वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी, वो बचपन, वो जगजीत सिंह: भुलाये नहीं भूल सकता है कोई

कई सितारों को मैं जानता हूँ बचपन से कहीं भी जाऊँ मेरे साथ-साथ चलते हैं (बशीर बद्र) बीसवी सदी के सातवें और आठवें दशक में...

रावण(1984) : रो रो के पिघलते हैं गुनाहों के पहाड़

तेरे इश्क की एक बूँद इसमें मिल गयी थी इसलिये मैंने उम्र की सारी कड़वाहट पी ली ….( अमृता प्रीतम) एक तो इश्क वह है जो किसी...

Aaj(1990):ज़िन्दगी रोज नये रंग में ढ़ल जाती है

जीवन में यदि कुछ स्थायी है तो वह है निरंतर होने वाला परिवर्तन। हर पल कुछ नया हो रहा है। खुशी को स्थायी भाव बनाना चाहता...

Mr Singh Mrs Mehta (2010)

विवाहेत्तर संबंधों के कैनवास पर उभरते, बनते, बिगड़ते और फिर से कोई नया आकार लेते चित्रों की गाथा कह सकते हैं निर्देशक...