वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी, वो बचपन, वो जगजीत सिंह: भुलाये नहीं भूल सकता है कोई

कई सितारों को मैं जानता हूँ बचपन से कहीं भी जाऊँ मेरे साथ-साथ चलते हैं (बशीर बद्र) बीसवी सदी के सातवें और आठवें दशक में...

आँधी (1975): तेरे बिना शिकवे न हों पर ज़िंदगी ज़िंदगी भी तो नहीं

दूर होने की कसक पुल बन जाती है अक्सर दिलों को क़रीब लाने को। पर अति निकटता के अहसासों की आँच जाने क्यों कभी कभी विलग कर...

मुरली मेरे श्याम की(1985): कान्हा की मधुर बांसुरी का रस्सावादन वाया गुलज़ार एवम रघुनाथ सेठ

बांसुरी का तन बिल्कुल सीधा है, मन में बड़े बल हैं, कितनी बल खाती भावनाओं का कितनी तरह उच्चारण करती है, गीता के बोल तो बाद...

दो नैनों में (खुशबू) : निर्देशक, कवि गुलज़ार की कल्पना और तकनीक का नमूना

यूँ तो खुशबू के सभी गीत एक से बढ़कर एक हैं पर फिल्म की परिस्थितियों के अनुरुप – दो नैनों में आँसू भरे हैं, गीत तो कमाल का...

एक ही ख्वाब (किनारा): गहन प्रेम की खूबसूरत सिनेमाई अभिव्यक्त्ति

गुलज़ार की फिल्म किनारा (1977) का यह गीत कई मायनों में अनूठा है। ऐसा कोई और गीत हिन्दी फिल्मों में मुश्किल से ही मिलेगा।...

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