकी में और न ही <strong>देव आनंद</strong> के अभिनय में कहीं से भी छिछोरापन तो छोड़िये हल्कापन तक नहीं है। बाद में ऐसी परिस्थितियों को लेकर अन्य फिल्मों में भी गीत भी बने हैं पर इस गीत की गुणवत्ता और ऊँचाई को कोई गीत नहीं छू पाया है। </p>
<blockquote><p><strong>ओ आई जब ठण्डी हवा<br />
मैने पूछा जो पता<br />
वो भी कतरा के गई<br />
और बैचेन किया<br />
प्यार से तू मुझे दे सदा<br />
तू कहाँ, तू कहाँ ये बता इस नशीली रात में</strong></p></blockquote>
<p>रोशनी वाले घरों में बाहर से ताक-झाँक करके थक चुके शरीफाना तबियत वाले नायक की बैचेनी झलकती है जब वह हवा के बारे में भी शिकायत करने लगता है। उसे शिकायत है कि हवा तक उससे कतरा कर चली गई है, बिना उसकी प्रेमिका के बारे में कुछ कहकर। यहाँ वहाँ खोजते हुये वह फिर उसी मोड़ पर आ पहुँचा है जहाँ से उसने अपनी प्रेमिका की तलाश का रास्ता पकड़ा था। ब की बार वह नीचे जाने वाले रास्ते की तरफ बढ़ता है।</p>
<p>इस रास्ते पर एक मकान की ऊपरी मंजिल पर किसी महिला की छाया देखकर वह खुशी से भागता हुआ खिड़की के नीचे जा खड़ा होता है। पर वाह री किस्मत, यह तो कोई और ही महिला है जो उसे गीत गाकर माँगने वाला समझकर सिक्का उसकी ओर उछाल देती है। नाराज नायक सिक्के को वापिस खिड़की की ओर उछाल देता है और महिला का पति उपेक्षा से खिड़की बंद कर देता है। </p>
<p>अभी इश्क के इम्तिहां बाकी हैं!</p>
<blockquote><p><strong>हे चाँद तारों ने सुना<br />
इन बहारों ने सुना<br />
दर्द का राज़ मेरा<br />
रहगुज़ारों ने सुना<br />
तू भी सुन जानेमन<br />
आ भी जा<br />
तू कहाँ, तू कहाँ ये बता इस नशीली रात में</strong></p></blockquote>
<p>अब नायक के गाने में अधैर्य प्रवेश कर रहा है, शिकायत बढ़ रही है, आवाज में कुछ और तेजी आ गयी है। पर जल्दी ही वह संभल जाता है। शायद इंतज़ार खत्म होने को है।</p>
<p>और ऐसा ही हो भी जाता है जब उसके गाने की आवाज़ को पहचान कर अपने कमरे में किताब पढ़ रही नायिका उठकर बालकनी में आ खड़ी होती है।</p>
<p>नायिका के लिये नायक का शिमला पहुँच जाना अनपेक्षित है। और उसे आश्चर्य होना ही है उसे यूँ सामने खड़े पाना।</p>
<p>नायक-नायिका के इस मिलन के क्षणों में परस्पर देखे जाने के समय उनकी खुशी को जिस आकर्षक अंदाज़ में <strong>देव आनंद </strong>और <strong>नूतन</strong> ने प्रदर्शित किया है वह देखकर आनंद लेने की बात है।</p>
<blockquote><p><strong>ओ प्यार का देखो असर<br />
आये तुम थामे जिगर<br />
मिल गई आज मुझे<br />
मेरी मनचाही डगर<br />
क्यूँ छुपा, एक झलक फिर दिखा<br />
तू कहाँ, तू कहाँ ये बता इस नशीली रात में</strong></p></blockquote>
<p>नायक अपनी कोशिशों पर और कोशिशों के सफल परिणाम पर हर्षित है, गर्वित है और नायिका के समक्ष वह अपने प्रेम की सच्चाई, गहराई और महिमा का बखान करता है। वह दावे करता है कि उसके प्रेम की कशिश ने प्रेमिका को उससे मिलवा दिया है। जब एक झलक दिखाकर नायिका अंदर चली जाती है तो नायक निवेदन करता है कि वह प्रेमिका की एक और झलक का सुपात्र है। उसे तो पता नहीं कि नायिका स्वयं अंदर यह निश्चित करने गयी है कि उसकी माँ को उसके प्रेमी के वहाँ आने का पता अभी न चल जाये। वह दरवाजा बंद करके पुनः बालकनी में आकर प्रेमी को अपने दर्शन कराती है और उसे देखने का आनंद उठाती है।</p>
<p>नायक फिर से शरीफाना हरकत करते हुये खुशी खुशी वापिस जाने लगता है। उसका उद्देश्य प्रेमिका को खोजना था और खोज पूरी हो गयी है। वह सड़क पर खड़े रहकर न अपने प्रेम का और न ही अपनी प्रेमिका का तमाशा बनाना चाहता है। कुछ आगे तक जाकर खुशी से लबरेज़ वापिस नायिका के मकान की ओर दौड़ता है। आज भर के लिये विदा लेने के लिये। </p>
<p>उसे वही राहगीर मिलता है जो उसके द्वारा खोज शुरु करते हुये मिला था। वही उसकी कशिश भरी खोज का गवाह भी है। नायक और नायिका को एक साथ देखकर वह मुस्कराकर नायक की पीठ थपथपा कर उसके प्रेम, धीरज और संकल्प की मूक प्रशंसा करता है।</p>
<p>यह कालजयी गीत नये से नये प्रशंसक जुटाता रहता है। विचारणीय तो यही मुद्दा हो सकता है कि क्या ऐसे भी श्रोता/दर्शक होंगे या हो सकते हैं, जिन्हे इस गीत ने कभी लुभाया हो पर अब न लुभाता/लुभा पाता हो?</p>
<p><iframe width="420" height="315" src="http://www.youtube.com/embed/ivKiXsfD-qI" frameborder="0" allowfullscreen></iframe></p>
<p>&#8230;[राकेश]</p>
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		<title>मौसम (2011) : आगाज़ तो होता है अंजाम नहीं होता</title>
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		<pubDate>Sun, 25 Sep 2011 09:09:20 +0000</pubDate>
		<dc:creator>CINE manthan</dc:creator>
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		<description><![CDATA[आगाज़ तो होता है अंजाम नहीं होता जब मेरी कहानी में वो नाम नहीं होता जब जुल्फ की कालिख में घुल जाये कोई राही बदनाम सही लेकिन गुमनाम नहीं होता हँस-हँस के जवां दिल के हम क्यों न चुनें टूकड़े हर शख्स की किस्मत में ईनाम नहीं होता बहते हुये आँसू ने आँखों से कहा [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><strong>आगाज़ तो होता है अंजाम नहीं होता<br />
जब मेरी कहानी में वो नाम नहीं होता<br />
जब जुल्फ की कालिख में घुल जाये कोई राही<br />
बदनाम सही लेकिन गुमनाम नहीं होता<br />
हँस-हँस के जवां दिल के हम क्यों न चुनें टूकड़े<br />
हर शख्स की किस्मत में ईनाम नहीं होता<br />
बहते हुये आँसू ने आँखों से कहा थम कर<br />
जो मय से पिघल जाये वो जाम नहीं होता<br />
दिन डूबे हैं या डूबी बारात लिये किश्ती<br />
साहिल पे मगर कोई कोहराम नहीं होता<br />
</strong></p></blockquote>
<p><strong>मीना कुमारी</strong> की उपरोक्त्त गज़ल <strong>पंकज कपूर</strong> द्वारा निर्देशित फिल्म &#8211; <strong>मौसम</strong>, के प्रेमी चरित्रों हैरी (<strong>शाहिद कपूर</strong>) और आयत (<strong>सोनम कपूर</strong>) की प्रेम कथा पर तो बिल्कुल सटीक बैठती ही है साथ ही साथ यह विलक्षण क्षमता के अभिनेता <strong>पंकज कपूर</strong> की निर्देशक के रुप में पहली फिल्म पर भी बहुत मौजूं बैठती है। </p>
<p><strong>मौसम </strong>एक ऐसी फिल्म के रुप में शुरुआत करती है जिससे एक आशा का जन्म होता है कि एक बहुत अच्छी फिल्म देखने को मिल रही है। फिल्म पंजाब के वातावरण को अन्य हिन्दी फिल्मों से ज्यादा बेहतर तरीके से दिखाती है। लोगों का रहन सहन, उनकी वेशभूषा और उनके मकान-दुकान, और गाँव या कस्बे की गलियाँ, नहर के साथ चलती पतली सड़क, सब कुछ एक विश्वसनीय माहौल उत्पन्न करते हैं और धीमे से दर्शक को फिल्म में खींच लेते हैं। और हंसी मजाक के दौर के दरम्यान ही हौले से प्रेम का आगमन फिल्म की कहानी में हो जाता है। <strong>पंकज कपूर</strong> इस तरीके से प्रेम को अपनी फिल्म में गढ़ते हैं कि लगता है कि इस फिल्म के द्वारा वे आजकल के दौर की फिल्मों को प्रेम कथाओं के नाम पर फिल्मी लटके-झटके दिखाने वाली फिल्में सिद्ध कर देंगे और फिल्म का बहुत सारा हिस्सा ऐसा सिद्ध भी करता चलता है पर तभी फिल्म में सयोंग शुरु हो जाते हैं और फिल्म कुछ लड़खड़ा जाती है और फिल्म के अंत से पहले के बीस के लगभग मिनट एक बेहतरीन रुप से चलती फिल्म का सत्यानाश कर देते हैं। </p>
<p>आरम्भ और अंत, दो बहुत बड़ी समस्यायें रही हैं बहुत सारे भारतीय लेखकों एवम फिल्मकारों के लिये। बहुत सारे आरम्भ और अंत दोनों में कमजोर पड़ते हैं, कुछ आरम्भ में लड़खड़ा जाते हैं और कुछ समय पश्चात ही संभल पाते हैं, और कुछ शुरुआत तो अच्छी कर लेते हैं पर उनसे विषय का समेटना नहीं हो पाता। मौसम में <strong>पंकज कपूर</strong> रचनात्मकता की तीसरी श्रेणी में खड़े हो जाते हैं। उन्होने फिल्म की शुरुआत अच्छी की, फिल्म लगभग दो तिहाई हिस्से तक बांधे रहती है, हालाँकि कुछ कमियां बीच बीच में सिर उठाकर दर्शक का फिल्म से जुड़ाव कम करती हैं पर फिर भी फिल्म अच्छे स्तर पर चलती रहती है, पर अंत में उनकी फिल्म, <strong>शाहिद कपूर</strong> के चरित्र को सुपरमैन दिखाये जाने के चक्कर में बेहद कमजोर पड़ जाती है। </p>
<p><strong>मौसम</strong> प्रेम के आदर्श रुप को लेकर विकसित होती है, जहाँ प्रेमी-प्रेमिका सालों एक दूसरे के प्यार में भटकते हैं, बार बार मिलते हैं और बिछुड़ जाते हैं और फिर से मुलाकात हो जाने की आशा में जीवन व्यतीत करते हैं। दरअसल फिल्म में पहली कमी आती है प्रेमियों को अलग करने वाले पहले संयोग के कारण। अभी उनका प्रेम शुरु ही हो पाया है कि <strong>राममंदिर-बाबरी मस्जिद</strong> मसले से फैले दंगों से पनपे संयोग के कारण प्रेमी बिछुड़ जाते हैं। सयोंग से वे फिर मिलते हैं तकरीबन सात साल बाद एडिनबरा में। प्रेम पुनः जड़ पकड़ने लगता है कि वे <strong>कारगिल युद्ध</strong> से जन्मे संयोग के कारण वे फिर बिछुड़ जाते हैं। और तीसरी बार जब वे मिलते हैं पुनः, तो <strong>गुजरात दंगों</strong> से जन्मने वाले संयोग के कारण।</p>
<p>इतने सारे संयोग स्पष्टतया दर्शा देते हैं कि फिल्म में लेखन के स्तर पर ही कमजोरियाँ थीं और अगर इन्हे दुरुस्त कर लिया होता तो <strong>मौसम</strong> एक शानदार फिल्म बन जाती। </p>
<p>फिल्म के बहुत सारे हिस्से बहुत अच्छॆ होने के बावजूद ऐसा तो प्रतीत होता ही है कि फिल्म के विषय की विश्चसनीयता कम होती है फिल्म को पिछली सदी के अस्सी और नब्बे के दशकों में शुरुआत देकर वर्तमान सदी में लाकर खत्म कर देने से।</p>
<p>प्रेमियों के मिलने और बिछुड़ने के सयोंगों की बात छोड़ दें तो यही विषय और ऐसा ट्रीटमेंट, पिछली सदी के पचास के दशक में एक न भुला सकने वाली प्रेम कथा पर आधारित फिल्म बनवा देता। इस फिल्म को पचास या हद से हद साठ के दशक में दिलीप कुमार या देव आनंद के साथ बनाया जाता तो यह एक क्लासिक फिल्म बन गयी होती। उस काल में प्रेमियों का बिछुड़ना और आपस में कोशिश करके भी न मिल पाना बहुत विश्वसनीय लगता। ऐसा लगता है कि <strong>पंकज कपूर </strong>ने अपनी किशोरावस्था और युवावस्था में देखी बहुत सी बातें फिल्म में डाली हैं, पर कहानी उन्होने पिछले बीस-पच्चीस सालों के अंदर स्थापित की है। सभी रचनाकार अपने जीवन में देखी बातें अपनी रचनाओं में डालते हैं पर अगर रचना का काल सही ढ़ंग से स्थापित न किया जाये तो ऐसी रचनायें आज के दौर में पुराने दौर का अहसास कराती हैं। </p>
<p>अगर <strong>पंकज कपूर</strong> इस फिल्म को सत्तर के दशक से शुरु करके अस्सी के दशक के मध्य तक समाप्त कर देते तो भी फिल्म की विश्वसनीयता बहुत बढ़ जाती।</p>
<p>देश, काल और वातावरण का सटीक चयन कृति की विश्चसनीयता के लिये बहुत आवश्यक होता है। और फिल्म वर्तमान दौर में आकर अपने प्रति अविश्वास उत्पन्न करती है। मोबाइल और इंटरनेट के युग में प्रेमिका पता नहीं लगा पा रही है कि कारगिल युद्ध के बाद उसके प्रेमी का क्या हुआ। उसे कहीं से जवाब नहीं मिल पा रहा है! </p>
<p>बहरहाल इन कमियों के बावजूद <strong>मौसम</strong> दर्शनीय फिल्म है। अंत के बीस मिनट फिल्म में ऐसे प्रतीत होते हैं मानो स्वादिष्ट भोजन का आनंद उठाते हुये मुँह में कुछ रेतीला कण भोजन के साथ मुँह में चला जाये। </p>
<p><strong>पंकज कपूर</strong> श्रेष्ठतम अभिनेताओं में से हैं और दो-तीन को छोड़कर पिछले पच्चीस सालों में उनके द्वारा निभाई गयी भूमिकायें अन्य श्रेष्ठ अभिनेताओं द्वारा निभाई गयी भूमिकाओं से बीस ही बैठेंगी, भले ही यह अंतर आधे अंक का ही क्यों न हो। पर उनके द्वारा निर्देशित पहली फिल्म में यह श्रेष्ठता कायम नहीं होती। फिल्म अपनी गुणवत्ता को लगातार बरकरार नहीं रख पाती। </p>
<p><strong>पंकज कपूर</strong> संकेत जरुर देते हैं कि उनमें एक श्रेष्ठ निर्देशक बनने के गुण हैं पर शायद उनकी लेखन क्षमता उतनी शक्तिशाली नहीं है जिस स्तर के वे अभिनेता हैं।</p>
<p>फिल्म में बहुत सारे बहुत अच्छे दृष्य हैं। एडिनबरा में सात सालों के वियोग के बाद मिलने पर हैरी, जो कि अब भारतीय वायुसेना में अधिकारी बन चुका है, और आयत एक रेस्त्रां में आमने सामने बैठे हैं और <strong>पंकज कपूर</strong> उनसे संवाद नहीं कहलवाते बल्कि उनके अंतर्मन आपस में बातें करते हैं। इस दृष्य की परिकल्पना आकर्षक है।</p>
<p>ऐसा ही आकर्षक एक और प्रसंग है फिल्म में जहाँ <strong>देव आनंद</strong> की फिल्म &#8211; <strong>हम दोनो</strong> के प्रसिद्ध गीत &#8220;<strong>अभी न जाओ छोड़कर कि दिल अभी भरा नहीं</strong>&#8221; का बहुत आकर्षक उपयोग किया गया है। आयत के घर उसके पिता और चाचा से मिलने आये हैरी को यह गीत याद नहीं आता और आयत इस गीत को गुनगुनाकर उसे याद दिलवाती है। उनकी प्रेमकथा के इस मोड़ पर यह गीत आयत के दिल के भावों को भी भली भाँति प्रतिनिधित्व देता है। मुखड़े को गाकर आयत, हैरी के साथ अपने घर की सीढ़ियों से नीचे उतर रही है और उसके अंदर गीत के अंतरे गूँज रहे हैं जो उसकी भावनाओं को प्रदर्शित कर रहे हैं। <strong>देव आनंद</strong>, <strong>साधना</strong>,<strong> जयदेव</strong>, <strong>रफी </strong>और <strong>आशा भोसले</strong> के गीत को बेहद खूबसूरत श्रद्धांजलि यह फिल्म देती है और इस बात का महत्व इसलिये भी बढ़ जाता है क्योंकि हाल की कुछ फिल्मों में <strong>देव साब</strong> के बेहद खूबसूरत गीतों का रिमिक्स के नाम पर कबाड़ा किया गया है। </p>
<p><strong>पंकज कपूर</strong> न सिर्फ़ अभिनेताओं के चेहरों को ही कैमरे में पकड़वाते हैं बल्कि उनके पास दृष्यात्मक अभिव्यक्त्ति की सृजनात्मक रचनात्मकता है। कब कैमरे को अभिनेताओं के हाथ-पैरों की हरकतों को पकड़ना है, यह फिल्म में बखूबी दिखायी देता है। कब कैमरे को मानव चरित्रों से हटकर आसपास के परिवेश को दर्शाना है इस खूबी का भी प्रदर्शन उनकी फिल्म करती है। उनकी फिल्म के चरित्र को किस दृष्य में कैसी प्रतिक्रिया देनी है, इस पर भी उनकी रचनात्मकता दिखायी देती है। उदाहरण के लिये फिल्म में एक दृष्य है जब आयत आयत और हैरी एडिनबरा में फिर से बिछुड़ गये हैं और कुछ समय पश्चात आयत के पिता की मृत्यु हो जाती है। दुखी आयत को उसकी बुआ (<strong>सुप्रिया पाठक</strong>) सांत्वना देना चाहती है। आयत उनके सामने साहसी बनी रहती है और धैर्य दिखाती है। अपने कमरे में आकर जब वह अपनी अलमारी खोलती है तो हैरी के बड़े से चित्र के ऊपर उसकी निगाह जाती है और तब वह टूट जाती है। पिता के बाद उसका असली सहारा तो हैरी के साथ प्रेम में ही है। <strong>पंकज कपूर</strong> ने ऐसे कई गहरे दृष्य रचे हैं फिल्म में।</p>
<p>फिल्म विदेशी स्थलों को विश्वसनीय ढ़ंग से प्रस्तुत करती है और ऐसा नहीं लगता कि खामखा विदेश की शूटिंग दर्ज करने के लिये वहाँ फिल्म की कहानी को ले जाया गया है। फिल्म अलग-अलग काल में अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग गति से चलती है और भिन्न माहौल रचने में सफल है, (पर यह विभिन्नता भी फिल्म के पूरे कालखण्ड के साथ पूरा पूरा न्याय नहीं कर पाती)।</p>
<p><strong>मौसम</strong> की तमाम अच्छाइयों और कमियों के साथ ऐसा तो लगता ही है कि काश वे इसे सही काल में स्थापित करके एक पीरियड फिल्म बना पाते और फिल्म के अंत से पहले के कुछ मिनटों को फिल्म की प्रकृति के अनुरुप ही ढ़ाल पाते।</p>
<p><strong>पंकज कपूर</strong> बहुत बड़े कलाकार हैं और उनके पिछले रिकार्ड को देखकर और <strong>मौसम</strong> की अच्छाइयों को देख यही आशा बंधती है कि अगर मौसम व्यवसायिक सफलता पा लेती है और उन्हे भविष्य में और फिल्में बनाने का मौका मिलता है तो अपनी ख्याति के अनुरुप वे मौसम में उपस्थित कमियों का समावेश अपनी अन्य फिल्में में न होने देंगे।</p>
<p><iframe width="560" height="315" src="http://www.youtube.com/embed/jZwSV5qeMoc" frameborder="0" allowfullscreen></iframe></p>
<p>&#8230;[राकेश]</p>
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		<title>तीन देवियाँ (1965) : जब कुछ नहीं तो ये इशारे क्यों कई ख्वाब देख डाले एक दीवाने ने</title>
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		<pubDate>Mon, 12 Sep 2011 07:57:56 +0000</pubDate>
		<dc:creator>CINE manthan</dc:creator>
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		<description><![CDATA[टैगोर ने कभी लिखा था - A Lad there is and I am that poor groom That is fallen in love knows not with whom यह किशोरावस्था से युवावस्था की दहलीज पर खड़े युवाओं में से कुछ की मनोस्थिति को बहुत अच्छे ढ़ंग से प्रस्तुत करती है जो कि प्राकृतिक रुप से ही रोमांटिक हो [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>टैगोर</strong> ने कभी लिखा था -</p>
<blockquote><p><strong>A Lad there is<br />
and I am that poor groom<br />
That is fallen in love<br />
knows not with whom</strong>
</p></blockquote>
<p>यह किशोरावस्था से युवावस्था की दहलीज पर खड़े युवाओं में से कुछ की मनोस्थिति को बहुत अच्छे ढ़ंग से प्रस्तुत करती है जो कि प्राकृतिक रुप से ही रोमांटिक हो उठते हैं और उन्हे किसी अंजाने से प्रेम हो उठता है।</p>
<p>तीन देवियाँ में नायक देव (<strong>देव आनंद</strong>) की स्थिति कुछ ऐसी है कि वे तीन युवतियों से प्रेम होने या किये जाने की कगार पर खड़े हैं और उन्हे इस बात पर असमंजस है कि इन तीनों में से किसके साथ वे ऐसा प्रेम करते हैं जो जीवन भर वैवाहिक रुप में साथ निभा पाये। </p>
<p>फिल्में हैं जो आप बचपन में देखते हैं वे आपसे जुड़ जाती हैं या आप उनसे जुड़ जाते हैं और वे ताउम्र आपके साथ साथ चलती हैं। जीवन के किसी भी मोड़ पर आप देखें वे आपका हाथ पकड़ कर आपको आनंद के सागर में ले जाती हैं। वे आपके सिर पर हाथ रखकर आपकी जीवन के प्रति समझ को बढ़ाती हैं।</p>
<p>कुछ फिल्में हैं जो अपने साथ बहा कर ले जाती हैं और उस समय बस वही सत्य लगता है जो दिखाया जा रहा है और जिस विषय के ऊपर फिल्म बनी हुयी है, वही विषय सच और महत्वपूर्ण लगने लगता है। <strong>तीन देवियाँ</strong> जैसी फिल्में इतना तय कर देती हैं कि जीवन के रंग हजार हैं और हँसते-खेलते कटता जीवन भी कैसे कैसे गम्भीर मुद्दे सामने ले आता है।</p>
<p><strong>देव आनंद</strong> की B&#038;W फिल्मों में बहुत सारी बहुत ही अच्छी फिल्में हैं और उन्हे देखकर एक बात निश्चित हो जाती है कि दुनिया के किसी भी फिल्म उद्योग में देव आनंद कार्य करते उन्हे वहीं एक बड़ा सितारा बनने से कुछ और कोई नहीं रोक सकता था। </p>
<p><strong>तीन देवियाँ</strong> ऐसी फिल्म है जिस पर लिखना बहुत कठिन है क्योंकि यह ऐसी फिल्म है जो एक रोमांटिक कॉमेडी के रुप में शुरु होती है पर धीरे धीरे इतनी घुमावदार बन जाती है कि देव एक फिल्म मात्र के नायक न रहकर बहुत सारे पुरुषों के प्रतिनिधि बन जाते हैं और असमंजस में फँसे नायक-चरित्र -देव सभी दर्शकों से पूछने लगते हैं कि आप मेरी जगह होते तो क्या करते ऐसी स्थिति में? </p>
<p><strong>तीन देवियाँ</strong> बहुत से मामलों में एक अलग तरह की फिल्म है हिन्दी सिनेमा की। ताज्जुब होता है कि सन 1965 में ऐसी हिन्दी फिल्म बनी और आसानी से प्रदर्शित हुयी! उस समय के लिहाज से इसका कथानक बेहद अत्याधुनिक था, उस वक्त्त यह बहुत आगे की फिल्म मानी गयी होगी। चार मुख्य चरित्रों की ही बात करें तो परिवार की इकाई पर टिके भारतीय समाज में वे सब एकल स्वतंत्र चरित्र के रुप में फिल्म में सामने आते हैं। न तो नायक और न ही तीनों नायिकाओं में से किसी के पारिवारिक सम्बंध दिखाये गये हैं। किसी के माता-पिता आदि बुजुर्गों की उपस्थिति फिल्म में नहीं है। न ही किसी भी चरित्र के भाई या बहन का कोई जिक्र है। फिल्म में दो बुजुर्ग हैं भी तो लॉज के मालिक दम्पत्ति (<strong>हरिन्द्रनाथ चट्टॊपाध्याय </strong>और <strong>सुलोचना</strong> उर्फ <strong>रुबी मयर्स</strong>), जिनका कोई भी सीधा सम्बंध फिल्म के नायक या किसी भी नायिका से नहीं है। यह एक अलग तरह का प्रयोग किया था नवकेतन फिल्म्स और इसके लेखकों ने। यह एक अलग तरह का प्रयोग किया था फिल्म के निर्देशक और लेखकों ने।<br />
।<br />
आश्चर्य है कि इस फिल्म पर ढ़ंग से तवज्जो नहीं दी गयी। इसे एक तरह से सदा नकारा ही गया है। <strong>एस.डी बर्मन</strong> के बेहद शानदार संगीत के अलावा इस फिल्म की चर्चा न के बराबर होती है और होती भी है तो ऋणात्मक भावों में कि फिल्म अच्छी नहीं थी। इस फिल्म के साथ एक तरह से अन्याय होता आया है।</p>
<p><strong>देव आनंद</strong> की स्क्रीन प्रजेंस से पूर्णतया मेल खाती यह फिल्म भरपूर मनोरंजक भी है और इसके कथानक में जो घुमावदार मोड़ हैं वे दर्शक के दिमाग को मथते हैं और फिल्म केवल समय काटने के लिये या मनोरंजन के लिये देखी फिल्म ही नहीं रह जाती। देव के चरित्र की मुश्किलें दर्शकों के साथ रिश्ता कायम कर लेती हैं। जो सवाल देव के सामने खड़े हैं वे ही दर्शकों के सामने भी आ खड़े होते हैं कि ऐसी स्थिति में ऐसा क्या किया जा सकता है जो कि सही हो और सटीक हो और न्यायपूर्ण भी हो। </p>
<p>युवा नायक देव (<strong>देव आनंद</strong>), तीन युवतियों, नंदा (<strong>नंदा</strong>), सिमी (<strong>सिमी ग्रेवाल</strong>), और कल्पना (<strong>कल्पना</strong>) के साथ प्रेम में है और तीनों आकर्षक एवम गुणी महिलायें हैं और तीनों देव से प्यार करती हैं और तीनों अपने-अपने तरीके से देव पर दबाव डाल रही हैं कि वे उनके प्रति अपने प्रेम का इजहार करें जिससे स्थिति साफ हो और देव साहब हैं कि उलझन में हैं कि कौन है जो उनके लिये सच्ची जीवन साथी बन सकती है। वे तीनों से प्रेम करते हैं। तीनों का साथ उन्हे भाता है। तीनों में से किसी को भी वे दुख नहीं दे सकते, तीनों में से किसी को भी दुखी नहीं देख सकते। तीनों से उनके दिल के तार जुड़े हुये हैं।</p>
<p>वे कैसानोवा नहीं हैं। वे प्लेबॉय नहीं हैं। बस वे समझ नहीं पा रहे हैं कि इन तीनों में से किसके साथ उन्हे घर बसाना चाहिये? एक तो उन्होने सोचा नहीं था कि बम्बई शहर में नौकरी मिलते ही उनका जीवन तेज रफ्तार से दौड़ने लग जायेगा और न केवल एक कवि के रुप में सफलता उनके कदम चूमने लगेगी बल्कि तीन खूबसूरत और गुणी युवतियाँ भी उनके जीवन में प्रवेश कर जायेंगीं। शादी के लिये वे वे अभी तैयार नहीं थे परंतु तीनों से उनका स्नेह है और प्रेम तो कम्बख्त भाव ही ऐसा शरारती है कि बस वह तो बस ही जाता है जीवन में अपने आप। इससे बड़ा अतिथि होता नहीं कोई जीवन में। जीवन की किस बेला में प्रेम का आगमन हो जाये कोई नहीं बता सकता। </p>
<p>देव अगर एक प्लेबॉय ही हों तो वे अपनी तीनों ही महिला मित्रों को प्रेमिका के रुप में अपनाने से इंकार करके ऐसे ही जीवन जीने लगें जहाँ दौलत, शोहरत और कामयाबी उनके गहरे दोस्त बन जायें और जहाँ युवतियाँ भी उनसे सम्पर्क बढ़ाने को उत्सुक हों। अनेक युवतियाँ अभी भी उनमें दिलचस्पी लेती ही हैं। देव युवा हैं, खूबसूरत हैं, गुणी हैं, आत्मविश्वासी हैं, कवि हैं, और एक मधुर वाणी के मालिक हैं। उनके पास सब कुछ है जो एक बेहद योग्य व्यक्ति में हो सकता है। </p>
<p>यह उनके जीवन की विडम्बना ही है कि उनके जीवन में कुछ ही समय के भीतर ही तीन ऐसी बेहद आकर्षक महिलाओं का आगमन होता है जो तीनों ही उनसे प्रेम करने लगती हैं। देव को भी तीनों से ही प्रेम है। तीनों का साथ उन्हे भाता है। तीनों में से किसी के साथ भी उनकी जोड़ी बन सकती है और वे खुश रहेंगे। </p>
<p>जीवन खुशी खुशी चल रहा है। तीन युवतियों का उनके जीवन में आना तो ठीक है और वे इसे संभाल सकते हैं पर तीनों के साथ उनके रिश्ते गहराई पकड़ने लगते हैं और यही नजदीकियाँ उनके जीवन में परेशानी का सबब बन जाती हैं। जैसे जैसे उनके इन युवतियों से रिश्ते गाढ़े होते जाते हैं और तीनों उनसे विशिष्ट स्थान की अपेक्षा करने लगती हैं वैसे-वैसे उनकी स्थिति कुछ कुछ ऐसी होती जाती है जिसके लिये किसी जहीन शायर ने कहा था।</p>
<blockquote><p><strong>जू जू दयारे इश्क में बढ़ता गया<br />
तोहमतें मिलती गयीं रुसवाइयाँ मिलती गयीं। </strong></p></blockquote>
<p>सन 1965 की फिल्म &#8211; <strong>तीन देवियाँ</strong>, से अलग हटकर ज़रा सन 1984-85 में आते हैं। 1984 के पूर्वाद्ध में भारत ने रुसी अंतरिक्ष यान <strong>Soyuz T-11</strong> में<strong> राकेश शर्मा</strong> को अंतरिक्ष में भेजा और उसी वर्ष गरमियों में ही भारतीय टेलीविज़न के इतिहास का एक बेहद महत्वपूर्ण हस्ताक्षर &#8220;<strong>हम लोग</strong>&#8221; गढ़ा गया। जिन्होने <strong>मनोहर श्याम जोशी</strong> की कलम से निकले इस विलक्षण रुप से भारतीय मध्य वर्ग (निम्न और मध्यम स्तर के मध्य वर्गीय) की जनता के जीवन से गहराई से जुड़े हुये टीवी धारावाहिक को देखा है उन्हे एक खास प्रसंग भूला न होगा। निम्न मध्यवर्गीय बसेसर राम (<strong>विनोद नागपाल</strong>) के छोटे पुत्र नन्हे (<strong>अभिनव चतुर्वेदी</strong>) का सपना है क्रिकेटर बनना। अक्सर &#8220;हम होंगे कामयाब&#8221; गाने वाले नन्हे की दोस्ती है अपनी ही जैसी आर्थिक स्थिति में पली बढ़ी, आसपड़ोस में रहने वाली लड़की से। लड़की नन्हे से प्रेम करती है। महत्वाकांक्षी नन्हे को करोड़पति पिता की एकमात्र पुत्री काम्या (<strong>कामिया मल्होत्रा</strong>) भी पसंद करने लगती है। काम्या के पिता नन्हे और काम्या की नजदीकी को पसंद नहीं करते। नन्हे के साथ साथ &#8220;<strong>हम लोग</strong>&#8221; देखने वाला हिन्दुस्तान दो हिस्सों में बँट गया था। एक वर्ग को नन्हे का उसके पड़ोस में रहने वाली लड़की से प्रेम सुहाता था और दूसरे वर्ग को नन्हे और काम्या की प्रेमकहानी स्वीकृत थी। जाहिर था काम्या के साथ नन्हे का भविष्य एक धनी व्यक्ति का हो सकता था। सफलता उसके कदम चूमती और पड़ोस में रहने वाली लड़की के साथ संघर्षमयी जीवन होता। स्थितियाँ कुछ ऐसी करवट लेती हैं कि काम्या के पिता की असलियत नन्हे पर जाहिर हो जाती है। वह अंडर्वर्ल्ड डॉन है और अपने को &#8220;<strong>नर्क का राजा</strong>&#8221; कहता है। नन्हे उसके जाल में पूरी तरह फंस जाता है। इस सचाई के बावजूद भी भारत के दर्शक नन्हे के प्रेम को लेकर दो ही हिस्सों में बँटे रहे क्योंकि काम्या को अपने पिता के लुके छिपे अपराधी जीवन के बारे में जानकारी है नहीं। </p>
<p>&#8220;<strong>हम लोग</strong>&#8221; के प्रसंग का विवरण इसलिये आवश्यक लगता है कि तीन देवियाँ के लगभग बीस साल बाद <strong>मनोहर श्याम जोशी</strong> ने ऐसी ही परिस्थितियाँ हम लोग में उत्पन्न कीं और इस विषय से लोगों का भरपूर जुड़ाव देखा गया। यह ऐसी परिस्थिति नहीं है कि वास्तविक जीवन में उत्पन्न न हो सके। आखिरकार जब बहुविवाह होते थे भारत में तो ऐसा भी संभव है कि किसी व्यक्ति की तीन पत्नियाँ हों और उसक तीनों से प्रेम बरकरार हो। स्त्री को बहुविवाह की छूट अपवाद ही रही है सो उसका जिक्र यहाँ प्रासंगिक नहीं है। </p>
<p>इसे आश्चर्यजनक ही माना जा सकता है कि एक नायिका द्वारा दो नायकों में से एक को चुनने के विषय पर तो बहुत सारी हिन्दी फिल्में बनी हैं, <strong>देव आनंद</strong> ने खुद <strong>लव एट टाइम्स स्क्वायर</strong> इसी विषय पर बनायी थी, पर एक नायक के दो या दो से ज्यादा नायिकाओं के बीच चुनाव करने पर अगर बनी भी होंगी तो बहुत ही कम फिल्में बनी होंगी और उनमें सबसे उल्लेखनीय फिल्म तीन देवियाँ ही है। </p>
<p>जीवन में प्रेम के अनगिनत रुप हैं और प्रेम पर लिखे जा सकने वाले सबसे बड़े ग्रंथ का एक अध्याय ऐसी स्थितियों का भी हो सकता है जैसी स्थितियाँ <strong>तीन देवियाँ</strong> में दिखायी गयी हैं। फिल्म इस स्थिति को विश्वसनीय बनाती है जहाँ दर्शक को लगे कि वाकई देव को तीनों नायिकाओं से प्रेम है और उन तीनों को ही देव से प्रेम है और तीनों नायिकाओं में से प्रत्येक इस तथ्य को जानती है कि बाकी दोनों नायिकायें भी देव से प्रेम करती हैं। </p>
<p><iframe width="420" height="345" src="http://www.youtube.com/embed/KUo5q0zGgl4" frameborder="0" allowfullscreen></iframe></p>
<p><strong>तीन देवियाँ</strong> में देव का किसी भी नायिका से पहली नज़र वाला प्रेम नहीं है। उसमें शुरुआती भावुकता का स्थान नहीं है। यहाँ प्रेम धीरे-धीरे और लगातार मिलते जुलते रहने से पनपा है और यह मैत्री की बुनियाद से जन्मा है। तीनों से ही पहले देव की मित्रता होती है और बाद में तीनों के मन में देव के लिये पेम के अंकुर फूटते हैं। </p>
<p>देव की तीन महिला मित्रों के मध्य कुछ अंतर हैं।</p>
<p>देव जब बम्बई में रोजगार की तलाश में आते हैं तो जिस लॉज में वे ठहरे हैं वहीं रहने वाली नंदा से उनकी मुलाकात होती है। नंदा उन्ही के जैसी आर्थिक एवम सामाजिक पृष्ठभूमि की प्रतिनिधि है और उन्ही की तरह एक साधारण नौकरी करके जीवनयापन कर रही है। </p>
<p><iframe width="420" height="345" src="http://www.youtube.com/embed/ovb7LA-xWh4" frameborder="0" allowfullscreen></iframe></p>
<p>नंदा ने बम्बई में शुरु से से उनका विकास देखा है। नंदा के सामने ही उन्होने कवि होने की सफलता की शुरुआती सीढ़ी चढ़ी है। कहा जा सकता है कि नंदा उनके जीवन को बाकी दोनों नायिकाओं से इस लिहाज से थोड़ा ज्यादा जानती है जब लोगों पर देव के कवि होने का गुण जाहिर भी नहीं हुआ था। नंदा ने उन्हे एक साधारण पर आकर्षक युवा के रुप में जाना था। देव की कविताओं के छपने के सपने में वह सम्मिलित थी।</p>
<p>देव की अगली मुलाकात होती है अभिनेत्री कल्पना से जो देव की इस बात पर आकर्षित हो जाती है कि देव ने उनके एक सितारा होने की छवि को कोई भाव नहीं दिया और उनके स्त्री रुप को सम्मान देकर उनसे बर्ताव किया।</p>
<p><iframe width="420" height="345" src="http://www.youtube.com/embed/M9oQZQvCQqE" frameborder="0" allowfullscreen></iframe></p>
<p>नंदा और कल्पना, दोनों से ही देव की पहली-पहली मुलाकात छोटी झड़पों से होती है, पर अगली मुलाकात तक सम्बंध सामान्य हो जाता है।</p>
<p>देव की तीसरी मुलाकात होती है धनी सोशलाइट सिमी से। अब तक देव की किताब छप चुकी है और जब देव सिमी से मिलते हैं तो वे उन्ही की किताब पढ़ रही हैं। बस उन्हे यह पता नहीं है कि सामने खड़े शख्स देव ही कवि देव भी हैं।</p>
<p>सिमी देव को सफलता और शोहरत की ऊँचाइयों पर ले जाना चाहती है। कल्पना के साथ भी देव समाज में एकदम से ऊपर उठ जायेंगे। सिर्फ नंदा का साथ ऐसा है जहाँ किसी किस्म के भौतिक प्रलोभन की गुँजाइश नहीं है।</p>
<p><iframe width="420" height="345" src="http://www.youtube.com/embed/3rKiTkTQZZs" frameborder="0" allowfullscreen></iframe></p>
<p>देव का मिलना जुलना तीनों से होने लगता है और तीनों के मन में देव जगह बनाते जा रहे हैं। उन्हे खुद भी इस बात का एहसास है पर वे इन सिलसिलों को रोकने में या तो असमर्थ हैं या वे इस बहाव के साथ बहे जा रहे हैं। सब कुछ तेजी से हो रहा है। सबसे कमजोर स्थिति में नंदा हैं। जब तक उन्हे कल्पना और सिमी के बारे में पता नहीं है वे यही मानकर चलती हैं कि देव सिर्फ उन्हे ही जानते हैं इस शहर में। एक शाम देव को वे अपने कमरे में दावत देना चाहती हैं, उन्हे लगता है कि शायद देव खुल कर कुछ कहें, प्रेम का प्रस्ताव रखें। अपने सपनों में गुम, खुश हो वे दावत की तैयारी कर रही हैं, बाजार से महंगी सब्जियाँ खरीदती हैं। भारत के सबसे अच्छे कश्मीरी सेव खरीदती हैं पर उनके अंदर इस वक्त्त तक आत्मविश्वास की कमी है अपने और देव को लेकर। देव को कल्पना के साथ कार में जाता देख ही वे सड़क पर सब सामान गिरा बैठती हैं।</p>
<p>शाम को वापिस आने पर देव का चरित्र, उनकी मनोस्थिति बहुत अच्छे ढ़ंग से सवांदो के जरिये प्रदर्शित की गयी है। दृष्य और संवाद बेहद अच्छे हैं।</p>
<p>कुछ और समय बीतने पर नंदा देव को साथ लेकर शहर से बाहर गाँव में जाती हैं और देव पर दबाव डालती हैं कि वे उनसे प्रेम के सम्बंध में खुल कर कहें। फ़िल्म यहाँ पर एक बेहद खूबसूरत गीत &#8211; <a href="http://www.cinemanthan.info/index.php/2012/05/likhahaiteriankhonmein/"><strong>लिखा है तेरी आँखों में</strong></a> को अवतरित करके एक संगीतमयी माहौल में दोनों चरित्रों द्वारा इस स्थिति को सुलझाने की कोशिशों को दिखाती है| </p>
<p><iframe width="420" height="345" src="http://www.youtube.com/embed/7a0OeTM9rqM" frameborder="0" allowfullscreen></iframe></p>
<p>जब नंदा भावनाओं की नदी में डूबी हुयी प्रतीक्षा कर रही हैं कि देव साफ साफ शब्दों में अपने प्रेम का इजहार करें। तो देव कहते हैं,</p>
<blockquote><p><strong>प्रेम की पुकार अगर सौ फीसदी (%) सच नहीं है तो जीवन में इससे बड़ा कोई झूठ नहीं है।</strong>
</p></blockquote>
<p>जितना यह संवाद सच्चा और वजनदार है उनते ही प्रभावी ढ़ंग से <strong>देव आनंद </strong>ने इसे कहा भी है।</p>
<p>प्रभावी दृष्य और संवाद ही फिल्म को उथलेपन से बचाकर गहराई प्रदान करते हैं। </p>
<p>एक स्थिति ऐसी आती है कि तीनों युवतियाँ ही देव पर दबाव डालने लगती हैं कि वे खुले शब्दों में अपने प्रेम का इज़हार करें और देव अभी इस निर्णय पर पहुँचे नहीं हैं।</p>
<p>ऊहापोह में घिरे देव को सिमी कश्मीर में होने वाले अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में शिरकत कराने ले जाती हैं। कल्पना शूटिंग के सिलसिले में कलकत्ता गयी हैं।</p>
<p><iframe width="420" height="345" src="http://www.youtube.com/embed/Dtxp-e1U5i0" frameborder="0" allowfullscreen></iframe></p>
<p>सिमी तो देव का <a href="http://www.cinemanthan.info/index.php/2011/05/kahinbekhyal/"><strong>काव्य पाठ</strong></a> सामने बैठी सुन रही हैं और कल्पना और नंदा रेडियो पर देव को सुन रही हैं। नंदा दुखी हैं पर देव के काव्य में उन्हे अपने प्रेम की झलक मिलती है। </p>
<p><strong>भगवती चरण वर्मा</strong> ने नीचे प्रस्तुत की गयी कविता लिखी तो प्रेमिका के विरह में तड़प रहे प्रेमी के लिये थी पर अगर स्त्री-पुरुष के भेद से परे हटें तो यह नंदा की स्थिति, भावनाओं और मनोस्थिति पर माकूल बैठती है। </p>
<blockquote><p> <strong>क्या जाग रही होगी तुम भी?<br />
    निष्ठुर-सी आधी रात प्रिये!<br />
    अपना यह व्यापक अंधकार,<br />
    मेरे सूने-से मानस में, बरबस भर देतीं बार-बार;<br />
    मेरी पीड़ाएँ एक-एक, हैं बदल रहीं करवटें विकल;<br />
    किस आशंका की विसुध आह!<br />
    इन सपनों को कर गई पार<br />
    मैं बेचैनी में तड़प रहा;<br />
    क्या जाग रही होगी तुम भी?</p>
<p>    अपने सुख-दुख से पीड़ित जग, निश्चिंत पड़ा है शयित-शांत,<br />
    मैं अपने सुख-दुख को तुममें, हूँ ढूँढ रहा विक्षिप्त-भ्रांत;<br />
    यदि एक साँस बन उड़ सकता, यदि हो सकता वैसा अदृश्य<br />
    यदि सुमुखि तुम्हारे सिरहाने, मैं आ सकता आकुल अशांत</p>
<p>    पर नहीं, बँधा सीमाओं से, मैं सिसक रहा हूँ मौन विवश;<br />
    मैं पूछ रहा हूँ बस इतना- भर कर नयनों में सजल याद,<br />
    क्या जाग रही होगी तुम भी?</strong></p></blockquote>
<p>देव के प्रति सिमी की भावनायें गहरी होती जा रही हैं। वे देव को उकसाना भी चाहती हैं जिससे देव उनके पक्ष में निर्णय लें और वे खुद को रोकना भी चाहती हैं जिससे कि देव के पहल करने से पहले कुछ ऐसा न हो जाये जिस पर उन्हे पछताना पड़े।</p>
<p><iframe width="420" height="345" src="http://www.youtube.com/embed/S_VrmXwAv68" frameborder="0" allowfullscreen></iframe></p>
<p>उनकी स्थिति कुछ ऐसी है &#8211; </p>
<blockquote><p><strong>निगाहों में समाती नहीं है सूरत तुम्हारी<br />
काश! मैंने तुम्हे गौर से देखा न होता</strong></p></blockquote>
<p>उधर कल्पना भी प्रेम से पीड़ित हो उठी है। देव के काव्य पाठ को सुन वह देव की अनुपस्थिति को महसूस करने लगती है और ग्लैमर संसार की चमक दमक को पसंद करने वाली सुख सुविधाओं के मध्य रहने वाली कल्पना की इस समय की भावनाओं की तीव्रता कुछ इस प्रकार की है -</p>
<blockquote><p><strong>तेरे बगैर किसी चीज की कमी तो नहीं<br />
हाँ तेरे बगैर दिल उदास रहता है</strong></p></blockquote>
<p>जब उनसे देव से दूरी सही नहीं जाती तो वे विमान से सीधे कश्मीर पहुँच जाती हैं और देव के कमरे में उनकी अनुपस्थिति में ही विराजमान हो जाती हैं। देव उनके ऐसे अचानक चले आने पर आश्चर्यचकित हैं, उनकी दुविधा और बढ़ गयी है। वे सिमी से कह चुके हैं कि उन्हे तीन दिनों की मोहलत दी जाये।</p>
<p>कल्पना देव के ऊपर अपनी भावनायें प्रकट करती हैं जिनका लुब्बेलुबाव इन दो पंक्तियों से प्रस्तुत किया जा सकता है।</p>
<blockquote><p><strong>आप अगर खफा न हों तो आप ही से पूछ लें<br />
आपसे मिले कितने दिन गुजर गये</strong></p></blockquote>
<p>देव उनसे भी कुछ दिनों की छूट मांगते हैं और कहते हैं कि अगर उनके पास आया तो जीवन भर के लिये और नहीं तो बस अलविदा।</p>
<p>प्रेम के आगमन से व्यक्ति खुश होता है पर देव की स्थिति कुछ और ही है</p>
<blockquote><p><strong>न जाने क्यों बदलती जा रही है ज़िंदगी अपनी<br />
खुशी में आजकल कुछ ग़म भी शामिल होता जा रहा है</strong></p></blockquote>
<p>देव को अब समझ में आता है एक प्रसिद्ध शेर का मतलब</p>
<blockquote><p><strong>ये इश्क नहीं आसां बस इतना समझ लीजिये<br />
इक आग का दरिया है और डूब कर जाना है</strong></p></blockquote>
<p>देव को किसी एक स्त्री के प्रेम को परिणति देनी है। वे ऐसा करते भी हैं पर बस यहीं आकर अभी तक रोचकता से पेचीदगी दिखा रही फिल्म समझौता कर जाती है।</p>
<p>यह सच है कि फिल्म और ज्यादा गहराई अपना सकती थी। फिल्म को अंत तक पहुँचाने के लिये देव द्वारा निर्णय लेने की प्रक्रिया एक व्यवसायिक समझौता लगती है। शायद उस वक्त्त की सामाजिक परिस्थितियों को भाँप कर ऐसा सोचा गया हो कि परम्परागत किस्म का अंत फिल्म की व्यवसायिक सफलता के लिये बेहतर होगा। </p>
<p>बेहतर होता कि जब देव का चरित्र दर्शक से सामंजस्य जोड़ लेता है और देव की समस्या दर्शक को अपनी या जानी पहचानी लगने लगती है तो फिल्म का अंत खुला छोड़ा जा सकता था, जिसमें दर्शक को नहीं पता कि देव ने किस युवती को चुना..क्योंकि फिल्म बहस तो उत्पन्न कर सकती है निश्चित सूत्र नहीं दे सकती ऐसे मामलों में। या अगर देव के चुनाव को दिखाना ही था तो इसे सम्मोहन प्रक्रिया से अलग गहन सोच की प्रक्रिया का परिणाम दिखाया जा सकता था। </p>
<p>जिन्होने फिल्म को डीवीडी काल से पहले कभी देखा है उन्हे पता है कि इस B&#038;W फिल्म में सिर्फ एक हिस्सा, जिसमें देव सम्मोहन प्रक्रिया से गुजरते हैं और तीनों युवतियों के साथ अपने संभावित भविष्य को देखते हैं और नंदा, सिमी और कल्पना में से एक के साथ घर बसाने का निर्णय लेते हैं, रंगीन है।</p>
<p>डीवीडी बनाने वाली कम्पनियाँ हिन्दी फिल्मों के साथ मनमाना अत्याचार करती हैं और जैसी उनकी इच्छा होती है उसके अनुसार वे फिल्म में काट-छाँट कर देती हैं। इन कम्पनियों की ऐसी कुबुद्धि का परिणाम है कि तीन देवियाँ के नये दर्शक इसके इस तकरीबन 12-14 मिनट लम्बे रंगीन भाग को देखने से वंचित रह जाते हैं और देव को राशिद खान के टेंट में घुसते दिखाया जाता है और वहाँ से निकलकर भागते हुये, पर बीच में क्या हुआ, यह दर्शक को पता नहीं चल पाता। पुरानी फिल्मों के मूल स्वरुप के साथ छेड़छाड़ करने का अधिकार किसी को नहीं होना चाहिये।</p>
<p><strong>देव आनंद</strong>, <strong>नंदा</strong>, <strong>सिमी ग्रेवाल</strong> और <strong>कल्पना</strong> के बेहतर अभिनय के अलावा फिल्म को <strong>आई.एस.जौहर</strong>, <strong>हरिन्द्रनाथ चट्टॊपाध्याय</strong> और <strong>सुलोचना</strong> उर्फ <strong>रुबी मयर्स</strong> के अच्छे अभिनय का सहारा भी मिलता है। <strong>एस.डी. बर्मन</strong> द्वारा इस फिल्म में दिया संगीत उनके शीर्ष एल्बमों में से एक है।</p>
<p>इस मनोरंजक फिल्म को इसके सही परिपेक्ष्य में देखने पर इसका विषय उन विचारों को दर्शक के समक्ष उठाता भी है जिन पर फिल्म की बुनियाद टिकी हुयी है।</p>
<p>&#8230;[राकेश]</p>
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		<title>आशा भोसले : जैसे हो गूँजता सुरीला सुर किसी सितार का</title>
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		<pubDate>Thu, 08 Sep 2011 08:59:38 +0000</pubDate>
		<dc:creator>CINE manthan</dc:creator>
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		<description><![CDATA[शुरु से ही आशा भोसले की गायिकी उस ऊँचाई पर उड़ती रही है जहाँ से वह हरेक दौर में सक्रिय बड़े से बड़े संगीतकार को इठलाकर जताती रही है कि जनाब सृष्टि में हम भी श्रेष्ठ गायकों के साथ उपस्थित हैं, चाहो तो गीत मेरी गायिकी में गवा कर अपने गीत उच्च स्तरीय बना लो [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>शुरु से ही <strong>आशा भोसले</strong> की गायिकी उस ऊँचाई पर उड़ती रही है जहाँ से वह हरेक दौर में सक्रिय बड़े से बड़े संगीतकार को इठलाकर जताती रही है कि जनाब सृष्टि में हम भी श्रेष्ठ गायकों के साथ उपस्थित हैं, चाहो तो गीत मेरी गायिकी में गवा कर अपने गीत उच्च स्तरीय बना लो वरना नुकसान हमारा कतई नहीं है, हमारी गायिकी किसी अन्य की गायिकी से पासंग भर भी कम न ठहरेगी।</p>
<p><strong>आशा भोसले</strong> की आवाज और गायन शैली इंद्रधनुषी रही है, और दोनों ही ने अलग-अलग दौर में अलग-अलग रंगों की छटा बिखेरी है। अच्छे संगीतकारों ने अपनी पसंद और जरुरत के अनुसार उनकी आवाज और गायन शैली के भिन्न रंगों का उपयोग अपने गीतों को बेहतर बनाने में किया है। </p>
<p>पचास के दशक के शुरुआती सालों में <strong>आशा भोसले</strong> की आवाज में मिठास का पुट अधिक था। पचास के ही दशक में <strong>आशा भोसले</strong> की आवाज के मिठास में उपस्थित मद भरे अंदाज़ का मधु पहचान लिया <strong>ओ.पी नैयर</strong> ने और ढ़ेर सारे कालजयी गीत इस जोड़ी ने रच दिये। इसी दशक के मध्योपरंत <strong>एस.डी.बर्मन</strong> ने उनकी आवाज में हिलोरें मारती सागर सरीखी लरज़ती लहरों को पहचाना और वे उनकी आवाज के नमक को सतह पर ले आये। मिठास और नमकीन का यह मिलन अदभुत आवाज बन कर सामने आया और <strong>एस.डी.बर्मन</strong> और <strong>आशा भोसले</strong> की जुगलबंदी से श्रोताओं को बहुत सारे अविस्मरणीय गीत सुनने को मिले।</p>
<p>पर आज <strong>एस.डी.बर्मन</strong> और <strong>ओ.पी.नैयर</strong> के साथ <strong>आशा भोसले</strong> की प्रसिद्ध जुगलबंदी से इतर चर्चा एक ऐसे गीत की, जो कि फिल्म <strong>नौलखा हार</strong> (1953) में <strong>आशा भोसले </strong>से गवाया गया था। फिल्म के संगीतकार थे <strong>भोला श्रेष्ठ</strong> और गीतकार <strong>भरत व्यास</strong>। <strong>मीना कुमारी</strong>, <strong>निरुपा राय</strong> और <strong>जीवन </strong>जैसे कलाकारों से भरी यह फिल्म आल्हा-ऊदल के प्रसंगों से प्रेरित थी।</p>
<p>गीत है &#8211; <strong>जैसे हो गूँजता सुरीला सुर किसी सितार का</strong></p>
<p>इस गीत के मुखड़े की प्रथम पंक्ति <strong>आशा भोसले</strong> की गायिकी को परिभाषित करने के लिये एकदम उपयुक्त्त है।</p>
<p><strong>भरत व्यास</strong> ने अपने लगभग हरेक गीत में सिद्ध किया है कि वे केवल हिन्दी के शब्दों का उपयोग करके बहुत ही उच्च स्तरीय गीत रच सकते थे। </p>
<p>प्रेम की मधुर भावनाओं से अभी नवीन परिचय हुआ है मीना कुमारी का और उन भावनाओं से ओतप्रोत हो उनका मन-मयूर गा रहा है, नृत्य कर रहा है।</p>
<p>प्रेम के भाव से सराबोर अल्हड़ युवती के भावों को भरत व्यास के शब्द आकर्षक अभिव्यक्त्ति देते हैं तो <strong>आशा भोसले</strong> ने डूबकर गीत को इस अंदाज़ में गाया है कि सुनकर ही चरित्र की कोमल और कच्ची वय की हिलोरें मारती भावनाओं का आभास हो जाता है, ऐसी भावनायें जिनके आगे और सब भावनायें दोयम दर्जे की लगने लगती हैं बल्कि अन्य भावनाओं की याद भी नहीं आ पाती, प्रेम की इन भावनाओं के सामने। और <strong>मीना कुमारी</strong> का अभिनय चरित्र और उसकी भावनाओं को परदे पर जीवंत कर देता है।</p>
<blockquote><p>जैसे हो गूँजता सुरीला सुर किसी सितार का<br />
लगता मधुर-मधुर मुझे बंधन तुम्हारे प्यार का</p></blockquote>
<p>सितार की मधुर ध्वनि की प्रष्ठभूमि में धीम स्वर में आशा भोसले इस अंदाज़ में गीत को शुरु करती हैं मानो ध्यान लगाने के लिये आंखें बंद करके किन्ही मंत्रों का जाप शुरु कर रही हों। प्रेम में ध्यान अपने आप लग जाता है और दिल-दिमाग प्रेम और प्रेमी के ही ध्यान में डूबे रहना चाहते हैं। नायिका प्रेम बंधन में बंधने के कारण हर्षित है। अगर एकल व्यक्ति नदी का एक किनारा है तो प्रेम उसे दूसरे किनारे खड़े प्रेमी से जोड़ देता है। </p>
<blockquote><p>तुमसे सजन मैं यूँ बँधी जैसे पतंग से डोर रे<br />
सागर से जूँ हिलोर रे चँदा से जूँ चकोर रे</p></blockquote>
<p>सिर्फ गीत में ही उड़ती पतंग का जिक्र नहीं है बल्कि <strong>मीना कुमारी </strong>भी मुक्ताभाव से हिंडोले खाती दिखायी देती हैं। अभी वे प्रसिद्ध <strong>मीना कुमारी</strong> नहीं हो पायी थीं। अभी उनके अभिनय में उपस्थित गहराई लिये हुये ठहराव सतह पर नहीं आ पाया था। अभी वे उस तरह से अभिनय करती दिखायी देती हैं जैसा कि उस दौर की अन्य प्रसिद्ध अभिनेत्रियाँ एक अल्हड़ युवती के चरित्र में करतीं। <strong>मीना कुमारी</strong> की विशेष छाप अभी विकसित नहीं हो पायी थी। कुछ वर्ष बाद वे इसी गीत पर अभिनय करतीं तो चरित्र में तो इतनी ही गहराई से डूबतीं पर तब गीत उनकी विशिष्टता की छाप से प्रदीप्त भी रहता।    </p>
<blockquote><p>ज्योति मेरे नयन की तू मोती मेरे सिंगार का<br />
लगता मधुर-मधुर मुझे बंधन तुम्हारे प्यार का</p></blockquote>
<p>नायिका प्रेम की उस अवस्था में है जहाँ अपने जीवन में उपस्थित हरेक उपलब्धि, क्षमता और सम्पदा, और घटने वाली हरेक अच्छी  बात के पीछे का कारण उसके प्रेमी द्वारा उस पर प्रेम न्योछावर करना है।</p>
<blockquote><p>सपने सुनहरे ज़िंदगी के आज झिलमिला रहे<br />
तुझसे उलझ गया है रे आँचल मेरे दुलार का<br />
लगता मधुर-मधुर मुझे बंधन तुम्हारे प्यार का</p></blockquote>
<p>सुंदर भविष्य के सुनहरे सपने नायिका को ऊर्जा देते रहते हैं और सारा समय वह इन सपनीले क्षणों में ही खोयी रहती है। अपने जीवन के हर पहलू को वह प्रेमी से जोड़ कर देखने लगी है।</p>
<p><iframe width="420" height="345" src="http://www.youtube.com/embed/b79yGgtOH40" frameborder="0" allowfullscreen></iframe></p>
<p>इसी गीत का एक छोटा सा भाग युगल गीत के रुप में भी है, जो कि <strong>आशा भोसले </strong>के एकल गीत जितना ही मधुर एवम लुभावना है।</p>
<p><iframe width="420" height="345" src="http://www.youtube.com/embed/WhZY4zfOj28" frameborder="0" allowfullscreen></iframe></p>
<p>1953 में बनी फिल्म में उपस्थित इस गीत को सुनकर तो किसी प्रकार के संदेह की गुँजाइश रहती ही नहीं कि <strong>आशा भोसले</strong> ने अंततोगत्वा भारत की एक उत्कृष्ट गायिका का स्थान कैसे प्राप्त किया होगा। जो गायिका ऐसा गीत गा दे उसे तो शीर्ष पर पँहुचना ही था। यह गीत आशा भोसले के चमकीले आगाज़ की एक झलक मात्र थी।</p>
<p>&#8230;[राकेश]</p>
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		<title>कुहू कुहू बोले कोयलिया (सुवर्ण सुन्दरी &#8211; 1957) : मधुर रागमाला का आभूषण पहने नायाब संगीत</title>
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		<pubDate>Fri, 02 Sep 2011 07:38:35 +0000</pubDate>
		<dc:creator>CINE manthan</dc:creator>
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		<description><![CDATA[हिन्दी फिल्म संगीत में संगीतकारों द्वारा रागमलिका या रागमाला बनाये जाने के उदाहरण बहुत नहीं होंगे। ज्यादातर गीत किसी एक ही राग पर रचे-बुने और गढ़े जाते हैं। एक ही गीत में एकाधिक रागों का प्रयोग हुआ हो ऐसा कम ही देखने को मिलता है। संभवतः खेमचंद प्रकाश और के.एल.सहगल की नायाब जोड़ी ने तानसेन [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>हिन्दी फिल्म संगीत में संगीतकारों द्वारा रागमलिका या रागमाला बनाये जाने के उदाहरण बहुत नहीं होंगे। ज्यादातर गीत किसी एक ही राग पर रचे-बुने और गढ़े जाते हैं। एक ही गीत में एकाधिक रागों का प्रयोग हुआ हो ऐसा कम ही देखने को मिलता है। संभवतः <strong>खेमचंद प्रकाश</strong> और <strong>के.एल.सहगल</strong> की नायाब जोड़ी ने<strong> तानसेन</strong> फिल्म में फिल्मी संगीत में रागमाला पिरोने की शुरुआत की थी।</p>
<p>सन 1957 में हिन्दी में एक फिल्म बनायी गयी <strong>सुवर्ण सुन्दरी</strong>, जो कि पहले ही तेलुगू और तमिल में बनकर अपने संगीत के कारण प्रसिद्धि पा चुकी थी। तेलुगू और तमिल संस्करणों में फिल्म को संगीतबद्ध किया था <strong>आदिनारायण राव</strong> ने और उन्होने ही हिन्दी संस्करण में भी संगीत दिया था। <strong>वेदांतम राघवैया</strong> ने इस फिल्म को निर्देशित किया था। <strong>ए. नागेश्वर राव</strong>, <strong>सरोजा देवी</strong>, <strong>श्यामा</strong>, <strong>कुमकुम</strong> और <strong>अंजलि देवी</strong>, (जो कि फिल्म के संगीतकार <strong>आदि नारायण राव</strong> की पत्नी थीं) ने फिल्म में भूमिकायें निभाई थीं। एक अप्सरा के धरती पर आने की कथा पर आधारित पौराणिक कथाओं पर आधारित फिल्मों की श्रंखला की एक अन्य फिल्म है सुवर्ण सुन्दरी और कुछ खास इसे नहीं कहा जा सकता पर इसका संगीत अलबत्ता खास है और इसका संगीत हिन्दी फिल्म संगीत के इतिहास में अच्छे संगीत की सूची में सम्मिलित किये जाने योग्य है। यह भी कहा जा सकता है कि इस फिल्म के संगीत के कारण ही <strong>आदिनारायण राव</strong> को हिन्दी संगीत के क्षेत्र में जाना-पहचाना और याद किया जाता है। उन्होने बाद में सन 1964 में बनी फिल्म &#8211; <strong>फूलों की सेज</strong>, में भी बड़ा अच्छा संगीत दिया था। </p>
<p>सुवर्ण सुन्दरी के मधुर गीतों को लिखा था <strong>भरत व्यास</strong> ने। फिल्म के दस गीतों की सूची निम्नलिखित है।</p>
<blockquote><p>मुझे न बुला				- लता मंगेशकर<br />
कुहु कुहु बोले कोयलिया 		                &#8211; लता मंगेशकर, मो. रफी<br />
चंदा सा प्यारा				                &#8211; लता मंगेशकर, मन्ना डे<br />
राम नाम जपना पराया माल अपना	                &#8211; मो. रफी<br />
मौसम सुहाना दिल है दीवाना		                &#8211; लता मंगेशकर<br />
सर पे मटकी अंखियाँ भटकी		                &#8211; आशा भोसले, कोरस<br />
जा रे नटखट पिया			                &#8211; लता मंगेशकर, सुधा मल्होत्रा<br />
शम्भो सुन लो मेरी पुकार		                &#8211; लता मंगेशकर<br />
गिरिजा संग है सीस पे गंग है	                        &#8211; लता मंगेशकर<br />
ले लो जी ले लो गुड़िया		                        &#8211; लता मंगेशकर</p></blockquote>
<p>फिल्म का हरेक गीत बेहद अच्छा है। यहाँ चर्चा हो रही है लता एवम रफी द्वारा गये युगल गीत &#8220;<strong>कुहू कुहू बोले कोयलिया</strong>&#8221; की। शास्त्रीय संगीत की भीनी खुशबू बिखेरने वाला यह युगल गीत <strong>लता</strong>-<strong>रफी </strong>के सबसे अच्छे और क्लिष्ट गीतों में से एक है। <strong>आदीनारायण राव</strong> ने<strong> लता</strong>-<strong>रफी</strong> के मधुर गायन से एक कर्णप्रिय रागमाला रची है जो बरसों से ताजी बनी हुयी है। <strong>भरत व्यास</strong> ने केवल हिन्दी के शब्दो का प्रयोग करके बहुत ही आकर्षक गीत लिखा है और बसंत ऋतु की छटा का गुणगन करते हुये श्रंगार रस का भरपूर प्रदर्शन इस गीत में किया है।</p>
<p>भोर होने से पहले के पहर, जिसे दिन का आठवाँ पहर भी कहा जा सकता है, का राग कहा जाता है <strong>राग-सोहनी</strong> को और <strong>आदीनारायण राव </strong>इस राग से गीत की शुरुआत करते हैं और <strong>राग यमन</strong> से गीत का अंत करते हैं। बीच में <strong>राग-बहार</strong>, <strong>दरबारी</strong>, <strong>अडाणा</strong>, और <strong>जौनपुरी</strong> आकर झलक दिखला जाते हैं। सही राग न भी पहचान में आयें पर इतना अनुमान तो लग ही जाता है कि अलग-अलग अंतरे अलग-अलग रागों पर आधारित हैं।</p>
<p>बांसुरी की धुन के बीच <strong>लता</strong> अपने मधुर स्वर में उद्यान में कोयल और भंवरे अस्तित्व से उपजे संगीत को जीवंत करती हुयी गाती हैं, आलाप बिखेरती हैं और गुलशन को महका जाती हैं, वातावरण को पुष्पमयी, संगीतमयी और सौन्दर्य से लबालब भरा हुआ जीवनमयी बना देती हैं।</p>
<blockquote><p><strong>कुहू कुहू बोले कोयलिया,<br />
कुंज-कुंज में भंवरे डोले,<br />
गुन गुन बोले, आ आ आ<br />
कुहू कुहू बोले कोयलिया,</strong></p></blockquote>
<p>गीत को लता ने इस माधुर्य से गाया है कि गीत के बोल जिन दृष्यों का वर्णन कर रहे हैं वे जीवंत हो उठते हैं।</p>
<p>लता, रंगीन बसंत के सजे संवरे स्वरुप का बखान करती हैं और अपने आलाप से उसका स्वागत करती हैं  </p>
<blockquote><p><strong>सज सिंगार ऋतु आयी बसंती,</strong></p></blockquote>
<p>इतने रसपूर्ण वर्णन को सुन <strong>रफी </strong>भी खिल ऊठे बासंती सौन्दर्य की तुलना रसवंती नारी से करने आ जाते हैं।</p>
<blockquote><p><strong>जैसे नार कोई हो रसवंती,</strong></p></blockquote>
<p><strong>लता</strong> और <strong>रफी</strong> दोनों फूलों और तितलियों के आपसी प्रेम-दर्शन और व्यवहार का बखान करते हुये गाते हैं -</p>
<blockquote><p><strong>डाली डाली कलियों को तितलियां चूमें<br />
फ़ूल फ़ूल पंखडियाँ खोले, अमृत घोले,<br />
कुहू कुहू बोले कोयलिया,</strong>
</p></blockquote>
<p>आकाश में घिर आये बादलों के मध्य चमकती बिजली को देख नायिका पूछती हैं</p>
<blockquote><p><strong>काहे, काहे घटा में बिजली चमके,</strong></p></blockquote>
<p><strong>भरत व्यास, रफी</strong> के गायन के द्वारा श्रंगार रस की गहराई में चले जाते हैं और <strong>रफी</strong> बिजली के इस चमकने के पीछे के कारण के बारे में अनुमान लगाते कहते हैं -</p>
<blockquote><p><strong>हो सकता है, मेघराज नें बादरिया का श्याम-श्याम मुख चूम लिया हो&#8230;</strong></p></blockquote>
<p>इस अलंकारिक तुलना से नायक नायिका की नजदीकी भी बढ़ती है -</p>
<blockquote><p><strong>चोरी चोरी मन पंछी उड़े, नैना जुड़े<br />
कुहू कुहू बोले कोयलिया,</strong></p></blockquote>
<p>नायक की बंसी की धुन पर मगन हो नृत्य करती नायिका आकाश में खिले पूरे चाँद की छटा देख विभोर हो नायक को बताती है</p>
<blockquote><p><strong>चंद्रिका देख छाई, पिया, चंद्रिका देख छाई&#8230;</strong></p></blockquote>
<p>नायक चंदा के उपस्थित होने को इसका कारण बताता है और चंदा के ही कारण चंद्रिका प्रसन्न है, ऐसा समझाता है। यह सब तुलनायें उनके अपने प्रेम को और उनके भीतर  उत्पन्न होने वाले भावों को अभिव्यक्त्ति दे रही हैं।</p>
<blockquote><p><strong>चंदा से मिलके, मन ही मन में मुसकाई, छाई,चंद्रिका देख छाई&#8230;</strong></p></blockquote>
<p>शरद ऋतु में पूरे चाँद की चाँदनी से उत्पन्न शीतलता, विरह की अग्नि में जल रहे मन को भाती है, ऐसा नायिका कहती है।<br />
प्रेमी के पास होने से उसका मन प्रसन्न है।</p>
<blockquote><p><strong>शरद सुहावन मधुमन भावन,</strong></p></blockquote>
<p>प्रेमी कहता है कि बिरही मन को सावन में सुख मिलता है।</p>
<blockquote><p><strong>बिरही जनों का सुख सरसावन</strong></p></blockquote>
<p>प्रेमी-प्रेमिका पूनम के चाँद की खूबसूरती देख प्रसन्न होते हैं।</p>
<blockquote><p><strong>छाई छाई पूनम की छटा, घूंघट हटा,<br />
कुहू कुहू बोले कोयलिया,</strong>
</p></blockquote>
<p>प्रेमी कमल-कमलिनी के संयोग की बात प्रेमिका से कहता है</p>
<blockquote><p><strong>सरस रात मन भाये प्रियतमा, कमल कमलिनी मिले </strong></p></blockquote>
<p>प्रेमिका जल में बन रही चाँद की छवि में देखकर और उसकी किरणों से बने हार के सौन्दर्य को देख आनंदित हो रही है</p>
<blockquote><p><strong>किरण हार दमके, जल में चांद चमके,<br />
मन सानंद आनंद डोले<br />
कुहू कुहू बोले कोयलिया।</strong>
</p></blockquote>
<p><iframe width="420" height="345" src="http://www.youtube.com/embed/vhS8wEgwuRM" frameborder="0" allowfullscreen></iframe></p>
<p><strong>भरत व्यास</strong>, <strong>आदीनारायण राव </strong>और <strong>लता</strong> एवम <strong>रफी</strong>, चारों मिलकर बसंत ऋतु के आगमन पर जीवन में जो सौन्दर्य और ऊर्जा का संचार होता है उसका खूबसूरत वर्णन इस गीत के द्वारा प्रस्तुत करते हैं। गीत में प्रयुक्क्त शब्द, कुंज, तितलियाँ, फूल, कलियाँ, चाँद, चाँदनी, जल, कमल, कोयल, भँवरा, बसंत, बादल, और बिजली आदि मात्र शब्द न रहकर एक जीवंत वातावरण की रचना करते हैं। <strong>लता</strong> के गायन से कोयल की कुहू कुहू की मिठास जीवित हो उठती है। गीत गुलशन को महका जाता है।</p>
<p>पचास साल से पहले बना यह गीत आज भी ताजगी और खूबसूरती का प्रसारण चारों ओर कर देता है। यह गीत अपने अस्तित्व में ही चित्रात्मक है और शब्दों से श्रोता के अंदर कल्पनायें गढ़ता हुआ यह गीत उसे आनंद से सराबोर कर जाता है।</p>
<p>&#8230;[राकेश]</p>
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		<title>दुनिया रंग रंगीली बाबा (धरती माता 1938) &#8211; के.एल.सहगल होने का अर्थ</title>
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		<pubDate>Tue, 30 Aug 2011 07:00:38 +0000</pubDate>
		<dc:creator>CINE manthan</dc:creator>
				<category><![CDATA[1930-50]]></category>
		<category><![CDATA[Music]]></category>
		<category><![CDATA[Songs]]></category>
		<category><![CDATA[Dharti Mata (1938)]]></category>
		<category><![CDATA[K.C.Dey]]></category>
		<category><![CDATA[K.L. Saigal]]></category>
		<category><![CDATA[Kundanlal Saigal]]></category>
		<category><![CDATA[Manna Dey]]></category>
		<category><![CDATA[Pankaj Malik]]></category>
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		<category><![CDATA[Sachin Deb Burman]]></category>
		<category><![CDATA[SD Burman]]></category>
		<category><![CDATA[Uma Shashi]]></category>

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		<description><![CDATA[पिछली सदी के तीस और चालीस के दशक में समूचा भारत कुंदनलाल सहगल की आवाज़ के मोहपाश में यूँ ही नहीं बंध गया था। के.एल सहगल की संवेदना से भरपूर भावप्रवण गायिकी और गंगोत्री में गंगा के जल जैसा शब्दों का साफ एवम स्पष्ट उच्चारण, गाने का बहाव और ठीक मौके पर ठहराव सभी ऐसे [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>पिछली सदी के तीस और चालीस के दशक में समूचा भारत <strong>कुंदनलाल सहगल</strong> की आवाज़ के मोहपाश में यूँ ही नहीं बंध गया था।<strong> के.एल सहगल</strong> की संवेदना से भरपूर भावप्रवण गायिकी और गंगोत्री में गंगा के जल जैसा शब्दों का साफ एवम स्पष्ट उच्चारण, गाने का बहाव और ठीक मौके पर ठहराव सभी ऐसे गुण थे, जो उनकी गायिकी के जादू से लोगों को बाँधते चले जा रहे थे। वे बिल्कुल सर्वश्रेष्ठ गायक होने लायक थे और यह बात उनके ऐसे गानों से स्पष्ट होती है जो उन्होने अपने समकालीन दूसरे गायकों के साथ गाये हैं। वे श्रोताओं को फिल्मी गीतों में शास्त्रीय संगीत की भरपूर मात्रा अपनी मीठी आवाज़ के जरिये प्रदान कर रहे थे। हिन्दी, संस्कृतनिष्ठ और उर्दू के क्लिष्ट शब्द भी उनकी वाणी से ऐसे निकलते थे मानो उन्ही के गले के लिये ये शब्द रचे गये हों। वे कठिन से कठिन शब्द को लय में गाकर सरल बना देते थे।</p>
<p><strong>के.एल. सहगल</strong> होने का क्या अर्थ था यह 1938 में प्रदर्शित हुयी फिल्म &#8211; &#8220;<strong>धरती माता</strong>&#8221; के गीत &#8221; <strong>दुनिया रंग-रंगीली बाबा</strong>&#8221; से पता चलता है।</p>
<p>फिल्म में यह गीत क्रमशः <strong>के.सी डे</strong>, <strong>उमा शशि</strong> और <strong>के.एल. सहगल</strong> गाते हैं जबकि फिल्म के संगीत के रिकार्ड में इसी गीत में स्वर क्रमशः <strong>पंकज मलिक</strong>, <strong>उमा शशि</strong> और <strong>के.एल. सहगल</strong> का है।</p>
<p>प्रसिद्ध गायल <strong>मन्ना डे</strong>, <strong>के.सी. डे</strong> के भतीजे हैं। <strong>के.सी.डे</strong> <strong>सचिन देव बर्मन</strong> के संगीत गुरु भी रहे हैं और वे अपने समय के बेहद प्रसिद्ध गायक थे। <strong>पंकज मलिक</strong> तो गायक और संगीतकार के रुप में हिन्दी फिल्मों में भी अपार प्रसिद्धि पा चुके थे।</p>
<p><strong>उमा शशि</strong> भी पारंगत और प्रसिद्ध गायिका थीं। जब एक ही स्तर के गुणों वाले महारथी मैदान में हों तो उच्च गुणवत्ता वाली रचनायें जन्म लेती हैं। </p>
<p><strong>के.सी.डे</strong>, <strong>उमा शशि</strong> और<strong> के.एल.सहगल</strong> संस्करण </p>
<p><iframe width="560" height="345" src="http://www.youtube.com/embed/i1I0IbmHpmw" frameborder="0" allowfullscreen></iframe></p>
<p><strong>पंकज मलिक</strong>, <strong>उमा शशि</strong> और<strong> के.एल. सहगल</strong> संस्करण<br />
<iframe width="560" height="345" src="http://www.youtube.com/embed/UCStC07lWt8" frameborder="0" allowfullscreen></iframe></p>
<p>इसी फिल्म &#8220;<strong>धरती माता</strong>&#8221; के अन्य गीत जो <strong>के. एल. सहगल</strong> ने गाये हैं, जैसे एकल गीत &#8220;<strong>अब काह करुँ, कित जाऊँ</strong>&#8220;, या <strong>उमा शशि</strong> के साथ गाया युगल गीत &#8220;<strong>मैं मन की बात बताऊँ</strong>&#8221; या गीत &#8220;<strong>किसने ये खेल रचाया</strong>&#8221; वे भी उनकी श्रेष्ठता साबित करते हैं पर<br />
गीत &#8221; <strong>दुनिया रंग-रंगीली बाबा</strong>&#8221; के दोनों संस्करणों को सुनकर इस बात को आसानी से माना जा सकता है कि अच्छे गायकों <strong>पंकज मलिक</strong>,<strong> के.सी. डे </strong>और <strong>उमा शशि </strong>के मध्य खड़े <strong>के.एल.सहगल</strong> में कुछ ऐसा था जो इन गायकों एवम अपने समकालीन अन्य गायकों से कुछ अलग हटकर था। वह इतर गुण ही उन्हे अपने समकालीनों में श्रेष्ठतम बनाता है।</p>
<p>जब <strong>के.एल.सहगल</strong> की बारी आने से पहले <strong>के.सी.डे</strong> या <strong>पंकज मलिक</strong>, <strong>उमा शशि </strong>के साथ इस गीत को गाते हैं तब भी गीत अच्छी स्वर-लहरियों के साथ आनंद देता है और <strong>उमा शशि</strong> का लहराती आवाज में हा हा हा करते हुये<strong> के.सी.डे</strong> और <strong>पंकज मलिक</strong> के गायन के चलते रहने के बीच में प्रवेश करना लुभावना लगता है पर जब यही कार्य <strong>के.एल सहगल</strong> करते हैं और <strong>उमा शशि</strong> के गायन पर हा हा हा के अपने गायन की छतरी तान कर गाने में प्रवेश करते हैं तो गीत कुछ और ही हो जाता है और जब वे गाते हैं &#8211; </p>
<blockquote><p><strong>दुख की नदिया जीवन नैया आशा के पतवार लगे<br />
ओ नैया के खेने वाले नैया तेरी पार लगे<br />
पार बसत है देस सुनहरा<br />
किस्मत छैल-छबीली बाबा</strong>
</p></blockquote>
<p>तो यही गीत बहुत ऊपर आकाश में उड़ने लगता है।</p>
<p><strong>ओ नैया के खेने वाले</strong>&#8230; वाली पंक्ति में उनका गायन उनकी आवाज़ का जादू और इसकी श्रेष्ठता दोनों का भली भांति प्रतिनिधित्व करता है।</p>
<p>ऐसा तो नहीं हुआ होगा कि <strong>पंकज मलिक</strong> ने तीन गायकों के इस सयुंक्त्त गीत में <strong>के.एल.सहगल</strong> वाले भाग के लिये अलग से धुन तैयार की होगी या <strong>प. सुदर्शन</strong> ने कुछ विशेष शब्द <strong>के.एल.सहगल</strong> वाले भाग के लिये लिखे होंगे। वही धुन तीनों गायकों को मिली है। एक ही कवि ने तीनों के लिये शब्द रचे हैं। यह <strong>के.एल.सहगल</strong> की गायिकी की अपनी विशेषता और विशिष्टता है कि तीन गायकों वाले गीत में उनके द्वारा गाया भाग एक अलग ही ऊँचाई प्राप्त करता है।</p>
<p>अलग-अलग गायकों में तुलना नहीं हो सकती। सबका अपना अंदाज़ होता है। <strong>के.सी.डे</strong>, <strong>पंकज मलिक</strong> और <strong>उमा शशि</strong> के एकल गीत हैं जो अलग आनंद लेकर आते हैं। पर अगर एक ही गीत को एक ही साथ कई गायक गायें तो सापेक्ष भाव आ जाना स्वाभाविक है। यही इस गीत के साथ होता है। </p>
<p><strong>के.एल. सहगल</strong> की गायी पंक्तियाँ सुनिश्चित कर देती हैं कि अब यह गीत श्रोता के दिल से मुश्किल से ही निकल पायेगा।</p>
<p>&#8230;[राकॆश]</p>
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